18 October, 2018

आत्म मूल्यांकन व व्यक्तित्व विकास Self Evaluation Short Story In Hindi

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आत्म मूल्यांकन का चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास मे भूमिका पर कहानी स्वमूल्यांकन द्वारा चरित्र निर्माण| self-assessment or self evaluation short hindi story

स्वमूल्यांकन द्वारा चरित्र निर्माण | Self-Assessment Short Hindi Story



  एक ही गांव के रहने वाले मोहन और गोपाल बचपन से ही साथ-साथ पले-बढ़े जिसके फलस्वरूप उनमे काफी गहरी दोस्ती थी । संजोगवंश दोनों को एक ही दिन संतान सुख की प्राप्ति हुई । जहां मोहन को पुत्र प्राप्त हुआ, वहीं गोपाल को एक सुंदर कन्या प्राप्त हुई ।
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एक दिन गोपाल ने मोहन से अपनी इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का विचार जाहिर किया । गोपाल की बात को सुनते ही मोहन बहुत खुश हुआ । उसे ऐसा लगा मानो गोपाल ने उसके मुँह की बात छीन ली हो । उसने सहस्र गोपाल की बातों को स्वीकार करते हुए इस रिश्ते के लिए हां कर दी ।

  कुछ ही दिनों में गोपाल की बेटी पूनम का, मोहन के बेटे प्रदीप से विवाह हो गया ।धीरे-धीरे दोनों के बच्चे बड़े हो रहे थे । बच्चो के बढ़ने के साथ-साथ जहां एक तरफ प्रदीप के माता पिता को अपार हर्ष हो रहा था । वहीं पूनम के माता पिता की चिंताएं बढ़ती जा रही थी ।

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  असल में पूनम काफी जिद्दी एवं झगड़ालू स्वभाव की थी । वह अपनी बात के आगे किसी को कुछ नहीं समझती । उसके इसी स्वभाव के चलते एक दिन उसकी माँ उससे कहती है 

 "अब सुधर जा, अपनी आदतों में थोड़ा सुधार ला । कब तक ऐसे बात-बात पर सबसे झगड़ती रहेगी । कुछ ही दिनों में तेरी विदाई होने वाली है । तू अपने ससुराल चली जाएगी फिर क्या वहां भी यही रंग-ढंग ले के जाएगी । क्या हमारी वहां नाक कटवाएगी तू बड़ी हो चुकी है ये कब समझेगी"

 तब पूनम कहती है 

 "सुधारना मुझे नहीं सुधरना तुम लोगों को चाहिए । हर बात पर मुझे सुधरने की बात करते रहते हो उससे पहले जरा खुद को भी देख लो"

  दोनों में काफी देर तक बहस चलती रहती है पर पूनम अपनी हार नहीं मानती  ।

 घर पर रामायण का कार्यक्रम आयोजित होता है । इस कार्यक्रम के लिए पूनम ने कस्बे की एक दुकान पर काफी महंगा लहंगा देख रखा है । जब पूनम लहंगे के लिए माँ से पैसे मांगती है तब माँ, "इतने महंगे लहंगे के लिए अभी बजट नहीं है" ऐसा कहकर उसे पैसा देने से साफ मना कर देती है । लहंगे के पैसे के लिए ना सुनते ही पूनम झल्ला जाती है । वह बिना कुछ खाए पिए बैग उठाए कॉलेज निकल जाती है । उधर माँ बेटी को भूखा देख नहीं पाती वह उसका टिफिन लिए उसके कॉलेज पहुंच जाती है । 

  शाम को जब पूनम घर लौटती है तो माँ आंगन में बर्तन धुल रही है । तभी पूनम अपने बैग से टिफिन निकाल उसे माँ की ओर जोर से सरका देती है । माँ के हाथों से जब टिफिन टकराता है तब वह थोड़ा भारी महसूस होता है । टिफिन मे सारा खाना जस का तस यूं ही पड़ा है । पूनम ने उसमे से कुछ भी नही खाया ।

  माँ समझ जाती है कि पूनम की बाई नाक पर बैठा गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ । वह उसे समझाने की बड़ी कोशिश करती है और जल्दी-जल्दी शाम का भोजन बनाती है परंतु खाने की बात तो छोड़िए वह तो पानी भी हाथ लगाने को तैयार नहीं है । जब यह बात पूनम के पिता को पता चलती है तब वह पूनम की माँ को बहुत डाटते हैं । वह अपनी प्रिन्सेज पूनम का हाथ थामे उसे बाजार की ओर चल देते हैं । इसतरह पूनम को उसका फेवरेट लंहगा मिल जाता हैं हालांकि यह सब कोई नई बात नही है  जिद्द और झगड़लूपन पूनम की आदतों में शामिल है । 
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  कार्यक्रम का दिन आ जाता है नात-रिश्तेदार के साथ-साथ पूनम के ससुराल वाले भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित हैं । घर और बाहर चारों तरफ काफी भीड़ है । पूनम की सास भी इस मौके पर आई हुई हैं । वह आंगन में बैठी पूनम का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही हैं । 

  तभी पूनम बालों में जुड़ा बांधे सजधज कर अपने कमरे से बाहर निकलती है और सीधे बाहर की ओर रुख करती है । तभी उसकी सास उसे आवाज लगाती हैं । सास की आवाज सुनते ही पूनम ठहर जाती है तब सास उससे कहती हैं 

 "अरे बेटा बाहर तुम्हारे पिताजी और दूसरे रिश्तेदार भी आए हुए हैं । कम से कम सर पर पल्ला तो रख लो"
  तब पूनम कहती है 

 "मैंने पूरे एक हजार खर्च करके अपनी हेयर स्टाइल बनवाई है और मेकअप करवाया है । आखिर ये सब किसलिए ? क्या सर पर पल्ला रखने के लिए ? जाओ मैं नहीं रखती सर पर पल्ला"

  पूनम के सास उसे समझाने की बहुत कोशिश करती है परंतु उनकी एक नही सुनती  और बाहर निकल जाती है । पूनम की सास को यह बहुत बुरी लगती है ।
  वह मोहन से कहती है 

 "जाने किस मनहूस घड़ी में आपने हमारे लल्ले का रिश्ता इस लड़की से करा दिया । आप देखना जिस दिन यह लड़की घर में आएगी उस दिन के बाद हमारे घर की सारी खुशियां छीन जाएंगी । ये लड़की हमारे घर में भी दो फाड़ करा के ही मानेगी । मेरी मानो तो गोपाल से हाथ जोड़कर माफी मांग लो और इस रिश्ते को यही छोड़ दो । इसी में हम सबकी भलाई है"

  तब मोहन कहते हैं 
 "ऐसा नहीं हो सकता मैं अपने दोस्त के साथ ऐसा कभी नहीं कर सकता"
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  कुछ ही दिनों में पूनम की मौसी की छोटी बेटी शिखा का विवाह तय हो जाता है । पूनम अपने माता-पिता के साथ शिखा के घर पहुंचती है । अभी वह हाल में कदम रखने ही वाली होती है की तभी घर के अंदर से कुछ गरमा गरम बहस की आवाज सुनाई देती है । वह पर्दे के पीछे ही ठमक जाती है । अंदर शिखा की बड़ी बहन और उसकी माँ उसे समझाने में लगी है ।

 "ऐसे बात बात में झगड़ना अच्छी बात नहीं है । तुम्हारे अंदर अब थोड़ी शालीनता आनी चाहिए । आखिर तुम कब बड़ी होगी"

 तभी उनकी बात बीच में काटते हुए शिखा की बड़ी बहन माँ से कहती है 

 "नहीं-नहीं माँ ये क्यों सुधरेगी आखिर इसे भी तो लोग पूनम की छोटी बहन कह के पुकारते हैं तो फिर ये क्यों उससे एक कदम पीछे रहेगी । जैसे उसने अपने झगड़ालू रवैया से टोले-मुहल्ले, नात-बात हर जगह सब की नाक कटा कर रख दी है वैसे ही यह भी करेगी । उसकी सास तो उससे पिंड छुड़ाना चाहती है । मगर मोहन अंकल, मौसा के चलते ऐसा नहीं कर पा रहे हैं नही तो भला ऐसी झगड़ालू लड़की को कौन अपने घर की बहू बनाना चाहेगा"

 हर कोई दूसरों के लिए उदाहरण बनना चाहता है परंतु ऐसा उदाहरण शायद कोई भी नही बनना चाहता । पर्दे के पीछे खड़ी  पूनम बूत बने उनकी बातें सुन रही थी परंतु अपने बारे मे ये सब सुनकर भी उसे जरा भी गुस्सा नही आ रहा बल्कि उसके चेहरे पर शर्मिंदगी की लकीरे साफ देखी जा सकती हैं । वहीं पीछे सूटकेस लिए पूनम के माता-पिता चुपचाप खड़े हैं । तभी उनकी खामोशी को तोड़ते हुए पीछे से पूनम के मौसा जी ने आवाज लगाई ।     

 "अरे आप लोग यहां बाहर क्यों खड़े हैं अंदर चलिए"

  थोड़ी दिनों में शिखा की शादी निपट जाती है परंतु शादी में पूनम अपने आप में ही कहीं खोई हुई है । कुछ ही दिनों में पूनम की भी विदाई का दिन आ जाता है । वह विदा होकर अपने ससुराल चली जाती है । 

  उसे गए हुए लगभग छः महीने बीत चुके हैं मगर इन छः महीनों में न कभी गोपाल ने पूनम को फोन किया और न ही कभी उसके ससुराल जाने की सोची हालांकि जब भी फोन की घंटी बजती है तब गोपाल का सीना धक से करता हैं उनको लगता है जैसे मानो वो फोन पूनम के ससुराल से ही आया होगा । जहां उसकी ढेरों शिकायतों की एक लम्बी फेहरिस्त होगी ।

  तभी अचानक पूनम के ससुर की तबीयत काफी बिगड़ जाती है । जिसके कारण पूनम के पिता को मजबूरन उन्हें देखने जाना पड़ता है । गोपाल, बेटी के ससुराल तो पहुंच गए हैं परंतु घर के अंदर दाखिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है परंतु पिता की पूर्वाग्रह के बिल्कुल विपरीत पूनम के ससुराल में उसका भव्य स्वागत होता है । ऐसी खातिर जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा । ऐसा देखकर पूनम के पिता गदगद हो उठते हैं । 

  पूनम के ससुराल वाले पूनम की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं । पूनम के पिता गर्व से बेटी के सर पर हाथ फेरते हैं और चुपचाप घर वापस लौट आते हैं ।
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कहानी से शिक्षा | Moral Of This Best Inspirational Story In Hindi


इस कहानी से हमें तीन शिक्षा मिलती है !

व्यक्तित्व के विकास के लिए समय-समय पर आत्म मूल्यांकन आवश्यक है !

बच्चों की हर जिद्द को पूरा करना उन्हें गर्त में डालने के समान है !

इस संसार में दोस्ती का रिश्ता हर रिश्ते से ज्यादा महत्वपूर्ण है !

दोस्तों कभी-कभी हम अपने आप में इतने खो जाते हैं कि हमें हमारी गलतियां कभी नजर ही नहीं आती । जिसके कारण हमें कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है । इस शर्मिंदगी से बचने का सबसे सरल उपाय ये है कि हम जिंदगी की आपाधापी से थोड़ा वक्त निकाल कर अपना आत्म मूल्यांकन करें ।

  हम अक्सर दूसरों के विषय में ही सोचते रहते हैं और बस उनकी ही अच्छी बुरी की बातों का मूल्यांकन करते रहते हैं । मगर कभी खुद को नही आकते, खुद का मूल्यांकन करना कभी आवश्यक नही समझते । जो कि गलत है ।

  जिस तरह से पूनम को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी वैसा आपके साथ न हो, आप भी दूसरों के लिए ऐसा Negative Example ना बने । इसके लिए बहुत जरूरी है कि आप अपना आत्म मूल्यांकन करें । कहीं आप से कोई गलती तो नहीं हो रही क्या आप भी किसी ऐसे Behaviour के शिकार तो नहीं हो रहे जो चल आपको शर्मिंदा कर सकता है ।
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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  

                             

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