सकारात्मकता सोच पर हिंदी में कहानी | What Is Positivity.  What Is The Advantage Of Positive Attitude Inspirational Story In Hindi


सकारात्मकता सोच पर हिंदी में कहानी | What Is The Advantage Of Positive Attitude Inspirational Story In Hindi


  रफीक मियां अनिरुद्ध के पिता के काफी अच्छे दोस्त थे । दोनों  घरों के बीच की दीवार एक ही थी । रफीक मियां ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे । घर के बाहर ही उनकी सिलाई की एक छोटी सी दुकान थी ।

  अनिरुद्ध के दो जुड़वा बेटे थे । निर्भय बड़ा था एवं अभय छोटा था । अनिरुद्ध को काम के सिलसिले में अक्सर बाहर जाना पड़ता था । कभी-कभी उसे आने में काफी रात हो जाया करती थी ।
  ऐसे में वह अपने बच्चों को रफीक चाचा के सुपुर्द कर के जाता था । रफीक चाचा भी उन्हें अपने बच्चों की तरह लाड प्यार देते और उनका बहुत ख्याल रखते । पिता के जाने के बाद अनिरुद्ध रफीक मियां को अपने पिता जैसा ही समझने लगा था ।

  बच्चों की देखभाल उनके जिम्मे करके अनिरुद्ध की चिन्ताएं काफी कम हो गयी । एक बार अनिरुद्ध को काम से हेड ऑफिस जाना पड़ा ।

  घर से निकल कर बच्चों को स्कूल छोड़ते हुए अनिरुद्ध स्टेशन की ओर निकल पड़ा । अनिरुद्ध की गैरमौजूदगी में हमेशा की तरह रफीक मियां दोनों बच्चों को स्कूल बंद होने के बाद दोपहर में घर ले आए ।

  काफी रात हो चुकी थी परंतु अनिरुद्ध घर नहीं लौटा । जैसे जैसे समय बीतता गया रफीक मियां की धड़कन काफी तेज होती गई । तमाम बुरे ख्याल उनके मन में आने लगे । जब आधी रात बीत गई तब रफीक मियां घबरा गए क्योंकि अनिरुद्ध इतनी देर कभी नहीं किया करता था ।

  ऐसे में रफीक मियां ने हेड ऑफिस फोन किया पर,
वहां बस फोन की घंटी ही बजती रही उसे उठाने वाला कोई नहीं था । हार मानकर पड़ोसी के साथ वे अनिरुद्ध को खोजने निकल पड़े ।

  वहां पहुंने के बाद तमाम खोजबीन के बाद अनिरुद्ध उन्हें मिला, उसका  एक्सीडेंट हो चुका था और काफी खून भी बह चुका था । रफीक मियां ने उसे अपना खून दिया । मगर सारी कोशिशें बेकार गई  अनिरुद्ध को वे नही बचा सके ।

  घर लौटने के बाद वहां आए अनिरुद्ध के ढेर सारे रिश्तेदारों से रफीक मियां ने दोनों बच्चों को अपने साथ रखने की दरख्वास्त की परंतु वहां हर कोई अपनी अपनी परेशानियां गिनाता और भिड़ मे कही छुप जाता । कुछ लोगों ने तो दोनों बच्चों को अनाथ आश्रम में रखने की सलाह तक दे ढाली ।

  जिसे सुनकर रफीक मियां का खून खौल उठा और उन्होंने उन्हे बहुत बुरा भला कहा आखिरकार किसी को आगे न आता  देख रफीक मियां ने उन दोनों बच्चों की परवरिश की सारी जिम्मेदारी खुद उठाने का निश्चय किया ।

  बच्चों के स्कूल के एक दिन का भी नागा रफीक मियां नहीं होने देते शायद वह अनिरुद्ध के दोनों बच्चो अभय और निर्भय को उसके जैसा ही बनाना चाहते थे । लगभग एक साल होने को था ।

  उनके कक्षा की हेड मास्टरनी न जो कि रफीक मियां को बड़े अच्छे से जानती थी । एक दिन वह रफीक मियां की दुकान पर आई । संजोगवश दुकान तो खुली थी, अभय और निर्भय दोनों वहीं सामने खेल रहे थे परंतु रफीक मियां वहां नहीं थे । शायद वे किसी काम से बाजार गए थे ।

  असल में हेड मास्टरनी के पति जोकि पुलिस में दरोगा थे । उनका अचानक दूसरे शहर ट्रांसफर हो गया था । जिसके कारण मास्टरनी को शहर छोड़ कर जाना पड़ रहा था ।

  चूंकि रफीक मियां के इस जिम्मेदारी भरे कदम से मास्टरनी  काफी प्रभावित थी इसलिए जाने से पहले वह उन दोनों बच्चों के बारे में उन्हें कुछ बताना चाहती थी परंतु संजोगवश  रफीक मियां वहां नहीं थे ।

  ऐसे में उनके साथ काम करने वाले एक कारीगर को उन्होंने बताया कि

"मुझे आज इस शहर से अचानक जाना पड़ रहा है । मैं कुछ बहुत जरुरी बातें रफीक मियां को ही बताना चाहती थी । मगर वे संजोग से यहां नहीं है मैं चाहती हूँ कि, जो बाते मै आप से बताने जा रही हूँ उसे आप रफीक मियां के आने पर उन्हें जरूर बता दे"
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  कारीगर ने कहा "जी जरूर आप मुझसे कह सकती हैं । मैं उनके आने पर उन्हें जरूर बता दूंगा"
तब मास्टरनी ने हाथ उठाकर, सामने खेल रहे दोनों बच्चों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि

"मुझे लगता है कि दोनों बच्चों में बड़ा वाला पढ़ने में काफी कमजोर है । मुझे नहीं लगता कि वह पांचवी भी ठीक से पास कर सकेगा"

मास्टरनी ने फिर कहा
"चूंकि रफीक की माली हालत कुछ खास अच्छी नही ये बाते मैं इनके पिता अनिरुद्ध से भी बताना चाहती थी पर वक्त नही मिला । ऐसे में उसे आगे पढ़ाना या उसके ऊपर पैसा नष्ट करना बेफिजूल है ।"

कारीगर को मास्टरनी की बाते हतप्रभ कर रही थी । वे फिर बोली
  "वही छोटे वाले के अंदर मैंने कमाल की काबिलियत देखी है  उसमें वह सभी गुण हैं जो  एक विद्यार्थी में होने चाहिए उसमें ऐसी क्षमताएं हैं  कि अगर उसे आगे पढ़ाया जाए तो वह निश्चित रूप से काफी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है"

 ऐसा कह कर मास्टरनी पास खड़ी गाड़ी में  बैठ वहां से रुखसत हो गई । उनके जाने के महज कुछ ही देर में रफीक मियां वहां लौटे तब कारीगर ने उन्हें मास्टरनी की कही सारी बातें बताई संजोगवश अभय और निर्भय भी वहां मौजूद थे ।

 कारीगर द्वारा बच्चों सामने ये सारी बातें बताता देख रफीक मियां ने कारीगर को बहुत जोर से डांटा । वहीं रफीक मियां ने बच्चों से इसे मास्टरनी का एक मजाक बताया परंतु कारीगर द्वारा रफीक मियां को बताई गई सारी बातें दोनो के मन में घर कर गई ।

  निर्भय दिन रात मास्टरनी की बातों को सोचता रहा । चूंकि मास्टरनी अनिरुद्ध के जाने के बाद कक्षा के अन्य छात्रों से कहीं ज्यादा उन दोनों बच्चों को महत्व देती थी । जिसके कारण उन दोनों बच्चो को भी उन से बहुत लगाव हो गया था । वे  उनकी हर बात पर आंख मूंद कर विश्वास करते ।

  हालांकि मास्टरनी की बातों का रफीक मियां पर कोई असर नहीं पड़ा । उन्होंने दोनों बच्चों को स्कूल भेजना जारी रखा ।

   मगर निर्भय जानता था कि मास्टरनी उनसे कभी ऐसा मजाक नही करेगी । धीरे धीरे उसका पढ़ाई से मन बिल्कुल ही खत्म हो गया और उसने स्कूल भी जाना बंद कर दिया हालांकि रफीक मियां ने उसे काफी समझाया उसे स्कूल भेजने की भी काफी कोशिश भी की परंतु वह स्कूल नहीं गया ।

  वहीं अभय को मास्टरनी की बातों से बहुत बल मिला । उसका आत्मविश्वास मास्टरनी की बातों से चरम पर था । नए आत्मविश्वास से लबरेज अभय ने दिन रात मेहनत करनी शुरू कर दी ।

  देखते ही देखते काफी समय गुजर गया और मास्टरनी से बढ़े आत्मविश्वास के बल पर अभय ने काफी उच्च शिक्षा प्राप्त कर वैज्ञानिक बना जबकि वही निर्भय रफीक मियां के काम में हाथ बटाता रहा ।

  एक दिन  संजोग बस मास्टरनी के पति का ट्रांसफर पुनं इसी शहर में हुआ ट्रांसफर के कारण मास्टरनी फिर से अपने शहर लौट आई । यहां आने के कुछ समय बाद उसे रफीक मियां की याद आई चूंकि शहर अब काफी बड़ा हो चुका था और यहाँ कि गलियां भी मास्टरनी को ठीक से याद नहीं थी परंतु

"जहां चाह है वहां राह है"

 मास्टरनी खोजते-खोजते एक दिन रफीक मियां की दुकान पर जा पहुंची । किसी जमाने में टूटी फूटी सी रफीक मियां की दुकान आज 'मॉडर्न टेलर' के नाम से पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुकी थी । दुकान अब काफी चमक गई थी ।

  मास्टरनी जब दुकान पर पहुंची तो पहले तो उसे लगा कि शायद वह किसी गलत पते पर आ गई है परंतु थोड़ी ही देर इधर-उधर पूछने के बाद उसे पता चला कि रफीक चाचा की पुरानी दुकान यही है क्योंकि अब वे काफी वृद्ध हो चुके हैं इसीलिए अब दुकान को उनका लड़का निर्भय चलाता है ।

निर्भय का नाम सुनकर मास्टरनी को उन दो प्यारे प्यारे बच्चों की याद आ गई । उसे उन दोनों का नाम आज तक याद था परंतु अब यह दुकान रफीक नहीं बल्कि निर्भय संभालता है । यह सुनकर उसे गहरा धक्का लगा ।
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  कुछ देर तक वह चुपचाप दुकान को देखती रही फिर मन मे कई सवालों के साथ वह दुकान की तरफ बढ़ी दुकान पर चढ़ने के बाद सामने कुछ कारीगर काम कर रहे थे । मास्टरनी ने उनसे रफीक के बारे में पूछा कारीगरों ने बताया कि रफीक मियां तो अक्सर बीमार रहा करते हैं ऐसे में इस दुकान को अब निर्भय देखता है । अभी मास्टरनी की उनसे बातें चल ही रही थी कि तभी निर्भय वहां आ गया ।

  मास्टरनी ने तो उसे नहीं पहचाना परंतु निर्भय ने उन्हें पहचान लिया और वह लपककर मास्टरनी के पैर छूने लगा । मास्टरनी ने पूछा तुम कौन हो तब निर्भय ने बताया कि

"आप मुझे नहीं पहचानती परंतु मैं आपको अच्छी तरह पहचान रहा हूँ । आप स्कूल में हमारी हेड मास्टरनी हुआ करती थी"

  आखिरकार दुकान पर चढ़ने से पहले मास्टरनी को जिस आशंका ने चिंतित कर दिया था । वह सच साबित हुआ

  मास्टरनी ने पूछा  "तो तुम अनिरुद्ध के बेटे निर्भय हो"
  निर्भय ने बोला  "जी हां मैडम मैं निर्भय ही हूँ"

  मास्टरनी ने फिर पूछा "तो अभय कहां है क्या वह भी तुम्हारे साथ इसी दुकान पर .. ."
 निर्भय ने कहा "नहीं नहीं मैडम वह तो वैज्ञानिक बन चुका है उसने खूब मेहनत की और आज एक वैज्ञानिक बन चुका है"

  मास्टरनी को ये सारा वाक्या समझ ही नहीं आ रहा था ऐसे में मास्टरनी ने निर्भय से फिर पूछा  "क्यों तुमने कुछ क्यों नहीं किया"

 तब तक रफीक मियां वहां आ गए उन्होंने मास्टरनी को सलाम किया और कहा
"क्या करें मास्टरनी साहिबा हमने अनिरुद्ध के जाने के बाद दोनों की परवरिश और शिक्षा में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आने दी मैंने दोनों को समान रूप से तालीम देनी चाहिए परंतु खुदा की मर्जी के आगे कोई क्या कर सकता है"

  थोड़ी देर बाद फिर रफीक ने कहा

"यहां से जाने से पहले आप, हमारी इस दुकान पर आई थी संजोग से मैं नहीं था आपने बताया था की निर्भय पढ़ाई-लिखाई में शायद कुछ खास न कर  सकेगा वही अभय को लेकर आप काफी आशान्वित थी  यह सारी बातें जब मेरा कारीगर मुझे बता रहा था । उस समय ये अभय और निर्भय भी वहां उपस्थित थे । अभय को तो आपकी बातों से बहुत हौसला मिला । जिसकी बदौलत उसने खूब मेहनत की उसकी मेहनत रंग भी लाई और उसने वह स्थान हासिल किया जो शायद अनिरुद्ध ने कभी सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा परंतु आपकी बातों से निर्भय को गहरा धक्का लगा वह टूट गया । उसकी पढ़ाई-लिखाई की इच्छा ही खत्म हो गई । उसे लगा कि वह पढ़ाई लिखाई के लायक ही नहीं है । ऐसे में उसने स्कूल जाना ही बंद कर दिया .. ."

मास्टरनी के चेहरे पर रफीक की बातो से आश्चर्य की लकीरे खींचती जा रही थी । रफीक ने आगे कहा

"हालांकि मैंने उसे स्कूल भेजने की काफी कोशिश की मगर मेरे प्यार दुलार फटकार का उसपर कोई असर नहीं पड़ा और धीरे-धीरे इसने स्कूल जाना ही बंद कर दिया और दुकान पर मेरा हाथ बटाने लगा .. ."

यह सब सुनकर मास्टरनी ने अपना माथा पकड़ लिया वह वही पड़े चेयर पर बैठ गई । उसकी ऐसी हालत देख रफीक ने फौरन ठंडा पानी मंगवाया और मास्टरनी को दिया रफीक मियां यह समझ नहीं पा रहे थे कि इन सब बातों को सुनकर मास्टरनी इतनी परेशान क्यों हो रही ।
  तभी मास्टरनी ने बताया कि

"मैंने ये सारी बातें बताई जरूर थी मगर आपको कुछ गलत जानकारी मिली असल में मैंने पढ़ाई में कमजोर निर्भय को नहीं बल्कि अभय को बताया था । निर्भय तो पढ़ाई में  काफी तेज था मुझे लगता था कि यह आगे चलकर कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करेगा जबकि अभय की दिमागी स्तर मुझे बहुत कमजोर लगा इसीलिए मैंने उसके पढ़ाई-लिखाई में और ज्यादा पैसा बर्बाद न करने की बात आपसे कहने आई थी । मगर संजोग से उसदिन मुझे आपकी जगह आपका कारीगर यहाँ मिला, यही सामने दोनों बच्चे खेल रहे थे तो मैंने उनकी तरफ इशारा करते हुए कारीगर से कहा कि पढ़ाई में बड़े वाला काफी कमजोर है और छोटे वाला का काफी तेज है .. . परंतु अफ़सोस उसने आपको मेरी बाते ठीक ढंग से नही बताई"  

मास्टरनी की बातों को सुनकर रफीक मियां ने भी माथा पकड़ लिया । थोड़ी देर शान्त रहने के बाद वे बोले

  "आपने कारीगर को जैसा बताया था उसने मुझे वैसा ही बताया, न हमें समझने में कोई भूल हुई और न आपको समझाने में कोई भूल हुई परंतु शायद आपको किसी ने ये गलत जानकारी दी थी कि अभय बड़ा है और निर्भय छोटा, असल मे निर्भय बड़ा है और अभय छोटा । उस दिन यहां खड़े निर्भय को लगा कि आपने उसे ही कमजोर बताया है इसलिए आपकी बातों का उस पर बुरा प्रभाव पड़ा  जबकि अभय को आपकी बातों से इतना हौसला मिला उसने वह कर दिखाया जो किसी ने शायद सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा" 

Moral Of  The Story

 
सकारात्मकता में वह शक्ति है जिसके बल पर हम अपनी क्षमताओं से भी कहीं आगे निकल जाते हैं और फिर  वो  कर दिखाते हैं जिसकी आशा, हमसे पहले किसी ने न की होती है !




         Writer
        Karan "GirijaNandan"
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