जीवन में अवसरों की पहचान- प्रेरणादायक हिंदी कहानी | Identifying Opportunity In Life


जीवन में अवसरों की पहचान पर एक प्रेरणादायक हिंदी कहानी | Identifying Opportunity In Life- An Inspirational Story In Hindi

  एक ही गांव के रहने वाले गोपाल, बिरजू और सूरज बचपन से ही बहुत अच्छे दोस्त थे। तीनों में बड़ी गहरी मित्रता थी। तीनों का साथ खेलना रहना हुआ करता था। जब वे थोड़े बड़े हुए तो उनका दाखिला गांव के प्राथमिक विद्यालय में एक ही कक्षा में हुआ।

  अब तो वे एक दूसरे के साथ और भी ज्यादा समय साथ रहने लगे।

  तीनों के पिता का व्यवसाय भिन्न-भिन्न था। जहां गोपाल के पिता हलवाई का काम करते थे, वही बिरजू के पिता एक साधारण किसान थे। जबकि सूरज के पिता एक जौहरी की दुकान पर कारीगर थे। तीनों स्कूल खत्म होते ही लौटने के बाद शाम को गांव के तालाब के पास मौज मस्ती किया करते थे ।

  वही तालाब में एक मछुआरा रोज मछलियां पकड़ने के लिए जाल डाला करता। ये तीनों बच्चे काफी शरारती स्वभाव के थे। वे उस मछुआरे को तरह तरह से तंग किया करते। वो जब कभी भी जाल डालकर थोड़ी ही देर के लिए वहां से इधर उधर कही हटता।

 तब ये तीनों उसके जाल को ही जिसे उसने मछलियां पकड़ने के लिए तलाब में बिछाया था। उसके न रहने पर चुपके से उसे उठाकर तालाब के बाहर कर देते। बेचारा मछुआरा इधर उधर घूमने के बाद, ये सोचकर की

"अब तक तो आज का काम हो गया होगा। कुछ मछलियां तो जाल में फंसी गई होंगी"


  वो वापस आता पर वहां नजारा तो कुछ और ही रहता उसकी कल्पना के मुताबिक वहां कुछ भी नहीं होता और ये तीनों दूर झाड़ियों में छुप कर उसको देखते रहते  वह गुस्से में इधर-उधर नजरें घुमा कर ऐसा करने वालों को ढूंढता रहता।

  कभी कभी तो ये तीनों उसके बने बनाए खेल को भी बिगाड़ कर रख देते। जब कभी भी मछुआरा जाल में फंसी मछलियों को जाल से बाहर निकालकर पल भर को भी इधर उधर जाता, तो ये शरारती बच्चे उन मछलियों को वापस उसी तालाब में फेंक आते। 

  बिचारा चिढ़कर उन अनजान शख्स को बुरा-भला कहता और अपना माथा पीटता। एक दिन उनकी इस छुपी शरारत का पोल खुल ही गया। मछुआरे ने इनको शरारत करते रंगे हाथों पकड़ लिया।

  तीनों उससे ऐसा न करने की माफी मांगते रहे, पर मछुआरे ने उनकी एक न सुनी और उन्हें रस्सी से  बांध कर गांव लाया और उनके घर वालों से शिकायत भी की।

  जिसके बाद उन्हें घर से खूब डांट पड़ी। मगर इसके बाद ये तीनों उस मछुआरे के मानो दुश्मन बन बैठे। इन्होंने अपनी शरारत बंद करने की बजाय और ज्यादा चौकस हो गए।

  एक दिन की बात है। मछुआरे ने मछलियां पकड़ने के लिए तालाब में जाल डाल रखा था और वहीं कुछ दूरी पर वो तीनों बच्चे खेल रहे थे। थोड़ी देर में एक बड़ी सी मछली जाल में फंस गई। मछुआरे ने तुरंत जाल बाहर निकाला इतनी बड़ी मछली मछुआरे ने जीवन में पहली बार पकड़ी थी।
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  उसे देखकर वो बहुत खुश हुआ। वो समझ गया कि आज तो उसे ढेर सारे पैसे मिलेंगे इतने पैसे जीतने की उसे एक दिन में कभी नहीं मिले। आज पूरे दिन का उसका काम हो गया है।

  यह सोच कर जाल में फंसी मछली को वहीं छोड़ कर बस थोड़ी देर को वहां से किसी वजह से चला गया। तेज चिलचिलाती धूप में थोड़ी ही देर में वो मछली छटपटाने लगी और मदद की गुहार लगाने लगी पर संजोग से वहां कोई नहीं था।

  वे तीनों बच्चे भी जाने कहां चले गए थे। तेज धूप में जलते-जलते और मदद की गुहार लगाते-लगाते मछली सुस्त हो गई। वह जान चुकी थी कि उसकी उसकी मदद को अब वहां कोई नहीं आएगा। फिर भी 

 "जब तक सांस तब तक आस" 

  मछली अपने प्राणों को बचाने के लिए यथासंभव प्रयास करती रही। 

"जीत होती उसकी जिसे जीत पर भरोसा"

  आखिरकार मछली की मेहनत रंग लाई। ईश्वर ने एक तरह से फरिश्ता बनकर ही शायद उन तीनों लड़कों को वहां भेजा तीनों बच्चे टहलते-टहलते वहां पहुंच गए। वे तीनों भी इतनी बड़ी मछली आज पहली बार देखे थे। वे वही खड़े बड़े गौर से उसे देख रहे थे।

  हालांकि मछली तब तक काफी कमजोर पड़ जाने के कारण आंखें बंद करके शायद ईश्वर को याद कर रही थी। उनके पैरों की खुरखुराहट या उनके आपसी बातचीत ने उसमें फिर से आशा का संचार कर दिया। उसने आंखें खोला तो सामने उन तीनों को पाकर वह बहुत खुश हुई।

  भोले भाले दिख रहे, उन बच्चों से मदद की आशा में मछली ने तुरंत उन्हें आवाज़ लगाई और उनसे मदद के लिए विनती करने लगी। मगर उन्होंने मछुआरे को जाते हुए नहीं देखा था।


  इसलिए वह न जाने कब वापस आ जाए। इस डर से उन्होंने उसे बचाने से मना कर दिया। मगर एकमात्र उम्मीद की किरण दिखान, उन तीनो बच्चों से मछली निरंतर सहायता माँगती रही।
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  आखिरकार उन बच्चों को उस पर दया आई और उन्होंने उसे जाल से निकाल कर वापस बड़ी मुश्किल से तालाब में डाला। जाते-जाते मछली ने अपने मुंह से एक भूरे रंग का एक छोटा सा टुकड़ा बाहर निकाला। शायद वो उसे उन्हें उनकी सहायता के बदले देना चाहती थी।

  वो उन्हें कुछ बताती कि तब तक मछुआरा वहां आ पहुंचा। उसे देखकर मछली वहां से भाग निकली। साथ ही वे तीनों बच्चे भी मछुआरे की आहट भाप वहां से भाग निकले। भागकर वह पास एक झाड़ी में जाकर छुप गए। जब मछुआरा वहां पहुंचा तो जाल में मछली को न पाकर वह बहुत परेशान हुआ।

  साथ ही वह काफी नाराज हुआ। जिसके बदले उसने कई बड़े बड़े ख्वाब देख लिए थे। वो मछली ही जाल से गायब थी। पहले तो मछुआरे को इसके पीछे उन तीनों बच्चों की शरारत लगी। मगर इतनी बड़ी मछली को वो छोटे बच्चे जाल से कैसे छुड़ा सकते हैं और तालाब में वापस कैसे डाल सकते हैं।

  ये बात उसके पल्ले नहीं पड़ी थोड़ी देर सर खुजलाने के बाद निराश मछुआरा हाथों में अपना जाल लिए वहां से वापस अपने घर चला गया। उसके जाने के तुरंत बाद वे तीनों लड़के वापस उसी स्थान पर पहुंच गए। जहां पर मछली ने जाते-जाते अपने मुख से एक छोटा भूरे रंग का टुकड़ा जैसा कुछ निकाला था।

  तीनों ने उसे बड़े ध्यान से देखा परंतु वह काफी अजीब सा और काफी गंदा था। उसे देखने के बाद गोपाल और बिरजू वहां से चल पड़े। तब सूरज ने उस टुकड़े को भी साथ ले चलने को कहा। मगर इसके लिए वो दोनों राजी नहीं हुए और


"हमें नही रखना तुम्हें रखना हो तो रख लो"


  ऐसा कहकर दोनों उसका मजाक उड़ाने लगे और उस पर जोर जोर से हंसते हुए वहां से चले गए। 
  मगर सूरज उसे काफी देर तक देखता रहा। उसके मन में मछली का चेहरा घूम रहा था और जो उससे बार बार एक ही सवाल कर रहा था। कि


"आखिर मछली ने जाते जाते वो टुकड़ा उनकी तरफ ही क्यों फेंका"


  सूरज को वो टुकड़ा कुछ खास लग रहा था। ऐसे में उसे वहां न छोड़ कर उसने उसे एक पत्ते में लपेटकर जेब में रखकर अपने साथ घर ले गया। घर पहुंच कर जब उसे सूरज ने अपने पिता को दिखाया। तो पिता उसे बस देखते ही रह गए।

  यह तुम्हें कहां मिला। पिता ने सूरज से पूछा तब सूरज ने पिता को सारी बात बताई। पिता ने सूरज की पीठ थपथपाते और उस टुकड़े साफ करने लगे। जिसके बाद दोनों की आंखें खुली की खुली रह गई। वो कोई आम पत्थर नहीं एक अनमोल हीरा था।

Moral Of The Story 


moral of the story " अवसर की पहचान"

                                   


         Writer
        Karan "GirijaNandan"
       With  
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