"मां-मां, कहां हो मां"

लाइट चले जाने से, किचन में लैंप जला रही, आठ माह की गर्भवती आकांक्षा, बेटे की चीख-पुकार को सुनकर, भागे भागे उसके पास पहुंचती है ।

"क्या हुआ, जरा सा अंधेरा हुआ नहीं कि चीखने चिल्लाने लगते हो, आखिर तुम कब बड़े होगे"

दस साल का वीरू अंधेरे से बहुत डरता है । एक पल भी अंधेरा हो जाए तो वह चीखने चिल्लाने लगता है । हालांकि आकांक्षा ने उसे काफी समझाने की कोशिश की परंतु अंधेरे के प्रति उसका डर जस का तस बरकरार है ।

 कुछ ही महीनों में वीरू को अपनी छोटी बहन मिल जाती है । वह अपनी बहन रिमझिम को बहुत प्यार करता है और उसका बहुत ख्याल भी रखता है जिसके कारण छः महीने की हो चुकी रिमझिम का लगाव वीरू के प्रति देखते ही बनता है, वह उसे एक पल के लिए भी अपनी आंखों से ओझल होने नही देना चाहती ।

एक दिन आकांक्षा जब पड़ोस में दूध लेने के लिए गई होती है तभी अचानक घर की लाइट चली जाती है । वीरू बेड पर रिमझिम के साथ लेटा हुआ है । लाइट जाते ही वह काफी घबरा जाता है उसकी धड़कने तेज होने लगती हैं, इस घनघोर अंधेरे में उसे किसी के आस-पास होने का डरावना एहसास हो रहा है ।

किसी के होने की आशंका से वीरू के हाथ पांव फूलने लगते हैं । अगले ही पल व रिमझिम का हाथ छुड़ा तेजी से कमरे से बाहर भाग जाता है । बाहर लोगो की चहल पहल और आती-जाती गाड़ीयो से फैला उजाला है काफी अच्छा एहसास करा रहा है । वहां पहुंचकर वह एक सुकून भरी सांस लेता है, मानो जान बच गई हो । 

अभी उसने चैन की सांस ली ही थी कि तभी उसे अंदर बेड पर सो रहे रिमझिम की याद आती है, उसे उसके कोमल हाथों का स्पर्श याद आता है, उसे याद आता है कि उसकी प्यारी बहन तो उस घनघोर अंधेरे में अकेले बिस्तर पर पड़ी हुई है ।

बहन की याद आते ही वीरू खुद को विचित्र परिस्थितियों से घिरा हुआ पाता है क्योंकि जिस आफत से जान बचाकर वह अभी-अभी बाहर आया है, दुबारा उसी आफत में वह खुद को कैसे झोंके ? वहीं दूसरी तरफ बहन का मोह उसे फिर उसी मुसीबते मे वापिस जाने के लिए विवश कर रहा है ।

आखिरकार बहन के प्यार की जीत होती है, अंधेरे को चीरता हुआ वीरू हवा के झोंके की तरह बेडरूम में दाखिल होता है और फिर बहन को गोद में उठाए वह बड़ी ही तेजी से बाहर की ओर ऐस भागता है, मानो वह बेडरूम से नही बल्कि मौत के मुख से अपनी जान बचाकर भाग रहा हो ।

बाहर पहुंचकर वह एक बार फिर बड़ी राहत की सांस लेता है परंतु थोड़ी ही देर में गोद में सो रही रिमझिम के कोमल हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगते हैं । वीरू को एहसास होने लगता है कि इतने कड़ाके की ठंड में रिमझिम को ऐसे खुले आसमान मे रखना ठीक नहीं है ।

इसप्रकार वह फिर एक बार दुविधा की स्थिति में है परंतु फिर एक बार बहन के प्यार की जीत होती है और बेचारा वीरू डरते-डरते अंधेरे कमरो से होता हुआ किचन में कदम रखता है वहां पहुंचकर वह जल्दी-जल्दी लैंप जलाने के लिए अक्सर स्लैब पर पड़ी रहने वाली माचिस को ढूंढने की कोशिश करता है परंतु डर से उत्पन्न हड़बड़ी में अचानक उसका हाथ पास पड़े लैंप से टकरा जाता है और इसप्रकार लैंप का शीशा नीचे गिरकर चकनाचूर हो जाता है ।इसप्रकार मुसीबत घटने की बजाय और बढ जाती है वह सोच में पड़ जाता है कि 

"यदि वह इस कपकपाती सर्दी में फिर से रिमझिम को बाहर लेकर जाएगा तो इसमे बहन के जान को खतरा है और अंदर अंधेरे में तो खतरा ही खतरा हैं"

फैसला लेना वीरू के लिए काफी मुश्किल हो रहा है । असमंजस की इस घड़ी में वह चुपचाप वही किचन में आंखें मूंद बैठ जाता है । जहां बार-बार किसी के पास होने की आहट उसे बहुत डरा रही है वहीं गोद में बैठी रिमझिम के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास उसे बहुत हिम्मत भी दे रही है, परिणास्वरूप जैसे जैसे वीरू को अपनी बहन के प्रति जिम्मेदारियां का एहसास होने लगता है वैसे-वैसे उसके मन का डर कम होने लगता है और आखिरकार व रिमझिम को लिए बेडरूम में चला जाता है । वह उसे अपने साथ रजाई में सुला लेता है और तभी अचानक गुल हुई बिजली लौट आती है । अचानक आयी तेज रौशनी की चुभन रिमझिम की कोमल आँखे सह नही पाती और वह जग जाती है । वह वीरू को देख मुस्कुराती है दोनो खेलने लगते हैं । 

कहानी से शिक्षा | Moral Of This  Short Motivational Story In Hindi


जिम्मेदारियों में वह शक्ति है जो हमें हमारे डर से लड़ने की ताकत देती हैं इसलिए जब कभी भी आपको कोई डर सताए तो आप अपनी जिम्मेदारियों को याद करना शुरू कर दीजिए, यकीन माने आपका डर आपके सामने एक पल भी टिक नहीं पाएगा !


   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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