नेकी का फल पर प्रेरणादायक हिन्दी स्टोरी |  An Inspirational Story In Hindi Result Of Goodness

बहुत समय पहले की बात है। चंद्रपुर राज्य के राजा के विवाह को काफी समय बीत चुका था। उनकी कोई संतान नहीं थी परंतु राजा समेत महारानी को एक संतान की बहुत इच्छा थी। इसके लिए उन्होंने काफी यत्न भी किए।कई मंदिरों में माथा टेका, गरीबों को दान दिया, मन्नतें मांगी, यहां तक की पूजा-पाठ भी बहुत कराए।

  परंतु उनके सारे प्रयास निरर्थक गए। वे  फिर भी निसंतान ही रहें। सारे जतन करने के बाद भी उनकी मनोकामना धरी की धरी ही रह गई।

 ऐसे में वह निराशा के गर्त में गिरते चले गए और संतान की आशा छोड़ दिए।

  एक दिन जाने कहां से एक ऋषि मुनि वहां पधारें। राज्य में प्रवेश करते ही उन्होंने जान लिया कि यहां का राजा बड़ा ही दयालु है और इसलिए यहां की प्रजा को तो किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है परन्तु राजा कष्ट मे अवश्य है क्योंकि उन्हे कोई संतान नही है ।

  महर्षि ऐसे नेक राजा के दुख को जान स्वयं उनसे मिलने उनके महल जा पहुंचे। मुनिवर के आगमन की सूचना पाते ही राजा और महारानी दौड़े-दौड़े उनके पास आए और बड़े ही आदर सत्कार के साथ उन्हें महल में ले गए। उनकी सेवा में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं की।

  इस बात से प्रसन्न महात्मा ने उनसे पूछा "हे राजन आपको कोई समस्या तो नहीं है" मुनि के इस प्रकार के सवाल को सुनकर वह दोनों काफी उदास हो गए।  महर्षि के बार-बार पूछने पर राजा ने अपने संतान सुख की कामना के अभी तक पूरा न होने को बताया।

  महर्षि ने उनके सर पर हाथ रखकर बहुत जल्द ही उनकी मनोकामना पूरी होगी। ऐसा आशीर्वाद दिया। उनके ऐसी बातों को सुनकर दोनों के निराशा से भरे चेहरे पुनः खिल उठे। उन्होंने महर्षि को वहां और कुछ दिन रुकने एवं सेवा का मौका देने को आग्रह किया। मगर मुनि ने "मै फिर कभी आऊंगा तो अवश्य रुकूंगा" की बात कहकर वहां से प्रस्थान कर गए।

  महर्षि के जाने के कुछ ही दिनों बाद ही राजा को  संतान सुख की अभूतपूर्व खुशी प्राप्त हुई। खुशी में राजा और महारानी ही नहीं, अपितु सारा शहर झूम उठा चारों तरफ उत्साह का माहौल था।

  राजा ने पूरे राज्य में खुशी की मिठाइयां बांटी जैसे-जैसे पुत्री बड़ी हुई। वैसे-वैसे उसकी अपार सुन्दरता के चर्चे राज्य मे ही नही वरन दूसरे राज्यो तक भी होने लगे। उसने जब यौवन अवस्था में कदम रखा।

  तब तो कोई विरला ही होगा। जो उसके रूप रंग को देखकर मन्त्र मुग्ध न हो जाए। उसकी एक झलक को पाने के लिए लोगों का तांता लगा रहता।

  पुत्री के बड़े होने पर राजा ने एक यज्ञ का आयोजन किया। जहां दूर-दूर से बिटिया को स्नेह और आशीर्वाद से अभी संचित करने के लिए लोग वहाँ उपस्थित हुए। अभी यज्ञ का कार्यक्रम चल ही रहा था कि तभी घूमते-घूमते महर्षि भी उस राज्य की किये ।

  जब उन्हें पता चला, कि यहां राजा ने बिटिया के बीसवें जन्मदिन के अवसर पर यह आयोजन किया है और इस अवसर पर उन्होंने देश विदेश से सभी लोगों को आमंत्रित किया है।

  मगर जिसके आशीर्वाद के फलस्वरुप उन्हें ये दिन देखने का अवसर प्राप्त हुआ है। वे उसे ही भूल बैठे हैं। तब मुनिवर काफी क्रोधित हो गए और "दुष्ट राजन तुम हमें ही भूल गये" कहते हुए महल की ओर बढ़ चले।

  महल में पहुंचकर यज्ञ स्थल पर बैठे राजा के समीप पहुंचकर महर्षि ने कहा

   "पहचान रहे हो राजन"


यज्ञ में अति व्यस्त राजा ने महर्षि की बातें संयोगवंश नहीं सुनी। महर्षि ने कई बार अपनी बातें दोहराई पर राजन तक उनकी आवाज नही पहुंच सकी, बार-बार राजा के इस अनसुने रवैया से आवेश मे ओत-प्रोत हो रहे मुनिवर की आवाज निरंतर और कठोर तथा प्रबल होती चली गई।

  तभी राजा का ध्यान महर्षि पर पड़ा। उसी वक्त राजा महर्षि के समक्ष खड़े हुए और बोले

   "क्षमा करें पर मैं आपको नहीं पहचान रहा आप कौन हैं और कहां से आए हैं"


  शायद लंबे अंतराल के बाद आए, मुनिवर के चेहरे की बनावट में आए बदलाव या फिर अत्यधिक व्यस्तता के कारण राजा मुनिवर को नहीं पहचान सके। राजा कि इस प्रकार की बातों को मुनिवर अपना घोर अपमान समझ बैठे और उनको काफी बुरा भला कहने लगे।
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  राजा ने जब उन्हे पहचाना तो वे उन से अपनी गलतीयों की क्षमा मांगने लगे परंतु महर्षि की वाणी में विराम नहीं लग सका। तभी वहां पहुंची राजकुमारी यह तो नहीं समझ सकी कि वहां क्या हो रहा है ।

  परंतु इतना जरूर समझ गई कि भरी सभा में दूर दूर से आए राजाओं और अन्य लोगों के समक्ष उनके पिता का कोई घोर अपमान कर रहा है। पिता के अपमान में संतुलन खो चुकी तमतमाई राजकुमारी महर्षि पर बरस पड़ी। राजा ने उसको शांत कराने का प्रयास किया। परंतु तब तक महर्षि के सब्र का बांध टूट चुका था।

  उन्होंने राजकुमारी को क्रोधित स्वरों में कहा

"जिस रुप के अहंकार में तुम मेरा अपमान कर रही हो। वो रूप सूरज की पहली किरण के आगमन के साथ ही गुम हो जाएगा और अंतिम किरण के जाने तक बना रहेगा"


  ऐसा कहकर महर्षि उल्टे पांव वहां से लौट चलें। राजा और रानी उनके पीछे-पीछे उन्हें मनाने चल पड़े। परंतु उनके अथक प्रयास के बाद भी मुनिवर नहीं माने और राज्य से चले गए।

  डरी-सहमे राजा और महारानी जब महल वापस लौटे तो उनके आंखों के सामने जो दृश्य था। उसको देखकर वह स्तब्ध रह गए। उनकी पुत्री जो आज तक जितनी रूपवान थी। अब उतनी ही करूप हो चुकी थी। उसकी पीठ पर कूबड़ निकल गया था।

  जो लोग कभी उसके रूप की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। आज मुंह फेर कर अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे। अपने प्राणों से प्रिय पुत्री की ये दशा देखकर महारानी के मन को काफी धक्का पहुंचा और सदमे से उनकी मृत्यु हो गई।

  धीरे-धीरे राजकुमारी बड़ी होने लगी। उसके विवाह की उम्र हो गई परंतु कोई भी उससे विवाह करने को तैयार न था। पुत्री के विवाह में हो रहे अत्यधिक विलम्ब के कारण राजा को जगह-जगह उपहास का सामना करना पड़ रहा था । 

  पिता की इस प्रकार की जग हसाई का कारण स्वयं को मानकर राजकुमारी एक दिन पिता को बिना बताए, दूर जंगल में चली गई। राजा ने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश की मगर वो उन्हें नहीं मिली।

  धीरे धीरे काफी वक्त बीत गया। एक बार एक राजकुमार जंगल में शिकार करने गया। एक हिरण में उत्साहित राजकुमार अपने सैनिकों को पीछे छोड़ काफी आगे निकल गया।

  शिकार तो उसे नहीं मिला। परंतु इन सबके बीच वो वापस जाने का रास्ता भटक गया। काफी रास्ता ढूंढते-ढूंढते शिकार पर निकला राजकुमार स्वयं जंगली जानवरों का शिकार बनने अचानक उनके सामने पहुंच गया।

  उसने जब नजरें घुमा कर देखा, तो वह चारों ओर से उनसे घिर चुका था। काफी देर तक उनसे जूझते-जूझते वह काफी घायल हो गया। तभी शायद ईश्वर ने उसकी रक्षा के लिए अपने एक फरिश्ते को वहाँ भेजा । उसने जानवरों से लड़कर राजकुमार को बचाया।

  परंतु तब तक राजकुमार पूरी तरह लहूलुहान हो चुका था। उसने राजकुमार को उठाया और अपने साथ एक कुटिया में ले गया। जहां कई दिनों तक उसने उसका इलाज और सेवा की फलतः मूर्छित राजकुमार को होश आ गया।

  जब राजकुमार को होश आया। तो उसने अपने सामने एक अत्यंत कुरूप युवती को पाया। राजकुमार ने पूछा
  "तुम कौन हो और मुझे यहां कैसे आया"

तब युवती ने उसको सारी बातें याद दिलाई। युवक बिस्तर से उठकर उसका धन्यवाद करना चाहा।

  मगर वह खड़ा होते ही बिस्तर पर गिर पड़ा। युवती ने दौड़कर उसे सहारा दिया और कुछ दिन और उसको यहां आराम करने तथा फिर जाने को उससे कहा वह उसकी बात मान गया।

  कुछ दिनों वहां रहने के बाद एक रात्रि युवराज को किसी जानवर की आहट सुनाई पड़ी। उसने बाहर निकल कर देखा तो वहां कोई नहीं था। तभी थोड़ी दूर पर जमीन पर लेटी किसी अत्यंत सुंदर युवती की झलक उसे दिखाई दी।

  फौरन वह वहां पहुंचा उसके सामने एक ऐसी सुंदर युवती थी जैसी उसने पहले कभी नहीं देखी थी। युवराज ने उसे सोता छोड़ वापस अपने बिस्तर पर चला आया। सुबह उसने उस कुरूप युवती से कहा

  "तुमने तो बताया था कि, तुम यहां बिल्कुल अकेली रहती हो"
  युवती  "हां"
  युवराज "पर कल रात जब मैं किसी जानवर की आहट भाप कर बाहर निकला तो वहां सामने एक युवती सोई हुई थी और तुम कह रही हो कि तुम्हारे सिवा यहां और कोई नहीं रहता"

  युवती उसकी बातों को टाल कर वहां से चली गई। थोड़े दिनों बाद आधी रात को फिर राजकुमार की आंख खुली। वह जैसे ही कक्ष से बाहर निकला। उसने फिर अपने सामने एक सुंदर स्त्री को लेटा देखा।

  इस बार युवराज उसके समीप जाकर उसे जगाने का प्रयास करने लगा। जब वह युवती जागी तो अपने सामने उस युवराज को देखकर वो वहां से तेजी से भाग निकली।
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  राजकुमार ने उसका पीछा करना चाहा। परंतु जानवर द्वारा मिले गहरे जख्म अभी भी काफी हरे थे। इसलिए युवराज उसके पीछे तेजी से ज्यादा दूर न जा सका। परंतु इस घटना ने उसके मन में कई सवालों को जन्म दिया।

  वहां से लौटने के बाद वह सो न सका वह बिस्तर पर रात भर करवटें बदलता रहा। उसके मन में ढेरों सवाल उठ रहे थे।

  "आखिर वो लड़की कौन है। वह रात में यहां क्या करती है। दिन में कहां चली जाती है और जिसने खुद के प्राणों को संकट में डाल कर मुझे बचाया वो मुझसे ऐसे क्यों कह रही है,  कि उसके सिवा यहां कोई नहीं रहता । वह मुझसे झूठ क्यों बोल रही है। आखिर ये रात को कहां चली जाती है। क्योंकि मैं जब भी रात को उठता हूँ। आसपास इसे कहीं नहीं पाता हूँ"

  इन्हीं सब सवालों में उलझा राजकुमार रात भर जागता रहा। परंतु सुबह होते होते उसने यह निश्चय किया, कि आखिर सत्य क्या है। वह ये जानकर रहेगा। अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ वही कुरूप युवती वहां पहुंच गई।

  परंतु राजकुमार ने इस बार लड़की से इस बारे में कोई बात नहीं की। अगले दिन शाम ढलते समय जब कुरूप युवती राजकुमार के पास खाने पीने का सारा सामान रख कर गई। तो राजकुमार भी चुपके से उसके पीछे-पीछे चल दिया।

 युवती थोड़ी दूर पर ही एक झील के किनारे बैठ गयी । राजकुमार भी छुपकर झील से थोड़ी दूरी पर बैठ गया । जैसे-जैसे सूरज की किरण धरती से दूर होती गई। उस कुरूप युवती का रूप अपने आप निखरता गया। राजकुमार ये सब देख आश्चर्यचकित था। रात होते-होते वह कुरूप युवती ने सुंदर राजकुमारी का रूप धारण कर लिया।

  चंद्रमा की नीली रोशनी में परियों की महारानी को राजकुमार बस देखता ही रहा। कोई गलती न करते हुए। अपने कदमों को दबाए हुए कोई चुपके-चुपके वह उस सुंदर युवती की ओर बढ़ा।

  परंतु अब तक वह जंगल में रहते रहते जानवरों की कदमों की आहट पहचानने और तमाम चीजों में निपुण हो गई थी। अभी राजकुमार उसके समीप पहुंचता तब तक वो वहां से भाग निकली।

  परंतु अस्वस्थ राजकुमार जानता था, कि अगर वो उसके पीछे भागा तो उसे अपनी इस अवस्था में कभी पकड़ नहीं पाएगा और फिर वह युवती उसके सामने शायद फिर कभी न आए और उसका राज कभी नहीं जान पाएगा।

  इसके साथ ही यह भी नहीं जानता था, कि युवती कौन हैं। वह भलीभांति जान चुका था। किसी भी हाल में वो राजकुमार को नुकसान नहीं होने देगी। अतः राजकुमार ने झील के बिल्कुल किनारे खड़े होकर युवती से वहा वापस आने को अन्यथा झील में कूदकर वह अपनी जान दे देगा। ऐसा डर उसने युवती को दिखाया।

  उसके शब्दों ने तेजी से दौड़ रही युवती के पैरों में लगाम लगा दिया। युवराज के प्राणों की रक्षा के लिए वह उल्टे पांव उसके पास वापस पहुंच गई। युवराज ने युवती को बताया कि कुरूप से रूपवान होते उसे उसने आज स्वयं देखा है।

  इसलिए आज उसे सत्य बताना ही होगा। मजबूर युवती ने उसे सारी बात बताई। जंगल में भटक रही एक रूपवान से कुरूप बनी युवती की कहानी सुनाई।

  उसने बताया कि कैसे उसके पिता की एक छोटी सी भूल को महर्षि ने अपने अपमान का विषय मान लिया और उसे कुरूप होने का श्राप दे डाला।

  युवराज को इतने दिनों में राजकुमारी से काफी लगाव हो चुका था। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। शुरू में तो राजकुमारी विवाह से इंकार करती रही। पर शायद मन ही मन वह स्वयं भी राजकुमार को पसंद करने लगी थी।

  ऐसे में दोनों ने एक दूसरे से विवाह करने का फैसला किया। युवराज राजकुमारी को लेकर महल की तरफ वापस चल पड़ा। दोनों की विवाह का आयोजन हुआ।

  चारों तरफ खुशी का माहौल था। दूर-दूर से लोग राजकुमार के विवाह में सम्मिलित होने आए थे। विवाह शुरू हो गया। तभी ठहरो की आवाज विवाह मंडप में गूंज उठी। काफी कर्कश और जोरदार आवाज ने सबको चौंका दिया।

  सामने एक महात्मा खड़े थे। उन्होंने राजकुमार के पिता से बोला

  "तुम्हें अपने युवराज के लिए यही युवती मिली थी। यह कुरूप और कुबड़ न जाने किस जन्म की सजा भोग रही है इसके अशुभ कदम से राज्य को भारी क्षति पहुंच सकती है"


महाराज अभी कुछ कहते उससे पहले ही महारानी ने कहा

  "क्षमा करें महाराज, परंतु जिसने इस राज्य के चिराग को बुझने से बचाया है उसके कदम राज्य के लिए कैसे अशुभ हो सकते हैं"


महर्षि ने पूछा
  "महारानी, ये आप क्या कह रही हैं"
  महारानी "हां महाराज"

  महारानी ने राजकुमारी द्वारा अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा किए जाने की सारी बात बताई। उसकी बातें सुनकर महर्षि राजकुमारी के समीप आए और अपनी गलती की क्षमा मांगने लगे

  उन्होंने राजकुमारी से उसका परिचय जानना चाहा। तब महारानी ने स्वयं, राजकुमारी को एक महर्षि द्वारा श्रापित होने और फिर महल से जंगल तक के राजकुमारी के सफर की सारी बात महर्षि को बताई।
  महर्षि के चेहरे पर पश्चाताप की रेखाएं खींच गई थी। राजकुमारी से स्वयं को दंड देने की विनती करने लगे। महात्मा ने बताया कि उसे श्रापित करने वाले महर्षि वे ही हैं।

  आवेश में आकर उन्होंने एक साथ कई लोगों के जीवन का नाश कर दिया। महर्षि ने फौरन राजकुमारी को अपना दिया श्राप वापस ले लिया और देखते ही देखते राजकुमारी फिर से स्वप्न सुंदरी बन गई। इस प्रकार राजकुमारी को उसके अच्छे कर्मों का फल मिल ही गया।

Moral Of The Story 


कर्म का फल पर कथन | Quotes On Good Work In Hindi

                       


         Writer
        Karan "GirijaNandan"
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