06 November, 2017

एक ही सिक्के के दो पहलू Motivational Story In Hindi




       सरकार की बहुत सी योजनाओं के बावजूद भी औरतों  पर अत्याचार और हिंसा बंद नही हो रही  ये हमारे समाज के लिये बहुत ही दुःख की बात है ,वंदना जी जो की एक प्रोफ़ेसर  है और एक सामाजिक कार्यकर्ता है वह बहुत ही लगन से समाज के इस मुद्दे को उठा रही थी हर जगह, वह  ऐसी औरतों से मुलाकात कर रही थी जिनके साथ ऐसा कुछ भी हुआ था । एक दिन उनकी मुलाकात सरोज से हो गयी वह एक प्राइवेट स्कूल मे टीचर थी सरोज एक NGO से जुड़ी थी और वह एक जागरूकता प्रोग्राम चला रही थी जिसके तहत वह गर्ल्स कॉलेज मे जा कर अपनी बाते रखती
सरोज – महिलाओं की सुरक्षा और  सम्मान की जब बात होती है तो बाते बहुत ही अच्छी अच्छी बाते  होती हैं , बाते करने वाले बाते कर के चले जाते है  लेकिन आप को आगे की लड़ाई खुद ही लड़नी होती है , महिलाओं को अपने सम्मान और सुरक्षा के लिये खुद ही आगे आना होगा , जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते है  तो हमे लिंग समानता की भी  बात करनी होगी और भ्रूण हत्या को रोकना ही होगा , नारी की शिक्षा  के साथ उसकी सुरक्षा के लिये भी  लड़ाई लड़नी होगी ये दोनों बाते  एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, मैं आप के बीच भाषण नही देने आई हूँ आप का सहयोग चाहिए  ,
सरोज ने अपने जीवन के बारे मे बताना शुरू किया
सरोज - मेरी सास को एक पढ़ी लिखी लड़की चाहिए थी सास ही क्यों  ससुराल के सभी लोगो को, जैसे ही मेरी सास को पता चला मेरी बड़ी बहन इन्टर ही पढ़ी है  उन्होंने  रिश्ते के लिये एक दम से ना बोल दिया ,मेरी सास ने पूछा  मेरे पिता से  “आप ने कविता को आगे क्यों नही पढ़ाया “ तो मेरे पिता जी ने उनको बताया की कविता  “थोडा पढ़ने मे कमजोर थी इसलिए उसने इन्टर के बाद पढ़ाई छोड़ दिया “ मै अपनी बड़ी बहन से दो साल छोटी थी जब उनकी शादी की बात हो रही थी तब  मै इन्टर मे थी,  मेरी सास जाते जाते बोल गई “सरोज को पढ़ाओ  अपने छोटे बेटे से इसकी शादी कर दुँगी” मेरे पिता जी खुश हुए की कविता की ना सही सरोज की  शादी तय हो गई
पिता जी -  सुना बेटा तेरी सास ने क्या कहा, मन लगा कर पढ़ो
सरोज – मेरी सास कैसे हुई , जिसने मेरी बड़ी बहन से शादी नही की उस की बहू मुझे नही बनना (मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था उन लोगो पर)
पिता जी – तुम क्यों चिंता करती हो  कविता के लिये मैं दूल्हा ढूँढ़ लूँगा , बस तुम मन लगा कर पढ़ो ये परिवार बहुत अच्छा है बड़ी बेटी की ना सही छोटी बेटी की तो शादी तय हो गई । इस घर से रिश्ता हो जाये यही  बहुत है मेरे लिये आज के समय मे ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं
सरोज- मेरे पिता बहुत तारीफ कर रहे थे  उन लोगों की,  मुझे  क्या करना था  मुझे तो  बस पढ़ाई से मतलब  था सो मै पढ़ाई कर रही थी, शादी कहाँ होती है ये पिता जी को तय करना था ,कुछ दिनो के बाद  सचिन जी से मेरी बड़ी बहन कविता की  शादी हो गई वे बहुत अच्छे इन्सान थे
मैंने  ग्रेजुएशन पूरा किया और मेरी शादी उसी घर मे हो गई जिस घर ने  मेरी बड़ी बहन को इन्टर तक पढ़ने की वजह से अपने घर की बहू नही बनाया था
 ससुराल मे सब अच्छा चल रहा था मै माँ बनने वाली थी , एक दिन मै  अपने पति के साथ हॉस्पिटल गई वहाँ से आने के बाद  मैंने महसूस किया कि घर के सभी लोगो के चेहरे उतरे हुए थे
सरोज – क्या बात है  माँ जी सभी लोग कुछ टेंशन मे दिख रहे हैं , कुछ बात है क्या
सासु माँ – तुझे अजय ने कुछ नही बताया
सरोज – नही माँ जी
  अजय ने हॉस्पिटल से ही माँ को फोन कर के बोल दिया था इसलिए सब के चहरे पर ये टेंशन दिख रही थी शाम के समय  घर के सभी लोगों के  सामने अजय ने मुझसे कहा
अजय – सरोज तुम्हारे पेट मे जो बच्चा है वह लड़की है  , हम उसे नही रखना चाहते हैं , तुम कल चल कर अबॅार्शन  करा लो
मै अजय की बात सुन कर एक दम से अवाक रह गई
सरोज -  लड़की है तो क्या हुआ , मै भी लड़की हूँ माँ जी भी लड़की हैं मेरी ननद आरती भी लड़की है  , हम सब को जीने का हक़ है और तो क्या इसको नही। ये भी तो आप ही का खून है , एक औरत एक औरत की दुश्मन कैसे हो सकती है, माँ जी प्लीज मेरे बच्चे को इस दुनिया मे आने दे , आप भी माँ है एक माँ के दर्द को महसूस करें,
सासु माँ – मुझे कुछ  नही सुनना है बस कल जा कर अबॉर्शन करा लो , हमें लड़का ही चाहिए ये समझ लो  ( आरती कुछ कहने वाली थी  लेकिन सासु माँ ने उसे चुप करा दिया )
सरोज – क्यों माँ जी  मेरी बहन को तो आप लोगो ने इस लिये रिजेक्ट कर दिया था की वह पढ़ी ज्यादे नही थी , बहू चाहिए वो भी पढ़ी लिखी लेकिन बेटी नही चाहिए ,आरती के साथ भी आप ऐसा ही करती
मेरी लाखों दलीलों का उन पर कोई असर नही होने वाला था। मै इन को समझाती रही ये मुझे बस बच्चे को गिराने के लिये आदेश देते रहे , मैने सब के हाथ पाँव जोड़े मिन्नतें की लेकिन किसी का दिल नही पिघला  मै रोते हुए अपने कमरे मे चली गई , मै रात भर सो नही पाई। मै सोचती रही आज रात का ही बस समय है मै अपनी बेटी को कैसे बचाऊँ , लेकिन मेरे दिमाग ने सोचना बंद कर दिया था शायद
सुबह इन लोगों को बहुत ही जल्दी थी मेरी बेटी से छुटकारा पाने की ,मै चुपचाप अजय के साथ  हास्पिटल  के लिये निकल पड़ी रास्ते मे एक पुलिस चौकी पड़ी मै बाइक से वही कूद गई ,  पुलिस चौकी मे घुसते ही  आरती के फोन से मैंने अपने घरवालों को  तुरन्त फोन किया आरती ने ये फोन मुझे सुबह ही दे दिया था रात में मै  अपने घर फोन नहीं  कर पाई क्योंकि अजय ने मेरे फोन का सिम निकाल कर फोन सासु माँ को दे दिया था , अजय की हिम्मत नही हुई पुलिस चौकी के अन्दर आने की ,लेकिन मै  ये अच्छी तरह से जानती थी की  पुलिस से मदद नही मिलने वाली है ये लोग कोई न कोई उपाय जरुर कर लेगें  , अजय चौकी  से थोडा दूर हट कर घरवालों को फोन करने लगा उसकी नजर जैसे ही मेरे से हटी मै वहाँ से निकल गई और अपनी बेटी की जान बचा ली , किसी तरह से मै अपने घर पहुँच गई सुरक्षित , रास्ते मे ही मेरे घरवाले मिल गए  थे ,  दूसरे दिन अजय पूरे परिवार के साथ घर आया  मुझे ले जाने के लिये लेकिन मै नही गई, मैंने इसकी रिपोर्ट थाने पर की, आरती से मै आज भी मिलती हूँ वह  मेरी अच्छी फ्रेंड है , उसने अपने परिवार से कोई रिश्ता नही  रखा है । उन लोगो ने  जो व्यव्हार मेरे और मेरी बेटी के साथ किया उसके लिये उसने अपने पूरे परिवार से रिश्ता ख़त्म कर लिया  ।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है:-

 समाज की उन महिलाओं को आगे आना चाहिए जो समाज मे अपनी जगह बना चुकी है , जो समाज के लिये एक रोल मॅाडल बन चुकी है   जैसे टीचर्स, डॅाक्टर्स आदि इनकी बात हर कोई सुनेगा और उस पर अमल भी करेगा , आप बहुतों की जिन्दगी को सुधार और बचा सकती हैं क्योंकि आप एक औरत हो और एक औरत के दर्द को आप से बेहतर और कौन समझ सकता है

  Prabhakar
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