पूजनीय माता पिता के चरणों मे स्वर्ग है - उनके आदर, सम्मान, सेवा, महत्व और उनके प्रति हमारे कर्तव्यों की सीख देती कहानी | inspirational story on parents in hindi


पूजनीय एंव आदरणीय माता पिता के प्रति हमारे कर्तव्यो की सीख देती कहानी


  रोहित ने अभी-अभी 12वीं की परीक्षा पास करके ग्रेजुएशन के लिए यूनिवर्सिटी में अपना पहला कदम रखा है । यहां का माहौल उसके लिए पहले से बहुत अलग है और साथ ही बहुत खुशनुमा भी है क्योंकि आज तक ढोए जा रहे स्कूल ड्रेस की झंझट यहां बिल्कुल भी नहीं है । अब वह यहां अपनी फेवरेट कपड़े पहनकर आ सकता है जो उस पर शूट करती हैं और जिसमे वह स्मार्ट और हैंडसम लगता है । 

  यहां हर तरफ आजादी का माहौल है । मर्जी करे तो क्लास करो अन्यथा ना करो, जब चाहे चलती क्लास से उठकर बाहर चले जाओ, दोस्तों के साथ जितना चाहे उतना मौज मस्ती करो कोई रोकने टोकने वाला नहीं वाकई जिंदगी का असली मजा तो ग्रेजुएशन में ही आता है वरना आज तक तो बस बस्ता ढोने में ही लगे थे ।

  कुछ ही दिनों में रोहित ने ढेर सारे दोस्त बना लेता है । पहले तो वह स्कूल बहुत आधे-अधूरे मन से   जाया करता था । मगर अचानक ही उसकी दुनिया बदल चुकी है । अब तो वह यूनिवर्सिटी जाने के लिए सुबह 5:00 बजे ही उठ कर तैयार होना शुरू हो जाता और सात बजते-बजते यूनिवर्सिटी पहुंच जाता है, वहां वक्त कैसे बीत जाता, इस बात का तो पता भी नहीं चलता ।

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  रोहित को वहां से आने का मन ही नहीं करता मगर वह क्या करें जब सारे दोस्त अपने-अपने घर लौटने लगते हैं तब मजबूरन उसे भी घर आना ही पड़ता है । कसम से अगर स्वर्ग कही है तो ग्रेजुएशन की लाइफ में, एक ऐसी आजादी जिसके एहसास से ही मन झूम उठता है पता नहीं ये सारी कायदे छोटे स्कूलों में क्यों नहीं लागू होते वरना किसी भी मां-बाप को, बच्चों को डरा-धमकाकर स्कूल भेजने की जरुरत ही नहीं पड़ती वे खुद-ब-खुद दौड़े दौड़े स्कूल  चले आते ।

  मगर रोहित की खुशियों को अचानक ग्रहण लग गया, दूसरे दोस्तों को बाइक से आते देख वह खुद को साइकिल से आने में शर्मिंदगी महसूस करने लगा एक दिन वह शाम को पिता के साथ डिनर करते समय पिता से कहता है 

"पिताजी, अब मैं बड़ा हो चुका हूं और मुझे साइकिल से आना जाना अब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता आप मुझे एक अच्छी सी बाइक खरीद कर क्यों नहीं दे देते"
तब पिताजी कहते हैं 

 "अभी अभी तो तुम्हारा एडमिशन यूनिवर्सिटी में कराया है वैसे ही बहुत पैसे खर्च हो चुके हैं अभी तुम कुछ दिन साइकिल से ही जाओ फिर देखते हैं क्या हो सकता है"


मगर वह तो यूनिवर्सिटी से ही यह फैसला करके लौटा था कि आज के बाद वह साइकिल को हाथ नहीं लगाएगा ऐसे में वह अगले दिन से ऑटो रिक्शा करके यूनिवर्सिटी आने-जाने लगा मगर उसके घर से यूनिवर्सिटी जाने का रास्ता बहुत सीधा नहीं था, बीच-बीच में कई बार उसे ऑटोरिक्शा बदलने पड़ते  जिसमें उसे काफी समय लग जाता । यह बात पिता को भी बहुत अच्छे से पता थी इसलिए वे उससे जब तक मोटरसाइकिल नहीं खरीद जाती तब तक साइकिल से ही जाने को कहते हैं ।

  मगर रोहित को अब साइकिल से यूनिवर्सिटी जाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता । बेटे के जिद्द के आगे बेबस पिता एक सेकंड हैंड मोटरसाइकिल खरीद लाते हैं । घर लाने के बाद वे उसे खूब अच्छे से धो पोछकर चमकाने के बाद, लॉन में बैठे बेटे का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं थोड़ी ही देर में रोहित जब घर लौटता है तब सामने पुरानी मोटरसाइकिल देखकर वह सब कुछ समझ जाता है और उसे देखकर उसका चेहरा बिल्कुल लाल हो जाता है ।

  पिता, रोहित को बाइक देखते हुए मुस्कुराते हैं । उन्हें उम्मीद है कि उनका बेटा बाइक पाकर बहुत खुश होगा मगर वह उनसे बिना कुछ कहे गुस्से में अंदर चला जाता है रोहित की मां रोहित के मन की बातों को समझ जाती है और उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में चली जातीं हैं वे रोहित से कहती है 

  "देखो बेटा अभी तुम्हारे पिता का बजट नई गाड़ी को खरीदने को अलाउ नहीं करता वे तुम्हारे लिए पुरानी बाइक नहीं खरीदना चाहते थे मगर रोज-रोज ऑटो से जाने में तुम्हारा कीमती वक्त बर्बाद न हो इसलिए वे फिलहाल के लिए ये सेकंड हैंड बाइक खरीद लाए हैं । तुम्हें कुछ दिन इसी से चलना होगा अगले महीने की सैलरी आते ही हम तुम्हारे लिए एक नई बाइक खरीद देंगे"

तब रोहित कहता है

  "मां मुझे ऐसी खटारा बाइक से नहीं जाना तुम्हें पता है वहां मेरे दोस्त कैसी-कैसी बाइक से आते हैं और तुम चाहती हो कि मैं उनके सामने ये खटारा लेकर जाऊं यह मुझसे नहीं होगा"


मां रोहित को बहुत समझाने की कोशिश करती हैं मगर वह नहीं मानता वह बाइक छोड़ अभी भी ऑटो रिक्शा से ही यूनिवर्सिटी आया जाया करता है  । बेटे की मन की स्थिति को मां बाप भली-भांति समझती है मगर पैसों की दिक्कत आड़े आ रही है किसी तरह से इंतजाम करके पिताजी ईएमआई पर बेटे के लिए बाइक खरीदने की सोचते हैं मगर बेटे की पसंद भी काफी ऊंची है जिसकी ईएमआई चुका पाना काफी मुश्किल होगा फिर भी बेटे की सपनों को साकार करने के लिए पिता ऊंची ईएमआई पर बेटे की फेवरेट बाइक घर लाते हैं ।अब बेटा खुशी-खुशी बाइक से यूनिवर्सिटी आने जाने लगता है । 
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  कुछ ही दिनों में रक्षाबंधन का त्यौहार आता है बेटा इस मौके पर अपने लिए 2 जोड़ी कपड़ों की मांग रखता है तब उसके पिता कहते हैं

  "रक्षाबंधन में भला कौन नए-नए कपड़े सिलवाता है और तुमने तो अभी होली में ही जींस और टीशर्ट ली थी ।
  "पिताजी मैंने बताया ना मैं अब बड़ा हो चुका हूं और यूनिवर्सिटी में पढ़ता हूं वहां मेरे दोस्त रोज रोज नए नए कपड़े पहन कर आते हैं जबकि मेरे पास सिर्फ दो ही सेट कपड़े हैं जिन्हें मैं रोज बदल-बदल कर कर जाता हूं मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं" लगता मुझे और कपड़े चाहिए
रोहित पिता से कहता है तब पिता उसे समझाते हैं 

  "देखो बेटा तुम उन लोगों से अपनी बराबरी मत करो उन उनकी आर्थिक स्थिति क्या है ? उनके पिता क्या काम करते हैं ? वे महीने में कितना पैसा कमाते हैं ? ये सब तुम्हें नहीं पता ऐसे में तुम उनकी बराबरी ना ही करो तो अच्छा जहां तक उनकी बराबरी का सवाल है तो हमारी आमदनी इतनी नहीं है कि जो तुम कह रहे हो वह हम कर सके बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चल पा रहा है ऐसे में यह सब कर पाना हमारे बस की बात नहीं है"

  तब बड़े गुस्से में बेटा कहता है 

  "आप लोगों के बजट में कुछ भी नहीं है सिवाय बेकार के लेक्चर के रही बात आमदनी की तो आपकी आमदनी भी किसी से कम नहीं है बस फर्क इतना है कि आप लोग खर्चों को मैनेज करना नहीं जानते हैं जहां पैसे खर्च करने चाहिए वहां तो आप लोग करते नहीं हो और इधर उधर बेकार में पैसे बर्बाद करते हो"


रोहित की मां उसे टोकते हुए कहती है 

  "नहीं बेटा ऐसा नहीं है" 

मगर मां को बीच में रोकते हुए बेटा कहता है 

   "हां ऐसा ही है अब पिछले महीने का ही ले लो तुम लोगों ने जो घर में पूजा पाठ कराया अगर बात पूजा-पाठ तक ही रहती तो ठीक था मगर बेकार में सारे रिश्तेदारों, दोस्त-मित्र, पिताजी के ऑफिस के स्टाफ को बुलाकर उन्हे दावत देने की क्या जरूरत थी इतने पैसों में तो मेरी बाइक और मेरे लिए कई जोड़े कपड़े भी आ गए होते मगर वह ज्यादा जरूरी था यह जरूरी नहीं है इसके लिए आपके पास पैसे नहीं है"

ये बहस काफी देर तक यू ही चलती रही और आखिरकार हार मान कर पिता बेटे को 2 जोड़ी कपड़ों के लिए पैसे दे देते हैं परंतु रोहित की फरमाइशें खत्म होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है । मना करने पर उसका वही जवाब होता कि आप लोगो को खर्चे मैनेज करने नही आया

  तंग आकर एक दिन पिता ने डाइनिंग टेबल पर रोहित के हाथ में अपने एक महीने की पूरी पगार रख दी रोहित उन पैसों को देखकर कुछ समझ न सका तब पिता ने उससे कहा 

"तुम बार-बार कहते हो कि हम खर्चों को मैनेज नहीं कर पाते तो आज के बाद से घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी अब तुम्हारी है यह रही मेरी पूरे एक महीने की पगार जिसे मैं तुम्हें दे रहा हूं अब इन्ही पैसों से तुम्हें घर का सारा खर्च मैनेज करना है"


बेटे के आगे घर में आने वाले महीने के सामानों की एवं अन्य खर्चो की लिस्ट लखते हुए वे कहते हैं 
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"यह रही इस घर में आने वाले सामानों एवं अन्य खर्चों की लिस्ट हमें ज्यादा कुछ नहीं बस दो जून की सूखी रोटी ही चाहिए बाकी कुछ नहीं, तुम अब जैसे चाहो वैसे मैनेज करो और इसमें से अगर कुछ बच जाए तोउसे तुम रख सकते हो हां मगर ध्यान रहे आज महीने की 7 तारीख है और अगली तनख्वाह मुझे अगले महीने की 7 तारीख को ही मिलेगी तो इसके बीज ना मैं तुम्हें कोई पैसा दूंगा और ना तुम मुझसे किसी पैसे की उम्मीद करना"

बेटे ने जब घर के सामानों की और अन्य खर्चों की लिस्ट पर निगाह डाली तो वह मुस्कुरा उठा क्योंकि वाकई में खर्चों के सामने पैसे काफी ज्यादा थे ।

तकरीबन दो महीने गुजर गए और इस पूरे महीने के घर खर्च को रोहित ने बहुत अच्छे से मैनेज किया । इन महीनो के आखिर में उसने तकरीबन 5000 रूपये भी बचा लिए बच्चे पैसों से उसने अपने सभी दोस्तों को पार्टी दी । सभी दोस्त उसकी पार्टी से बहुत खुश होते ।

  घर के कुछ खर्च ऐसे भी थे जो दो-तीन महीने में एक बार ही दिए जाते थे । रोहित ने खुशी-खुशी सभी खर्चे मैनेज कर लिए मगर इसके कारण महीने की 25 तारीख आते-आते उसके सारे पैसे खत्म हो गए अभी भी पिता से पैसा मिलने में दस-बारह  दिन बाकी थे रोहित करें तो क्या करें ? कोई रास्ता ना देख उसने पिता से कुछ पैसे मांगने की सोची ।

  मगर पिता ने उसे अपनी पुरानी बात याद दिलाते हुए अपने अगले महीने की तनख्वाह का चेक थमाया और बाहर चौराहे की ओर निकल पड़े । रोहित समझ गया कि अब सारा बंदोबस्त उसे ही करना पड़ेगा ऐसे में उसने ना चाहते हुए भी अपने दोस्तों से तकरीबन दस हजार रुपये उधार लिए इन पैसों से किसी तरह महीने भर का खर्चा चल गया और देखते ही देखते अगले महीने की 7 तारीख आ ही गई ।

  मगर यह तारीख उसे इस बार कोई खुशी देने की बजाय काफी मानसिक तनाव दे गई क्योंकि एक तो उसने अपने दोस्तों से पहले ही काफी रूपये उधार ले रखे थे था वहीं इस महीने आस-पड़ोस और नात रिश्तेदारीयों से शादी विवाह एवं अन्य फंक्शन में आने के लिए आमंत्रण भी खूब आए हुए थे । अगर वहां खाली हाथ जाने तक की बात होती तब तो कुछ गनिमत थी मगर वहां जाने मे और भी खर्चे थे जिसके लिए काफी पैसों की आवश्यकता थी । इन सब तैयारियों में तकरीबन आधे से अधिक तनख्वाह खर्च हो गई जबकि अभी पूरा महीना बाकी था ।

  उधर घर मे पड़े पुराने स्टॉक के धीरे-धीरे खत्म हो जाने के कारण घर के सामानों को खरीदारी भी इसबार ज्यादा करनी थी जबकि रोहित की जेब में अब फूटी कौड़ी तक नहीं बची थी ।

  उधर दोस्तों से लिया गया उधार भी उसकी रातों की नींद हराम कर रखा था अब रोहित इस महीने का खर्च चलाएं तो कैसे ? मजबूरन रोहित ने एक मोटी रकम अपने कुछ दोस्तों से उधार ली परंतु इसबार उधार लेते वक्त ही रोहित ने यह तय कर लिया कि वह कैसे भी करके कर्ज को और ज्यादा बढ़ने नही देगा ।

  कर्ज चुकाने के लिए उसने अपने सारे ऐशो-आराम त्याग दिये धीरे-धीरे कई महीने गुजर गए इन महीनों में ना ही उसने नए कपड़े सिलवाए और ना ही किसी दोस्त को कोई पार्टी दी । खर्च का बोझ देखते हुए उसने अपनी अपनी बाइक भी बेच डाली ।

  इस तरह काफी जद्दोजहद के बाद उसने खर्चो और कमाई के बीच संतुलन बनाने में कामयाब हासिल की मगर इस कामयाबी में उसे अपनी गलतियों का एहसास हो चुका था जैसे ही उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ उसने फौरन पिता से अपनी गलतियों की माफी मांग ली वह समझ चुका था कि उसके माता पिता कैसे और किस तरह तिनका तिनका जोड़कर इस घर चलाते हैं और इसके साथ-साथ उसकी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिशों को भी पूरा करने की कोशिश करते हैं इस दिन के बाद से रोहित ने कभी भी अपने माता-पिता पर किसी भी फरमाइश का दबाव नहीं डाला ।

कहानी से शिक्षा | Moral Of This Best Inspirational Story In Hindi 


इस कहानी से हमें दो शिक्षा मिलती है

हमारे माता पिता कितने कष्ट झेल कर और कितने जतन से हमारा पालन पोषण एवं हमारी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखते हैं हमें इस बात का हमेशा एहसास रहना चाहिए !

अति आत्मविश्वास में दूसरों में कमी निकालने से पहले उसे भलीभांति समझना आवश्यक है!

      




   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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