06 October, 2019

दो सहेलियाँ कहानी | चने से सही परवरिश की सीख: कहानी| अनुराग और प्रेरणा

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दो सहेलियाँ चटपटी, मजेदार व प्रेरणादायक कहानी| चने पर सही परवरिश की सीख देती हिन्दी स्टोरी| अनुराग और प्रेरणा| Short Motivational story of two female friends

  आईटी प्रोफेशनल मीरा ने अपनी जॉब छोड़ने का फैसला तब किया जब अनुराग ने उसकी जिंदगी में कदम रखा । आज अनुराग लगभग तेरह साल का होने को है परंतु आज भी मीरा उसे कुछ वैसे ही प्यार- दुलार करती है जैसे एक मां अपने दूध मूवे बच्चे से करती है ।
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अनुराग को अपने हाथों से नहाना-धुलाना, उसके बाल कंघी करना, उसे अपने हाथों से नाश्ता कराना  और फिर उसे स्कूल के लिए छोड़ने जाना । वापस स्कूल से घर लौटने पर उसके कपड़े खुद उतारना और फिर अपने हाथों से उसे खाना खिलाना, हद्द तो तब हो जाती जब शादी पार्टी में भी मीरा अपने बच्चे को अपने पास बिठाए, उसे अपने हाथों से उसे खिलाती-पिलाती  नजर आती जिसे देख उसकी सहेलियां, उसकी खुब चुटकी लेती परंतु मीरा को इन सब बातों की कोई परवाह नहीं थी ।

एक दिन मीरा के कॉलेज की बेस्ट फ्रेंड दिव्या ने उसके घर के बाहर दस्तक दी । दरवाजा खुलते ही, लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय के बाद दोनों सहेलियां आमने सामने थी । वे इस पल की खुशी के पल को समेट नहीं पा रही थी । दोनों में काफी देर तक बातें चलती रही मीरा की सखी ।

  दिव्या अपनी बेस्ट फ्रेंड के बेटे को अपने सामने पाकर बहुत खुश है वह अनुराग को बहुत प्यार करती है परंतु कुछ ही दिनों में दिव्या की आंखों में भी मीरा का अपने बच्चे के प्रति यह प्यार दुलार खटकने लगता है परंतु वह अपनी सखी के स्वभाव से भलीभांति परिचित हैं इसलिए वह इसबारे मे उससे कुछ नही कहती ।

एक दिन जब दिव्या बेडरूम में सो रही होती है तभी   उसे किचन में किसी के बड़बड़ाने की आवाज सुनाई देती । वह बेड पर पड़े अपने दुपट्टे को खीचें, बड़ी तेजी से किचन की ओर भागी ।

 परंतु वहां कोई नहीं है, सिवा मीरा के जो बड़े ही गुस्से में पानी में भिगोए चनो को बाहर निकालते हुए बड़बड़ा रही है

  "जब खाना नहीं रहता तो भिगोते क्यों है"

दिव्या से रहा नही जाता वह उससे पूछ बैठती है

"क्या हुआ यार, इतनी सुबह-सुबह तू किसपर चिल्लाये जा रही है । यहां तो कोई भी नही है"

मीरा "कुछ नहीं यार, यह इनका रोज का नाटक है । पहले तो चने भिगोने को कहेंगे और फिर उसे खाए बगैर ही ऑफिस निकल जाएंगे"
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दिव्या मुस्कुराते हुए "वाह यार जीजा जी की पसंद मुझसे कितनी मिलती है । मुझे भी भीगे चने बहुत पसंद है तु इन्हें ऐसे ही छोड़ दे । जब मुझे खाना होगा तो मैं इन्हें निकाल लूंगी"

मीरा "अच्छा बाबा, पर इन्हे मुझे निकाल तो लेने दे । वरना ये खराब हो जाएंगे"

"मै कर लूंगी तू चल मै तेरे लिए कॉफी बनाकर लाती हूं"
(ऐसा कहते हुए दिव्या, मीरा को किचन से बाहर लाती है)

शाम होने को है मगर दिव्या ने चने नहीं खाए ऐसे में मीरा एक बार फिर चनों को पानी से बाहर निकालकर, प्लेट में रखते हुए कहती है
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"ये दिव्या भी न, जरा भी नहीं बदली बिल्कुल वैसी की वैसी ही है । सुबह ही चने खाने की बात कही थी, मगर अभी तक एक दाना भी नहीं छुआ"

पीछे से दिव्या मीरा से लिपटते हुए कहती है

"अरे यार जब मैंने कह दिया कि मै खाऊंगी तो मैं खाऊंगी । तु इन्हे ऐसे ही रहने दें"
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मीरा "अच्छा ठीक है पर तू समझती क्यों नहीं, चनो को ज्यादा देर तक भिगोना ठीक नही, इन्हे आठ से दस घंटे ही भिगोना काफी है वरना ये खराब हो सकते है क्योंकि अब इन्हे ज्यादा पानी की नही बल्कि हल्की नमी की आवश्यकता है जिसके बलपर ये खुद-ब-खुद विकसित (अंकुरित) होकर अपने अंदर नए गुणों एवं क्षमताओं का विकास करेंगे और इस प्रकार यह पहले से और ज्यादा बेहतर साबित होगे"

"ओह तो ये बात है"
(दिव्या ने मीरा से कहा)

मीरा "हां"

  "तो ये सारी बातें तु खुद क्यूँ नहीं समझती.. . मेरा मतलब है तुम अनुराग को जिस प्रकार एक दूध मूवे बच्चे की भांति लाड प्यार दे रही हो, अनुराग, उम्र के उस पड़ाव से काफी आगे निकल चुका है । जिसप्रकार इन चनो को अब ज्यादा पानी की नही बल्कि हल्की नमी की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार अब अपने अनुराग को भी इस प्रकार के लाड की आवश्यकता नहीं है । उसे तो बस तुम्हारे  थोड़े गाइडेंस की जरूरत है जिसके बल पर वह खुद से सारे काम करना सीख जाएगा और इस प्रकार उसमें में नय गुणों एवं क्षमताओं का समावेश होगा परंतु यदि तुम यूँ ही हमेशा उसकी बैसाखी बनकर, उसके साथ खड़ी रहोगी तो वह कभी भी मजबूत नहीं बन सकेगा परिणास्वरूप वक्त के हल्के थपड़े भी उसपर भारी पड़ेंगे और वह  उन्हे सहन नही कर पाएगा और लड़ने से पहले ही हार स्वीकार कर लेगा"

दिव्या, मीरा को समझा जरूर रही थी किन्तु उसके स्वभाव के नाते वह अन्दर ही अन्दर थोड़ा डर भी रही थी परंतु दिव्या के डर के विपरीत मीरा उसकी बातों को सुनकर जरा भी क्रोधित नहीं हुई बल्कि वह अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान जगाए, दिव्या के बाल खीचते हुए बोली

"तु तो बड़ी समझदार हो गई है ..   तुमने आज मुझे मेरी गलतियों का एहसास करा दिया"
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कहानी से शिक्षा | Moral Of This Short Inspirational Story In Hindi


दोस्तों, यदि आप वाकई अपने बच्चों का सुनहरा भविष्य देखना चाहते हैं तो उनकी बैसाखी बनने की बजाय उनका मार्गदर्शक बनिए, उन्हें सिर्फ रास्ते दिखाइए और उन्हें अपना रास्ता खुद तय करने दीजिए क्योंकि यदि आप अपने बच्चों को उनके हर काम के लिए उन्हे छोटा समझकर उनके सारे काम खुद करेंगे, उनकी हर कठिनाइयों को खुद दूर करने में लग जाएंगे तो यकीन माने आपका बच्चा, हमेशा बच्चा ही बना रहेगा वह कभी बड़ा नहीं होगा इसलिए यदि आप अपने बच्चे को बड़ा होते देखना चाहते हैं, तो उसे पहले छोटे-मोटे और फिर बड़ी मुश्किलों का सामना खुद करने दीजिए क्योंकि इन्ही मुश्किलो से लड़कर उसके अंदर गुणो का समावेश होगा और जिसके बल पर वह एकदिन सफलता के शीर्ष पर नजर आएगा ।

   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  

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