Sone ke ande dene wali murgi, kahavat par Hindi me Motivational Story

  कस्बे में ही किशन हलवाई की दुकान थी । कस्बा छोटा था, मगर किशन हलवाई की दुकान किशन हलवाई के परिश्रम और सूझबूझ के कारण काफी प्रसिद्ध थी । 

  किशन की दुकान पर रोज ग्राहकों का ताता लगा रहता । सभी किशन हलवाई के बनाए मिष्ठान एवं अन्य चीजों की बड़ी प्रशंसा करते । शादी ब्याह में दूर-दूर से लोग आते और किशन हलवाई की मिठाइयां खरीद कर ले जाते । इस तरह किशन हलवाई की कमाई खूब होती, पर किशन हलवाई थोड़ा कंजूस था या शायद किशन हलवाई अपने और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाना चाहता था ।

उसके हलवाई के दो पुत्र थे । दोनों अभी युवा जीवन में कदम रखे थे । दोनों की इच्छाएं और आवश्यकताएं बहुत थी पर पिता उन्हें इतने ही पैसा देता जिससे उनकी जरूरी आवश्यकताए पूरी हो सके । ये बात दोनों बेटों को नहीं भाती थी । दोस्तों की लाइफ स्टाइल को देखकर दोनों में बहुत हीनता की भावना जागृत होती । 

  एक दिन उन्होंने सोचा अगर पिताजी न रहते तो दुकान की कमाई से तो उनकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती  । धीरे-धीरे उन्हें यह बात सही लगने लगी । पिता उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन प्रतीत होने लगा जो उस मुर्गी के समान था, जिसके पास सोने के अंडे तो थे परन्तु उनका लाभ उसके दोनो बेटो को नही मिल रहा था । वह उनके सारे सपनों पर ताला मारे बैठा था ।

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  फिर क्या था, एकबार जब पिता स्नान के पर्व पर अपने बच्चों के साथ नदी के तट पर स्नान कर रहे थे उसी समय दोनों बच्चों ने पिता को धक्का दे दिया जिसके कारण नदी में डूबकर उसकी मृत्यु हो गई । इस प्रकार पिता को अपने रास्ते से हटा कर वे दोनों दुकान का मालिक बन बैठे, अब दुकान की सारी कमाई उनकी थी । 

  अब उन्हें रोकने वाला कोई  नही था । दोनों की सारी इच्छाएं पूरी होने लगी । पहले जिन दोस्तों के सामने वे दोनों दबे रहते और हीनता का अनुभव करते आज वही दोस्त उनकी जी हजूरी करते । अब दुकान में शाम को ग्राहकों के जाने के बाद तकरीबन रोज पार्टी होती । वाकई जिंदगी अब जिंदगी लगने लगी थी । 

  जहां तक काम का सवाल था तो युवा जिंदगी में अक्सर काम बोझ ही लगता है और मौज मस्ती के बाद अगर फुर्सत मिले तो ही किसी काम के बारे में सोचा जा सकता है । ऐसे में दोनों भाइयों ने तय किया कि सुबह दुकान बड़ा भाई संभालेगा और दोपहर बाद छोटा भाई दुकान पर बैठेगा । 

  सर पर काला चश्मा हाथों में फेसबुक और कानों में पॉप सॉन्ग बजाता ब्लूटूथ, सामने सामान के लिए मजबूर खड़ा ग्राहक और बड़ी मुश्किल से जनाब की नजर-ए-इनायत हो भी गई या नौकरो ने खुद आगे आकर ग्राहक को सामान लाकर दे भी दिया तो, नजारा कुछ ऐसा होता, एक तरफ साहब मन ही मन मुस्कुराते और उंगलियां मोबाइल पर थिरकती, वही सामने हाथ में पैसा लिए मूकदर्शक बना ग्राहक खड़ा उसे पैसा लेने का इन्तजार करता । कुछ ऐसा नजारा हो गया था पिता के जाने के बाद उसकी दुकान का ।

  उनके दोनों बेटों को ग्राहकों को सामान देने की न चिंता थी और न ही सामान के बदले पैसा लेने की फुर्सत, हद तो तब हो जाती जब ग्राहक अपने ₹50 के सामान के लिए सौ रुपए देता और युवराज अपने सामान का मूल्य काटकर ग्राहक को ₹110 वापस लौटा दिया करते । वे बस अपने ही रामधुन में मगन थे । 
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  भला हो उन ग्राहकों का जो अधिक पैसा मिलने पर, अधिक पैसा खुद ही उन्हे लौटा देते । भला ऐसे ग्राहक मिलते कहां हैं और मिलते भी हैं तो कितने, नतीजा दुकान घाटे में चलने लगी । बेटे पिता के बनाए हुए वसूलों में कोई बदलाव नहीं लाना चाहते थे मगर मौके का फायदा उठाने वाले तो हर कहीं मौजूद होते हैं । दुकान पर कच्चा सामान देने वालों ने काम को लेकर इनकी बेफिक्री को देखते हुए, सामानो मे मिलावट शुरू कर दी । 

  हालांकि ये काम वे पिता के रहते भी करने की कोशिश करते रहे पर वे इसमे कभी कामयाब नहीं हुए क्योंकि वह  ईमानदार होने के साथ-साथ अपने काम को भी ठीक से समझता था । वह जानता था कि अमीर बनने के ये शॉर्टकट उसे ज्यादा आगे नहीं ले जा सकते इसलिए वह ऐसे लोगों को कभी पसंद नहीं करता था जो मिलावटी सामान देते थे । 

  मगर किशन के जाते ही जवानी में अंधे हुए दोनों लड़कों के नाक के नीचे से ही मिलावट का काम बढ़ने लगा उधर उनके हलवाई भी काम में ढिलाई करने लगे बिना मेहनत के राजगद्दी पाने वालों को इस के पीछे की कड़ी मेहनत का अंदाजा नहीं था ।

  माना कि बरसों से पिता ने दुकान की ऐसी इमेज बनाई थी जिसकी क्वालिटी और रेट से हर कोई प्रभावित था जिसका लाभ उसके न रहने पर भी उसके दोनों बेटों को मिलता था पर ऐसा कब तक चलने वाला था । देखते ही देखते दुकान के रेगुलर ग्राहकों ने कुछ दूसरी दुकानो की ओर रुख कर लिया । 

  दोनों की अनुभवहीनता ने दुकान के नाम को कुछ ही दिनों में अर्श से फर्श पर लाकर, पिता के नाम में चार चांद लगा दिया, जैसे-जैसे कमाई कम होती गई दोनों की नींदे भी टूटने लगी । दोनों ने, दुकान टूटने का दोष एक दूसरे पर लगाना शुरु कर दिया ।

  आखिरकार पिता के दुकान के दो फाट हो गए । अब एक पर बड़ा तो दूसरे पर छोटा भाई बैठता । अब मौज मस्ती तो दूर, दो जून की रोटी का इंतजाम कर पाना भी दोनों भाइयों पर भारी पड़ने लगा ।

Moral Of The Story :-

इच्छाओं और आवश्यकताओं का कोई अंत नहीं परन्तु उनको पूरा करने के लिए हमेशा सही रास्तों का ही चुनाव करना चाहिए, ये रास्ते थोड़े कठिन जरूर हो सकते हैं मगर इन्हीं कठिनाइयों से जूझकर कोई अपने सपनों को साकार कर सकता है और महान बन सकता है !!
             

   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
 Team MyNiceLine.com

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