12 November, 2017

खुद से जीतना होगा | Keep Confidence Motivational Story In Hindi



       स्कूल की पढ़ाई के बाद अशोक जॉब की तलाश में शहर पहुंचा, बड़ी मुश्किल से उसको एक FMCG कंपनी में मार्केटिंग की जॉब मिली हालांकि पैसे बहुत कम थे और शहर बड़ा होने के कारण खर्चे बहुत ज्यादा जॉब के शुरुआती सफर में उसने  बड़ी ही लगन और उत्साह का परिचय दिया। वो अत्यंत सुबह ही उठ जाता और तैयारी करके काम पर निकल जाता। जाॅब में उसे काफी मजा भी आने लगा, कुछ ही दिनों में कंपनी में उसका एक महिने पूरा हो गए। तनख्वाह तो मिल गई, मगर सेल काफी कम होने के कारण इंसेंटिव नहीं मिला साथ में बाॅस से ढ़ेरों डाँट और जॉब से निकाले जाने की धमकी भी मिल गई।
       अब तो अशोक की सारी खुशी काफूर हो गई। अब वो उत्साह से ज्यादा प्रेशर में काम करने लगा।
       मगर समस्या फिर वही थी बिक्री बहुत कम थी इधर बॉस का प्रेशर उधर मार्केट में रोज के धक्के खाना। अशोक मायूस हो गया। पर उसने कोशिश करनी नहीं छोड़ी। छः महीने गुजर गए, कंपनी में अशोक की परफॉरमेंस कुछ सुधरी जरूर पर वो संतोषजनक नहीं था। फलस्वरूप अशोक को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।       अब तो गांव वापस लौटने के सिवा अशोक के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। बड़ी ही उम्मीदों के साथ कमाने के लिए माता पिता ने अशोक को शहर भेजा था। पर ये क्या अशोक तो शुरुआती सफर में ही फेल हो गया था। अशोक ने इन परिस्थितियों में अपने दोस्तों से मदद की गुहार लगाई। दोस्तों की मदद से अशोक को वैसी ही एक दूसरी कंपनी में जल्दी ही जाॅब मिल गई।
       इस बार अशोक के पास अनुभव भी था। जिससे उसकी परफॉर्मेंस पिछली कंपनी से बेहतर थी। मगर कंपनी का प्रेशर और मुश्किलें बढ़ती जा रही थी। होली आने वाली थी। कंपनी से तीन दिनों की छुट्टी मिली तो मायूस अशोक उल्टे पांव गांव वापस लौटा। बस से उतरने के बाद घर जाने के लिए अशोक साधन का वेट करने लगा। उसके हाथ खाली थे, घरवालों को वो क्या जवाब देगा उसे समझ नहीं आ रहा था। वो कुछ सोचने लगा, सोचते-सोचते वो पास ही एक दुकान के चबूतरे पर बैठ गया।
       जिंदा दिल अशोक को वक्त के थपेड़ों ने बेजान बना दिया था। तभी वहां से अशोक के बचपन के मास्टर जी गुजरे, अशोक की ऐसी हालत देखकर मास्टर जी वही ठहर गए। उन्होंने दो बार अशोक-अशोक की आवाज लगाई। मगर बगल में बैठा अशोक न जाने किस दुनिया में गुम था। 
      मास्टर साहब ने उसे हिलाया, अशोक घबरा कर उठ खड़ा हुआ। मास्टर साहब को सामने देख उसने मास्टर साहब के पैर छुए मास्टरजी ने उससे उसके इस हालत का कारण पूछा तो पहले तो उसने ऐसी किसी बात से इंकार किया पर मास्टर साहब के दबाव के सामने उसका झूठ टिक नहीं सका। उसने उन्हें सारी बात बताई मास्टर साहब ने मुस्कुराते हुए बड़े ही प्रेम से उसका हाथ पकड़ा और उसे सामने ही एक चाय की दुकान पर ले गए। और दो चाय बनाने को कहा दुकानदार ने थोड़ा समय मांगा। वो अंगीठी में कोयला सुलगा रहा था। थोड़ी ही देर में अंगीठी में अच्छी आग हो गई। कोयला पहले काले से लाल और फिर सफेद होकर राख बनकर अंगीठी से नीचे गिरने लगा। मास्टर साहब चूंकि अंगीठी के पास ही खड़े थे। वो इस प्रक्रिया को बड़े ही गौर से देख रहे थे। इसलिए अशोक भी वह सब कुछ देख रहा था।
       चाय पीने के बाद दोनों एक कुम्हार के घर पहुंचे मास्टर साहब को एक घड़ा चाहिए था। मास्टर जी ने कुम्हार से घड़ा मांगा तो उसने कहा 
      "मास्टर जी घड़ा तो अभी कच्चा है"
 मास्टर जी "तो क्या वही दे दो पानी ही तो रखना है"
  कुम्हार - "क्यों मजाक कर रहे है, मास्टर जी कच्चा घड़ा क्या पानी सहन कर पाएगा। दो मिनट में ही गल कर फूट जाएगा।
मास्टर जी "तो क्या करना पड़ेगा"
 कुम्हार-  "इसे आग में तपाना पड़ेगा" 
     ऐसा कहकर उसने अपने सारे मिट्टी के कच्चे बर्तन आग में तपाने को रख दिए, और आग लगा दी।
      मास्टर जी अशोक के साथ वही बैठे रहे।
     काफी देर बाद कुम्हार ने आग में जले घड़े को मास्टर साहब को सौंप दिया। मास्टर जी अशोक के साथ घड़ा लेकर घर जाने लगे। 
      मगर तभी उनको रास्ते में एक सुनार की दुकान पड़ी अशोक के साथ मास्टर सुनार की दुकान में पहुंचे वहां सुनार सोने को सीधे आग में तपा कर आभूषण बना रहा था।
       मास्टर जी ने अशोक से कहा देखा अशोक आग वही है। जिसमें कोयला जलकर खाक हो गया। कच्ची मिट्टी का घड़ा जो बेजान था। आग मे तपने से उस में जान आ गई। वही यह सोना उसी आग में तपकर और अधिक मूल्यवान हो गया ।
       परिस्थितियां का सामना हर किसी को करना पड़ता है। कुछ बिखर जाते हैं, तो कुछ निखर जाते हैं।
           
                  Moral of the story :-

          परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं होती मुसीबतें हर किसी पर आती हैं, और हमारी व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। हमारा व्यक्तित्व इस बात पर निर्भर करता है। कि हम उन का मुकाबला किस प्रकार से करते हैं। जो लोग मुश्किलों से घबरा जाते हैं। वह बिखर जाते हैं, पर जो डटकर उनका सामना करते हैं वह निखर जाते हैं।
Writer -   Karan "GirijaNandan" 

            
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