21 April, 2018

सोने का संदूक | The Golden Box Inspirational Story In Hindi



सूझबूझ पर आधारित हिन्दी मे प्रेरणादायक स्टोरी "सोने का सन्दूक", Inspirational story in hindi "Golden Box".

  एक गांव मे एक किसान रहता था । किसान बहुत गरीब था वह और उसकी पत्नी हमेशा पैसे पैसे के लिए परेशान थे ।  किसान की औरत उससे कहती "क्या हम पूरी जिंदगी ऐसे ही दुखों के साथ बिताएंगे। क्या हमारी जिंदगी में कभी खुशियां नहीं आएंगी"

  किसान पत्नी की ये बाते सुनकर बहुत दुखी होता। मगर वह पत्नी को दिलासा देता। वह कहता

"इतना परेशान मत हो धैर्य रखो। ईश्वर इतना निर्दई नहीं हो सकता आज नहीं तो कल वह हमारी जरूर सुनेगा। वो एक दिन हमारे सारे दुख दूर कर देगा और हमारा जीवन खुशियों से भर देगा। वह इतना निर्दई नहीं हो सकता"

  पति की यह बात सुनकर पत्नी भी आधे मन से उसकी बातों को मान लेती और कहती "उम्मीद है,  जैसा तुम कह रहे हो वैसा ही हो"

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  किसान वैसे तो बड़ा मेहनती था। मगर उसके लाख परिश्रम के बाद भी उसका जीवन दुखों से भरा था और ऐसा क्यों न हो उसकी परेशानी का कारण उसका भाग्य था। उसके पास खेती के लिए भूमि ही बहुत कम थी।

  वह थोड़ी भूमि में जितना चाहे पसीना बहा ले,  उसके हाथ सिवा निराशा से ज्यादा कुछ नहीं आने वाला था। मगर एक दिन किसान के कहे अनुसार वाकई ईश्वर ने उसकी सुन ली। किसी ने किसान से बताया कि जमीदार बहुत दयालु स्वभाव के हैं।

  अगर वह उनसे जाकर अपनी परेशानी बताएगा। तो जमींदार उसकी मदद जरूर करेगा। उस व्यक्ति के कहे अनुसार किसान अगले दिन सुबह ही अपनी फरियाद लेकर जमींंदार के पास जा पहुंचा।

  जमींंदार ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी और फिर उसे मदद का आश्वासन दिया । जमींंदार ने किसान के बारे में अपने लोगों से पता लगाने को कहा। जमींंदार के आदमी ने किसान के बारे में सारी जानकारी इकट्ठा कर जमींंदार को बताया,  कि वाकई किसान बड़ा गरीब है।

  वह बहुत मेहनती है। मगर मेहनत करने के लिए उसके पास भूमि की कमी है। जमींंदार ने फौरन किसान के पास अपने आदमी को भेजा और उसे मिलने को कहा किसान की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह झटपट जमींंदार से मिलने के लिए चल पड़ा।

  जमींंदार ने किसान से

 "कहां तुम तो वाकई बहुत गरीब हो और तुम्हारे पास ज्यादा भूमि भी नहीं है। जिस पर तुम खेती कर सको। तुम्हें मेरे पास और पहले आना चाहिए था । मैं तुम्हें थोड़ी भूमि दे रहा हूं। तुम उस पर खूब मेहनत करो और अनाज उगा कर अपने और अपने परिवार का भरण पोषण करो"

  जमीदार के मुख से ऐसा सुनकर किसान खुशी से उछल गया।उसने जमीदार को तथा ईश्वर को धन्यवाद दिया। घर आकर जब उसने पत्नी को ये सारी बातें बताई। तो पत्नी ने कहा आज "आप नहीं आपके अटल विश्वास की जीत हुई है"

  किसान अगले ही दिन खेतों में फावड़ा लेकर पहुंचा और पूरा दिन पसीना बहाता रहा। उसने खेतों में नए बीज डाल दिए। एक दिन वह अपने खेत में अपने मित्र के साथ बैठा था।

  तभी मित्र का ध्यान खेत के ही किनारे एक छोटे से टीले पर पड़ा। उसके मित्र ने कहा मित्र इस टीले को क्यों नहीं समतल करके इसका भी तुम उपयोग करते।

  इसका बहुत ज्यादा आकार तो नहीं है। पर तुम्हें थोड़ी और भूमि मिल जाएगी। किसान को मित्र की बात सही लगी और उसने मित्र के कहे अनुसार टीले को खोद कर शाम होते-होते उसे समतल बना दिया। दूसरे दिन जैसी ही बीज बोने के लिए वो समतल हुए भूमि में फावड़ा चलाया। उसे टन की आवाज सुनाई पड़ी।

  उसके मित्र ने कहा लगता है। तुम्हे थोड़ी और मेहनत करनी पड़ेगी। नीचे शायद थोड़े और छोटे-छोटे कंकड़ पत्थर हैं। उन्हें निकालना होगा। किसान ने जैसे ही उस कंकड़ को भूमि से हाथ डालकर निकाला।
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  दोनों अवाक रह गए। वह कोई पत्थर नहीं, बल्कि सोने का सिक्का था। दोनों के चेहरे आश्चर्य और प्रशन्ता से भर गए। किसान के हाथों में सोने का सिक्का देख दोस्त की नियत बदल गई। उसने कहा

 "लाओ ये सिक्का मुझे दे दो वरना मैं यह बात जमींंदार को बता दूंगा और फिर वह ये भूमि तुमसे वापस ले लेगा"

  किसान ने कहा 

"नहीं नहीं भाई सोने का सिक्का तुम ही रख लो, मुझे नहीं चाहिए ये लो ये सिक्का बस ये बात जमीदार से मत बताना। इस जमीन से ही मेरे और मेरे परिवार का पेट भरता है। मुझे यह सिक्का नहीं चाहिए"

  ऐसा कहते हुए किसान ने उसको वो सोने का सिक्का दे दिया और फिर वह अपने काम में जुट गया। थोड़ी देर बाद फावड़ा भूमि पर चलाते ही फिर टन की वही आवाज फिर से हुई।

  इस बार दोनों समझ गए, कि हो न हो सोने का सिक्का  ही है । वो सिक्का भी उसने मित्र को दे दिया। थोड़ी देर बाद वह घर चला आया। वो तो घर चला आया पर उसके मित्र के मन में ये बात पची नहीं। उसने जाकर अपने तीनो मित्रों को यह बात बता ढाली।

  इतना सुनते ही उसके तीनों मित्र आश्चर्यचकित रह गए। चारों पूरी रात उसी भूमि के बारे में सोचते रहे। उधर किसान को भी एक बात समझ मे आ चुकी थी कि हो न हो उस भूमि में अभी और भी सिक्के होंगे। परंतु कहीं उसका मित्र ये बात जमींदार से जाकर न बता दे और उसको सारी भूमि से हाथ धोना पड़े। इसका डर उसे सताने लगा।

  उसको सोने के लालच से ज्यादा कृषि योग्य भूमि को खो देना और फिर से गरीब हो जाने कि चिंता थी । अगले दिन चारों मित्र पास के खेत में छुप कर किसान पर नजर गड़ाए हुए थे। किसान सुबह उठा और अपना फावड़ा लेकर उसी खेत में जा पहुंचा।


  जहां पर पिछले दिन सोने के दो सिक्के मिले थे। उधर चारों दोस्त पैर दबाए चुपके-चुपके किसान के पीछे चले आए और छुपकर उसे देखने लगे। थोड़ी ही देर में फिर टन की आवाज हुई।

  किसान के साथ-साथ इस बात की खबर कान लगाये उन चारों दोस्तों को भी हो गई और जैसे ही किसान ने हाथ डालकर सोने का सिक्का निकाला। वो चारों उसके पीछे आकर खड़े हो गए। उनमें से एक ने लपककर किसान के हाथों से सिक्का झपट लिया।

  सबको अपने सामने पाकर किसान का गला सूख गया। वो चारों जोर-जोर से ठहाके लगा कर हंसने लगे। किसान ने उन चारों से ये बात जमीदार से न बताने का आग्रह करने लगा।

  वो चारों इस बात को राजी हो गए पर उन्होंने उसके सामने ये शर्त रखी, कि वह इस भूमि पर रोज खुदाई करेगा और जो सिक्के मिलेंगे वह उन्हें देगा। लाचार किसान उनकी बात मान गया।

  अब रोज किसान फावड़ा लेकर उस भूमि पर आता और पूरे दिन खुदाई करता। खुदाई में जो सिक्के मिलते उन्हें ये चारों आपस में बांट लेते और थका हारा किसान खाली हाथ घर चला जाता।

  किसान जब कभी इस काम को करने से मना करता तो वो चारों यह बात जमीदार से बताने की उसे धमकी देने लगते। बड़ी मुश्किल से किसान को भूमि जमीदार से मिली थी।

  वह किसी भी हालत में उसे खोना नहीं चाहता था। अब किसान रात रात भर मन ही मन घुटता रहता। वो ऐसी मुसीबत में फंस चुका था। जिसका उसके पास कोई हल नहीं दिखाई पड़ रहा था।

  आखिर उसे इस मुसीबत से छुटकारा मिले तो कैसे ?एक तरफ रोज की खुदाई से शारीरिक थकावट और मानसिक तनाव ने उसे तोड़ कर रख दिया था। दूसरी ओर गहराते गड्ढ़े में खुदाई करना जोखिम भरा होने लगा था।

  उसको रोज परेशान देखकर उसकी पत्नी ने पूछा

 "आखिर बात क्या है। देख रही हूँ, कई दिनों से आप कहीं खोए खोए से रहते हैं। न ठीक से खाते और न ठीक से सोते हैं। अब तो जमीदार और ईश्वर की कृपा से हमारे पास पर्याप्त भूमि है जिससे हमारा जीवन आनंद से गुजर जाएगा। फिर आपको कौन सी चिंता दिन-रात खाए जा रही है ? आखिर कौन सी परेशानी है ? कुछ तो बताओ"

किसान ने कहा "ऐसी कोई बात नहीं। बस थोड़ा काम ज्यादा हो जाने से थकान है और कुछ नहीं तुम सो जाओ"

  ऐसा कहकर किसान सो गया। पर उसकी पत्नी को किसान की बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं था। वह किसान के स्वभाव से भलीभांति परिचित थी। वो रोज किसान से वही सवाल करती और किसान उसको "कोई बात नहीं है" ऐसा कह कर टाल देता।

  एक दिन खुदाई की मिट्टी जो ऊपर गड्ढे के किनारे लदी हुई थी, उसमें से एक मिट्टी का गोला नीचे सरक गया और खोद रहे किसान के कंधे को छूता हुआ नीचे गिरा।

  किसान घबरा गया और डर के मारे बाहर निकलने के लिए जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसकी ये हालत देखकर चारों उस पर जोर जोर से हंसने लगे। शाम को किसान घर आया। तो वह काफी डरा हुआ था।
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  आज जैसी हालत उसकी पत्नी ने पहले कभी नहीं देखी थी। :बस आज सच जानकर रहूंगी" ऐसा उसकी पत्नी ने मन ही मन ठान लिया। वो जब किसान से पूछने लगी तो वो हकलाने लगा। पत्नी को उस पर बहुत दया आई। उसने उससे साफ कह दिया कि

"आज चाहे जो हो जाए पर मुझे अपनी परेशानी बताओ । जब तक तुम मुझे सच बात नहीं बताते मैं आज कुछ नहीं खाऊंगी सारी रात बैठी रहूंगी"

  किसान ने पत्नी को मनाने की बहुत कोशिश की पर उसकी पत्नी की जिद्द के आगे उसकी एक न चली। आखिरकार कांपती जुबान से किसान ने सारी बातें अपनी पत्नी को बताई।

  सारी बात पता लगते ही पत्नी के माथे पर बल पड़ गया। वो जमीन पर बैठकर सर पकड़ ली। अगली सुबह खोदे जा रहे गड्ढे के पास रोज की तरह आज भी चारों मित्र किसान का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

  काफी देर तक किसान के वहा न आने पर वो किसान के घर की ओर निकल पड़े। उन्होंने देखा किसान अपनी पत्नी के साथ कहीं जा रहा है।

  चारों आकर उसके बीच रास्ते में ही खड़े हो गए। किसान उनको अनदेखा करके जाना चाहता था पर उनमे से एक ने उसका हाथ पकड़ते हुए बोला "कहां जा रहे हो इतनी सवेरे-सवेरे, काम पर नहीं जाना क्या"

  किसान ने बताया कि उसकी पत्नी बीमार है। उसको दिखाने वह शहर जा रहा है। कल आ जाएगा। फिर काम पर आएगा। मगर वो चारों उसे उसका बहाना समझ कर काम पर फौरन वापस लौटने को बोले

  किसान द्वारा बार-बार अपनी बात का यकीन दिलाने पर आखिरकार वो चारों केवल एक दिन उसके काम न करने की बात को मान गए। अगले दिन किसान वापस खेत में गड्ढे की खुदाई में जुट गया। खोदते-खोदते काफी देर हो चुकी थी। मगर एक भी सिक्का उन्हें नहीं मिला।

  सिक्का न पाकर वे चारो ऊपर से गड्ढे में खुदाई कर रहे किसान पर बहुत गुस्सा हुए और ऊपर से ही उसे डांटने लगे और सिक्का न मिलने पर सारा दिन उसे पानी तक नहीं देने की धमकी  को देने लगे।

   भूखा प्यासा किसान बिचारा पूरे तन मन से काम में जुटा रहा। दोपहर बाद बहुत जोर से खन की आवाज आई। सब बहुत खुश हुए। उनमें से एक ने कहा लगता है। इस बार काफी बड़ा सिक्का हाथ लगा है पर जब किसान ने हाथ डालकर उसे निकालना चाहा तो वह सिक्का न होकर कुछ और ही था।

  जब ऊपर की मिट्टी किसान ने हटाई तो वहां पीले रंग का एक बक्सा था। चारों वो बक्सा देख कर बहुत प्रसन्न हुए और हो भी क्यों न इतने दिनों उन्हे जो सिक्के मिले थे। उससे कहीं ज्यादा आज उन्हें सोने के सिक्कों से भरा पूरा एक बक्सा ही मिलने वाला था।

  "जल्दी निकालो जल्दी निकालो" की उन चारो की आवाज खुदाई कर रहे किसान को ऊपर से आने लगी। किसान ने भी जल्दी-जल्दी बख्शे के चारों तरफ से मिट्टी हटाई और फिर उसे निकालने का प्रयास करने लगा । मगर ये क्या बक्सा तो किसान से टस से मस तक नहीं हुआ। बक्सा काफी भारी था।

  लिहाजा उसे उन चारों की आवश्यकता थी। चारों तुरंत गड्ढे में बांस की सीढ़ी से उतरकर संदूक को खींचने लगे। आखिरकार उस संदूक को मिलकर उन्होंने उठा लिया।

  अब सवाल था कि इतना बड़ा और भारी संदूक को बाहर कैसे लाया जाए। ऐसे में किसान को एक तरीका सूझा। उसने कहा कि मेरे पास एक मोटी रस्सी है। मैं वो रस्सी लाता हूं और फिर तुम उसमें यह संदूक बांध देना और मैं फिर इसे ऊपर खींच लूंगा। सब ने कहा ठीक है।

  किसान गड्ढे से निकल कर ऊपर पहुंच गया। चारों के चारों उस बक्से को ही देखने में और खोलने में लगे थे। कि तभी अचानक किसान ने वो सीढ़ी ऊपर खींच लिया। चारों के चारों उसके इस कार्य से आश्चर्यचकित रह गए।

  अभी वह कुछ सोचते तब तक ऊपर से मिट्टी का ढेर किसान, उसकी पत्नी और बच्चे बरसाने लगे। चारों अपनी गलती की माफ़ी मांगने लगे और अपने गलतियों को माफ करने को कहने लगे। पर किसान ने कोई गलती न करते हुए।

  अपने परिवार के साथ गड्ढे की खुदाई के से उसके किनारे-किनारे जो मिट्टी इकट्ठा हो गई थी उसको उन्होंने गड्ढे में धकेलना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में किसान और उसके परिवार ने सारा गड्ढा फिर से पाट कर समतल कर दिया था।

  असल मे हुआ यूं था, कि जब किसान ने अपनी सारी व्यथा पत्नी को बताई। तो पहले तो उसकी पत्नी को गहरा धक्का लगा। मगर फिर वह हिम्मत रखते हुए। इस मुसीबत से बाहर निकलने की युक्ति सोचने लगी और फिर उन्होंने इस मुसीबत से निकलने के लिए एक योजना बनाई। किसान अपनी पत्नी की बीमारी का नाटक करके उनकी आंखों से एक दिन के लिए ओझल हो गया।

  चारों, किसान के बाहर गया समझकर अपने-अपने घरों में निश्चिंत होकर सो गए। मगर दोनों पति-पत्नी शहर न जाकर वहीं खेतों में पूरा दिन छुपे रहे और रात होने पर उन्होंने आधी रात तक उस गड्ढे मेरे खुदाई की और कई सोने के सिक्के प्राप्त किए और फिर पीले रंग के संदूक में पत्थर भरकर उसे उसी गड्ढे में डाल कर, उसके ऊपर ढेर सारी मिट्टी डाल दिए।

  इस प्रकार एक समझदारी भरे कदम से पति-पत्नी ने इस मुसीबत से छुटकारा पाया ।उन्होंने मिले, सोने के सिक्कों से खेती के लिए नए उपकरण खरीदें। अब उनका जीवन खुशहाल था।

     Moral Of The Story
          
Moral of the story - सोने का सन्दूक by myniceline.com
                    



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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
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