Lesson Of Success Motivational Story In Hindi, www.MyNiceLine.com


  पति के जाने के बाद सपना दुनिया में बिल्कुल अकेली हो गई । अब न कोई सपना की मदद करने वाला था और न कोई सपना को सही रास्ता दिखाने वाला । छोटे-छोटे बच्चों के साथ सपना की जिंदगी मझधार में फंस चुकी थी । पति के जमा किए पैसे भी धीरे-धीरे खत्म होने को थे । पहाड़ सी बन चुकी जिंदगी में जब कोई दूसरा सहारा सपना को नही दिखा तो सपना खुद ही अपना सहारा बनकर अपने और अपने परिवार के लिए, दो जून की रोटी का इंतजाम करने निकल पड़ी । 

  जिन लोगों से भी सपना के पति की जान पहचान थी उन सभी से उसने कहीं कोई काम दिलाने की गुजारिश की हालांकि बहुत कम दोस्त ऐसे होते हैं जो अपने दोस्त के जाने के बाद उसके परिवार का सहारा बनते हैं और अपनी दोस्ती निभाते हैं । उसके पति के दोस्त भी कुछ ऐसे ही थे उसके बार-बार कहने पर भी उनका ध्यान सपना की परेशानियों पर बिल्कुल नही गया मगर

  "मरता क्या न करता"

   उनके उसे अनदेखा करने के रवैये को भूलकर वह उनसे कहीं नौकरी दिलाने की बात बार-बार दोहराया करती ।

  तभी उसके पति के एक करीबी दोस्त को पता चला कि पास के ही बाजार में आंखों के एक डॉक्टर को अपनी क्लीनिक के लिए एक बंदे की जरूरत है । जब यह बात उससे सपना को पता चली तो अगले ही दिन वह डॉक्टर साहब के क्लीनिक खुलने से पहले ही वहां जा पहुंची ।

  करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद डॉक्टर साहब अपनी पुरानी स्कूटर फटफटाते हुए, वहाँ पहुंचे डॉक्टर साहब क्लीनिक खोलकर जैसे ही अंदर पहुंचे वह भी उनके पीछे-पीछे उनके क्लीनिक में पहुंच गई डॉक्टर ने उसके यहां आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह यहां नौकरी की तलाश में आई है । डॉक्टर साहब ने उससे उसके इस काम के अनुभवों के बारे में पूछा बस ये सुनते ही उसके तो जैसे प्राण ही सूख गए । 

  सपना भी उन्हीं परिवारों मे से थी जहां ये सोचा ही नहीं जाता कि उनकी लड़कियों को भी कभी नौकरी करनी पड़ सकती है ऐसे में उनकी पढ़ाई लिखाई कराना माता-पिता जरूरी नहीं समझते और अगर पढ़ा भी दिए तो इतना ही कि उसकी शादी में यह कहने को हो जाए कि हमारी लड़की पढ़ी-लिखी है । सपना के पास न हीं कोई डिग्री थी और न कोई अनुभव । 

  "डूबते को तिनके का सहारा" 

  इस नौकरी को लेकर कुछ ऐसी ही उम्मीद सजोए आई थी सपना, मगर डाक्टर के इस सवाल ने उसे नर्वस कर दिया,  कई बार डॉक्टर ने सवाल दोहराया मगर वह नजरें झुकाए उंगलियों को मसलते हुए बूत बने खड़ी रही ।

  डॉक्टर उसकी मजबूरियों को भाप चुका था फिर भी उसने सपना से पैसों के बारे में पूछा पर उसने उसका भी कोई जवाब नहीं दिया । डॉक्टर ने बताया कि, 

  "अभी जो लड़का यहां काम करता था उसे मै महीने के पन्द्रह सौ रुपए देता था । तुम्हे भी मै वही दे पाऊंगा" जिसकी जेब में फूटी कौड़ी न हो और न ही आगे कही से मिलने के उम्मीद हो उसके लिए, पैसा मिल रहा है, ये बात ही बहुत मायने रखती है,  कम मिल रहा है या ज्यादा यह भला कौन सोचता है ।

  उसने बिना कुछ सोचे समझे नौकरी के लिए हां कर दिया दूसरे दिन जब सपना क्लिनिक पहुंची तो काफी दिनों से गंदे पड़े क्लीनिक को साफ करते-करते उसका आधा दिन गुजर गया । अभी काम खत्म हुआ न कहो कि कारीगर के पास उसे मरीजों से आर्डर लिए गए चश्मो में शीशा लगवाने और पहले से वहां दिए चश्मो को लाने के लिए जाना पड़ा, जरा सी सांस भी न ले सकी थी वह कि फिर भागे-भागे तेज धूप में बाजार के दूसरे छोर पर कारीगर के दुकान पर गई ।  

  किसी तरह काम का एक तो दिन कट गया । अंधेरा होने को था, सुबह के 8:00 बजे पहुंची सपना को अब जाकर छुट्टी मिली थी, पहली बार उसने घर के बाहर पूरा दिन बिताया था । घर पर बच्चे भी मां का इंतजार कर रहे थे । 
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  दो दिनों के काम में ही सपना को इस नौकरी से मन भर गया पर विवशता के आगे पसंद-नापसंद कैसी ? वैसे तो डॉक्टर साहब ने महीने के अंत में ही तनख्वाह देने को कहा था मगर पैसे पैसे के लिए परेशान सपना ने दबी जुबान से अपनी परेशानियां गिनाते हुए थोड़े पैसे डॉक्टर साहब से मांगे मगर डॉक्टर ने अपनी पहले की कहीं बात दोहराई सपना ने मन ही मन डॉक्टर को बहुत बूरा-भला कहा । 

  धीरे-धीरे  काम करते हुए अब काफी दिन हो गये थे । इधर, दिन-प्रतिदिन डॉक्टर को रौब बढ़ता ही गया, टाइम से आओ टाइम से जाओ, न कोई  साप्ताहिक छुट्टी और होली छोड़ दें तो किसी तीज त्यौहार में भी कोई छुट्टी नही ।

  उसे हर रोज क्लीनिक आना था काम में किसी प्रकार की ढिलाई डॉक्टर को पसंद नहीं थी और इन सब के बदले केवल पन्द्रह सौ रुपए उसको ये बात उसे खल जाती थी, वह बार-बार अपनी पति को याद करती और रोती । दोपहर में वह अगर बच्चो को देखने घर जाना चाहे तो भी नहीं जा सकती थी दोपहर के नाश्ते में उसे एक कप खाली चाय नसीब होती थी । 

  वही दूसरी ओर डॉक्टर का दिन भर नाश्ता पानी चलता रहता और बीच-बीच में वह घर भी हो आता । एक दिन की बात है सपना के बच्चे को काफी दस्त हो रही थी मजबूरन वह थोड़ी देर से क्लिनिक पहुंची डॉक्टर साहब करीब आधे घंटे से क्लिनिक खुलने का इंतजार कर रहे थे, डॉक्टर ने जैसे ही सपना को सामने देखा वह उसपर बरस पड़े ।

  "अगर क्लीनिक समय से नहीं खोल सकती तो चाँबी दे दो फिर जहां मर्जी करे वहां घूमो तुम्हे बुला ही कौन रहा है"

  डॉक्टर के गुस्से से वह इतनी डर गई कि सच बात बताने की उसमें हिम्मत ही नहीं हुई रोज की तरह उसे चश्मा बनवाने कारीगर की दुकान पर जाना था, आज उसने चश्मा कारीगर को देकर और बने चश्मो को लेकर 2 मिनट को घर अपने बीमार बच्चे को देखने चली गई । उधर कुछ मरीज अपने चश्मे के लिए क्लीनिक पर बैठे इन्तजार कर रहे थे । 

  थोड़ी देर होने पर डॉक्टर ने कारीगर को फोन किया तो पता चला कि सपना को तो वहां से लौटे थोड़ी देर हो चुकी है, फिर क्या था, उसके क्लीनिक पहुंचते ही सुबह की बची कुची कसर डाक्टर ने पूरी कर दी । वह टूट सी गई । इस काम में न तो पैसा था और न ही कोई कद्र, वक्त के थपेड़ों ने उसे थोड़ा चिड़चिड़ा बना दिया ।

  सर्दियों का सीजन था और सूरज मानो कहीं विंटर वेकेशन पर चले गए थे कई हफ्तों से उनके दर्शन तक नहीं हुए थे शिमला न होकर भी शहर का मौसम शिमला जैसा ही हो गया था । एक दिन डॉक्टर साहब का एक परिचित जीवन प्रकाश क्लीनिक आया काफी देर तक दोनों की बातचीत होती रही । बातों-बातों में डॉक्टर साहब ने जीवन प्रकाश को बताया कि 

  "यार आज सुबह तो, बहुत ठंड थी मैं तो 9:30 बजे उठा, गीजर ऑन किया और फ्रेश वगैरह होकर यहां आया हूँ" 

  अभी उनका दोस्त कुछ कहता कि इसी बीच बगल वाले दवाओं के कमरे से सपना की आवाज गूंज उठी, बड़ी ऐठी हुई आवाज में उसने डॉक्टर साहब से बोला 

  "बहुत ठंड थी सर, कहां ठंड थी सर, आप को ठंड लग रही थी, मौसम तो बहुत अच्छा था"

  उसके इन बात को सुनकर, जीवन प्रकाश ने सोचा,
  "लगता है डॉक्टर साहब अपने यहाँ काम करने वालों से, काफी अच्छे से पेश आते हैं तभी उनसे कोई इतने प्रेम से पूछ रहा है"
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  तभी डॉक्टर को किसी काम से थोड़ी देर के लिए कहीं जाना पड़ा । उन्होंने जीवन प्रकाश से
  "बैठो अभी 2 मिनट में आता हूँ" 

  कहकर क्लीनिक से बाहर चले गए  डॉक्टर के बाहर जाते ही वह जीवन प्रकाश के पास आई और बोली 

  "सुने हैं सर डॉक्टर साहब को ठंड लगता है, खुद सुबह साढे नौ बजे उठते हैं, मगर क्लीनिक खोलने में अगर आठ से सवा आठ हो जाए तो डॉक्टर साहब का पहरा गरम हो जाता है, क्या हम इंसान नहीं हैं,  क्या हमको ठंड नहीं लगती" 

  जीवन प्रकाश को वहां अक्सर आना जाना रहता था ऐसे में दोनों एक दूसरे को बखूबी जानते थे वह अक्सर डॉक्टर के कठोर रवैये के बारे मे जीवन प्रकाश से कहती  रहती, जीवन प्रकाश हर बार उसकी बातें सुनता और हां में हां मिला कर वहां से चला जाता । आज उसकी पूरी बात सुनने के बाद जीवन प्रकाश ने उससे कहा

  "ये नौकरी तुम्हारे पास डाक्टर साहब खुद लेकर आए थे न ?"

  सपना "नही नही सर, मुझे नौकरी की बहुत जरूरत थी, किसी ने बताया तो मैं डॉक्टर साहब के पास नौकरी के लिए के लिए आई थी"

  जीवन प्रकाश "इसका मतलब है कि इस काम को तुमने अपनी मर्जी से चुना है, किसी ने जोर जबरदस्ती या दबाव डालकर तुम्हें यह काम करने को मजबूर नहीं किया, मैने सही कहा ना"

  सपना "हां" 
  जीवन प्रकाश "जहां तक बात कम पैसों की है तो तुमने कम पैसों में यहां काम किया ही क्यों, क्योंकि तुमको इससे ज्यादा नहीं मिल रहा था, या यूँ कहें कि तुम्हारी योग्यता इतने ही पैसों की हकदार थी, तुम्हें इससे ज्यादा पैसे कहीं मिलते तो शायद तुम वहां काम करती, है  ना"

  सपना "हां साहब"
  जीवन प्रकाश  


  "आपका बॉस, आपसे जो काम लेता है उसके बदले वह आपको अपने हिसाब से उचित पैसा भी देता है अब यह उसपर निर्भर करता है कि वह आपको दिए गए काम में रियायत दे या फिर कड़ा रुख अपनाए । वैसे तुम जब चाहो इस जॉब को छोड़ सकती हो । हम जो काम करते हैं, वह हमें पसंद हो सकता है या नहीं भी हो सकती है, कहीं काम तो कहीं काम के हिसाब से मिलने वाला पैसा तो कहीं दोनों हमें पसंद नही आते ऐसे में हम उस काम को आधे अधूरे मन से करने लगते हैं और जिस कारण काम के साथ हम ईमानदारी नहीं कर पाते, काम के प्रति हमारा यह बर्ताव बाॅस को भी दिखने लगता है जिसके कारण हम उसकी आंखों में खटकने लगते हैं । वह हमारी हर काम को संदेह की नजर से देखता है ऐसे में वह हमें और सुविधाएं देने की बजाय, दे रहे मौजूदा सुविधाओं में भी कटौती के नए नए रास्ते तलाशने लगता है, जिससे हमारा काम और कठिन हो जाता है, इस तरह हम अपने द्वारा ही खोदी खाई में गिरते चले जाते हैं । इससे तो अच्छा होगा कि हम अपने हिस्से में मिले काम को ठीक तरह  से पूरा करें और अपनी जिम्मेदारियों को और बढ़-चढ कर निभाए, ऐसा करने से बुरे से बुरे बॉस का व्यवहार भी शायद कुछ अच्छा हो जाए और उससे मिलने वाले पैसो और सुविधाओं में थोड़ी बढ़ोतरी हो जाए ।"

  सपना को पहली बार अपनी गलतियों का एहसास हो गया था । सपना ने, जीवन प्रकाश से अपनी गलतियों को स्वीकार किया और उसके सुझाए रास्तों पर चलने का सपना ने खुद से वादा किया है ।

Moral Of The Story :-


अपने हिस्से में मिले काम को किसी प्रकार का बोझ न समझकर उसे सफलता का एक सुअवसर समझना चाहिए, पूरी लगन और मेहनत से उसे पूरा करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि मात्र यही एक रास्ता है जो हमें जीवन में आगे ले जा सकता है !


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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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