मर्यादा पुर के राजा के दो पुत्र थे। दोनों में पहला पुत्र काफी शूरवीर था। उसकी वीरता के चर्चे दूर-दूर तक फैले थे, जबकि वही राजा का दूसरा पुत्र स्वभाव से काफी सरल एवं अभी-अभी शास्त्र विद्या में निपुण हो कर लौटा था। अपने छोटे बेटे के तुरन्त बाद राजा ने महल के बीचो बीच अपने दोनों पुत्रों के बीच तलवारबाजी का युद्ध प्रतियोगिता रखी ।

यह बात सबको चौंका देने वाली थी क्योंकि ये प्रतियोगिता एक रियल युद्ध जैसा था । असल मे राजा  अपने दोनों युवराजों में सर्वश्रेष्ठ कौन, इस बात का पता इस प्रतियोगिता से लगाना चाहते थे। हालांकि राजा सहित सभी इस बात से भलीभांति परिचित थे कि राजा के ज्येष्ठ पुत्र युद्ध में पूर्णता परांगत एवं निपुण है। वह अभी तक कई लड़ाईयां लड़ चुके हैं और तकरीबन उन सभी में उन्हे विजय प्राप्त हुई हैं।

  वही दूसरा पुत्र युद्ध कौशल में पारंगत तो है, मगर उसमें अपने बड़े भाई के जैसा कोई अनुभव नहीं है। इस बात से चिंतित सेनापति ने इस तरह के जोखिम भरे खेल को रोकने के लिए राजा से आग्रह किया। मगर राजा ने सेनापति से ऐसा कुछ भी करने से साफ मना कर दिया।

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  जब इस बात की खबर महारानी को लगी तो महारानी भागी-भागी राजा को समझाने चली आई। उसने इस जोखिम भरे खेल को राजा से फौरन रोक देने को कहा,
  तब राजा ने रानी को समझाया

  "देखो रानी अब मैं बूढ़ा हो रहा हूँ। मुझमें अब वह पहले जैसी शक्ति और सामर्थ्य नहीं रहा न ही वैसा साहस जो पहले कभी मुझमें हुआ करता था। इस राज्य की सुरक्षा और सुनहरे भविष्य के लिए मैं एक योग्य व्यक्ति चाहता हूँ। जो मेरी जगह ले, जो मेरा उत्तराधिकारी बने, और इस राज्य को संभाले"

  रानी "मगर राजन इसमें हमारे पुत्रों की जान भी जा सकती है"

  राजा "हा रानी, मैं जानता हूं । मगर मेरी विवशता को भी समझो मैं कोई मदारी का खेल देखने की इच्छा नहीं रखता मैं जानता हूं कि मेरे दोनों बेटों से ज्यादा वीर और योग्य राज्य में और कोई नहीं। मगर इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है यह समझ पाना मेरे लिए काफी मुश्किल हो रहा है। इसलिए मुझे यह कठोर कदम उठाना पड़ा"।

  राजा के जवाब और विवशता के सामने बेचारी रानी खामोश हो गई और मुहँ गिराए वापस अपने कक्ष की तरफ चली गई। चेहरे पर उनके जितनी शांति थी, भीतर उतनी ही हलचल मची हुई थी।   

  मगर उधर दोनों भाई पिता के इस फैसले पर फक्र महसूस कर रहे थे। सुबह की पहली किरण के साथ दोनों भाई श्रेष्ठता कि परीक्षा के अखाड़े में खड़े थे। दोनों में काफी देर तक युद्ध चलता रहा दोनों भाइयों का तन खून से लतपत हो गया। महारानी मुंह दबाए सिसकियाँ ले रही थी।

  जवान बेटो की यह हालत उनसे देखी नहीं जा रही थी। जब सारी हदें पार हो गई, तो महारानी अपना सिंहासन छोड़ वहां से उल्टे पांव महल की तरफ दौड़ चली महाराजा को उनके मनः स्थिति का पूरा पूरा ध्यान था। मगर उन्होंने दोनों बेटों का परस्पर संघर्ष चलने दिया।

  काफी समय के संघर्ष के बाद भी जब दोनों में जय पराजय का निर्णय नहीं हो सका तब राजा को यह समझ में आ गया कि यदि छोटे बेटे में युवा जोश है तो बड़े में अनुभव का अकूत भंडार है। परंतु युद्ध कौशल में कोई किसी से कम नहीं, इस बात का आभास होते ही राजा ने इस खेल को यहीं समाप्त कर पूरी तरह से घायल अपने दोनों सपूतों को गले लगा लिया।
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मर्यादा पुर के राजा ने स्वयं युद्ध की कमान संभाली। अपने ज्येष्ठ पुत्र के साथ महाराजा किले के बाहर युद्ध के लिए निकल पड़े, वही छोटा पुत्र माँ के साथ ही महल में रुक गया। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा मगर इसी बीच रात्रि में विश्राम के समय राजा को विरोधियों ने धोखे से घायल कर दिया।

  राजा की हालत काफी नाजुक हो गई। अब तो लड़ना क्या ठीक से खड़े भी हो सकने की अवस्था में वे नहीं थे। ऐसे में युद्ध की कमान बड़े बेटे ने संभाल ली। वैसे तो बड़े बेटे ने छोटी-छोटी कई लड़ाइयो का प्रतिनिधित्व किया था। मगर ऐसा महासंग्राम का वह पहली दफा सामना कर रहा था।

  अतः अनुभव की कमी आड़े आने लगी। महल में लौटे घायल पिता की सेवा में छोटे बेटा और महारानी लग गए। मगर उनकी हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ती गई। उधर बड़े बेटे के युद्ध में लगातार मिल रही मुश्किलों के  पल-पल की खबर महल तक गूंज रही थी।

  पिता मरणासन्न पर और बड़े भाई पर भी मृत्यु का संकट ऐसे में छोटे के मन में बार बार युद्ध में जाने की प्रबल इच्छा जाग ने लगी, भाई की मदद की तीव्र इच्छा मन मे उछाल मारने लगी। मगर तभी उसे अपनी युद्ध में अनुभव शून्यता का एहसास हुआ, जैसे मानो साहस से ओत-प्रोत योद्धा को भय की कोई ठंडी हवा छू कर चली गई हो और वह एक पल को कापं सा गया ।

   अनुभवहीनता से उत्पन्न मृत्यु के भय से राजकुमार का दिल बैठ गया। मगर दूसरे ही पल रणभूमि में फंसे अपने भाई की याद आई। राजकुमार के मन में द्वन्द जाग उठा। एक तरफ युद्ध में जाने की विवशता, तो दूसरी तरफ कभी प्राणों का तो कभी युद्ध में अपना सम्मान खो देने का भय। इन सब में राजकुमार इतना परेशान हो गया, कि वह पिता के पास जाने या उनसे आंखें मिलाने से भी डरने लगा। वैसे भी महल मे घायल पिता भी राजकुमार से शायद यही चाह रहे थे, मगर पुत्र मोह मे कुछ कह नहीं पा रहे थे।

  राजकुमार कक्ष के बाहर से ही छुप-छुप कर बीमार पिता को निहारा करता।

  मन की इस व्याकुलता में राजकुमार भोजन पानी ग्रहण करना भी भूल गए। उसके एक पैर ज्योही बाहर निकलते तो दूसरे पैर उसे अंदर की ओर खींच लेते। अब उसका कहीं एक जगह मन ही नहीं लगता। आधी-आधी रातों को वह इधर उधर खड़ा गुमसुम कुछ सोचता रहता ।

  उसके इस हाल को कोई कई दिनों से गौर कर रहा था और वह थी महारानी कई दिनों से युवराज द्वारा कभी अपने पिता को तो कभी किले के गेट की ओर टकटकी लगाते देखती थी। एक दिन महारानी राजकुमार के पास आई और बोली,
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"क्या बात है, तुम ऐसे उदास और गुमसुम क्यों हो" 
  युवराज "कुछ नहीं बस ऐसे ही"

  महारानी "कुछ नहीं ?, पर तुम्हारे माथे की रेखाएं तो कुछ और ही कह रही हैं। क्या बात है, तुम कई दिनों से काफी परेशान हो, अपनी माँ को भी नहीं बताओगे"

  युवराज काफी देर तक किले के द्वार को एकटक निहारता रहा। वह खामोश रहा, महारानी की किसी सवाल का उसने कोई जवाब नहीं दिया।

   युवराज से कोई जवाब न मिलने पर महारानी ने स्वयं युवराज के मन का हाल युवराज को बताया।

 "मैं जानती हूँ कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है। तुम किस बात से परेशान हो, क्यों तुमने खाना पीना सब छोड़ दिया है। तुम्हारे रातों की नींद किस बात से गायब है, किस बात ने मेरे युवराज के चेहरे की हंसी गायब कर दी है। उसका तेज और उसका साहस किस ने छीन लिया है"

  युवराज माँ की ऐसी बातों को सुनकर आश्चर्य चकित था। अब उसका ध्यान किले से हटकर माँ की ओर आ टिका।

  माँ ने कहा मुझे पता है "तुम युद्ध में जाना चाहते हो। मगर हार का भय तुम्हें आशंकित कर रहा है। ऐसा द्वन्द इस परिस्थिति में हर किसी में हो सकता है । वैसे मैं तुम्हें फैसला लेने में, तुम्हारी मदद कर सकती हूं। मगर आखरी फैसला तो तुम्हें ही करना होगा"

  "वैसे चिंता की कोई बात नही है युवराज, हमारे पास अभी कई योद्धा मौजूद हैं । युद्ध चाहे कितना भी लम्बा चले आखिरकार विजय हमारी ही होगी"

महारानी थोड़ी देर युवराज को एकटक देखती रहीं और फिर बोलीं

  "युवराज अगर तुम किले के अंदर रहे तो तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, तुम पूरी जिंदगी जिओगे परंतु तुम्हारी मृत्यु के बाद जल्द ही तुम्हें लोग शायद भूल जाएंगे, और अगर तुम युद्ध के मैदान में जाओगे तो तुम दुश्मनों के वार से मारे जा सकते हो। और तुम्हारा जीवन नष्ट हो सकता है। परंतु मृत्यु से पहले अगर तुमने कुछ कर दिखाया, तो सल्तनत की अगली पुश्ते तुम्हें याद रखेंगे। तुम्हें याद करके वे  अपना मनोबल बढ़ाएंगे, और इस प्रकार राज्य के लिए तुम एक उदाहरण बनोगे। अब तुम्हें क्या करना है, इसका निर्णय सिर्फ तुम्हें ही लेना होगा"

 आखिर में वहां से जाते-जाते महारानी ने किले की तरह हाथ उठाकर इशारा करते हुए भारी भरकम आवाजों में कहा

"अगर तुम चाहते हो कि लोग तुम्हें याद करें तो तुम्हें किले के बाहर जाना होगा" 

  युवराज को सब समझ में आ गया था। अब और देर न करते हुए, वो किले के बाहर निकल पड़ा। बहुत ही साहस और कौशल के साथ उसने रणभूमि में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए, और राज्य को विजय दिलाई। युद्ध से लौटने पर पिता ने युवराज को हाथों हाथ लिया। युवराज की चर्चाएं पूरे राज्य में होने लगी। इसके बाद न जाने उसने कितनी लड़ाई लड़ी। इन लड़ाइयों को लड़ते-लड़ते एक दिन वह वीरगति को प्राप्त हुआ ।

Moral Of The Story

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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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