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घमंडी का सर नीचा | Inspirational Short Story In Hindi On Ego

अहंकार से होता है बुद्धि का नाश  | Success Can Be Achieved By Sacrificing Ego - Story In Hindi 


अहंकार पर प्रेरणादायक हिन्दी स्टोरी | Inspirational Story In Hindi On Ego With Moral


  सूरजपुर के राजा बुद्धिसागर अपने नाम के अनुसार ही काफी बुद्धिमान, चतुर और शक्तिशाली थे। वैसे तो उनके पास धन का अतुल भंडार था पर वह काफी महत्वकांक्षी राजा थे। वे विश्व का सबसे बड़ा राजा बनने और सबको अपना लोहा मनवाने की दृढ़ इच्छा रखते थे  । उनको अपने ज्ञान चतुराई व बुद्धिमत्ता पर बहुत घमंड था।

  एक बार की बात है। राजा ने अपने साम्राज्य विस्तार करने के इरादे से पड़ोसी देश पर युद्ध छेड़ दिया। पड़ोसी देश का राजा इनकी बुद्धि और शक्ति  के आगे असफल रहा। राजा को विजय मिली। पड़ोसी राज्य को जीतने के बाद राजा ने उनके राज्य  में प्रवेश किया।

  राज्य में काफी अंदर जाने पर उस चिलचिलाती धूप में ही राजा को एक वृक्ष के नीचे एक साधु तपस्या करते दिखाई पड़ा। चूंकि पेड़ उजाड़ था इसलिए धूप सीधे साधु के ऊपर पड़ रही थी। राजा उसको देखकर उसकी दशा पर जोर जोर से हंसने लगा।

  राजा को हंसता देख उसके साथ उपस्थित सैनिक भी जोर-जोर से हंसने लगे। इतने में साधू का ध्यान राजा की तरफ गया तभी राजा साधु के समीप पहुंचकर बोला।

   "हे साधु तुम यहां इस चिलचिलाती धूप में न जाने कितने वर्षो से तपस्या कर रहे हो और तुम्हारे राजा ने तुम्हारे लिए एक उचित स्थान की व्यवस्था तक नहीं की। पर अब यह राज्य मैंने जीत लिया है और अब मैं यहां का राजा हूँ। मेरी बात मानो और यह बेकार की तपस्या छोड़कर मेरी आराधना करो। अगर तुम ऐसा करोगे तो मैं तुमको महल जैसा मंदिर बनवा कर दूंगा और तब तुम्हें ऐसी चिलचिलाती धूप में जलना नहीं पड़ेगा बोलो क्या कहते हो"

साधु बोला

    

 "हे मूर्ख राजा तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ, मेरा न कोई राज्य है और न कोई राजा । मेरी छोड़ो तुम बताओ तुम्हें क्या चाहिए। मैं अभी तुम्हारी सारी इच्छाएं अभी पूरी कर देता हूँ"


  साधु द्वारा राजा को मूर्ख कहने उसे बहुत क्रोध आया । उसने साधु से कहा

"तुम किसे मूर्ख कह रहे हो क्या तुम नहीं जानते, मैं विश्व में सबसे बुद्धिमान, चतुर और शक्तिशाली राजा हूँ और तुम आसमान के नीचे तपती भूमि पर तपस्या करने वाले एक अदने से साधु तुम मुझे और किसी को भला क्या दे सकते हो। तुमने मुझे मूर्ख कैसे कहा, हाँ"

  राजा ने अपने सैनिकों से साधु को कैद करने का आदेश  दिया । मगर तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी राजा ने कल्पना भी नहीं की होगी। साधु ने वहां उपस्थित सभी लोगों को एक बड़े से पिंजरे में कैद कर लिया। राजा ये सब देख भौचक रह गया और पिंजरे से बाहर आने के लिए छटपटाने लगा। मगर बाहर निकलने में वह असफल रहा।
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  उसकी ऐसी हालत देख साधु उसकी दशा पर हंसने लगा। जब राजा सारी कोशिश कर के थक गया। तो उसने अपनी हार मान ली और साधु से अपनी भूल की क्षमा मांगने लगा। पर साधु ने उसे छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। राजा उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा। उसके बार-बार प्रार्थना करने पर साधु ने राजा के पास आकर बोला
  

  "तुमने कहा था कि तुम दुनिया में सबसे चतुर और बुद्धिमान हो तो मैं तुम्हें तुम्हारी समझदारी साबित करने का एक मौका देता हूँ। अगर तुम सफल हो जाते हो तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। वरना तुम हमेशा के लिए इस तपती धूप में इस पिंजरे में कैद रहोगे तो बोलो क्या तुम इसके लिए तैयार हो"


  राजा के सामने दूसरा कोई चारा नहीं था और उसे अपने ज्ञान, चतुराई और बुद्धिमता पर काफी अहंकार भी था। इसलिए वह इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। उसने साधु से कहा यह तो मेरे लिए बहुत आसान होगा। साधु ने राजा से पूछा

"तुम्हें कौन सा रंग सबसे ज्यादा पसंद है"


राजा ने लाल रंग बताया। तब साधु ने एक लाल और एक हरे रंग के कपड़े का छोटा टुकड़ा निकाला और दोनों में उसने दो कंकड़ बांधकर दो गोला बनाया उसे एक छोटे से थैले में डाल दिया और राजा से थैली में से उसका पसंदीदा लाल रंग वाला गोला निकालने को कहा।

  राजा ने जल्दी से थैले के अंदर हाथ डाला और दोनो गोलो मे से एक गोला निकाला पर वह तो हरे रंग का था। साधु द्वारा मिले आखिरी मौके को भी राजा ने गवाँ दिया था। हार से झल्लाया राजा पिंजरे में जोर जोर से अपना माथा पटकने और चिल्लाने लगा।

  जब ये बात रानी को पता चली तो वह भागे भागे राजा के पास चली आई।

  तपती धूप में राजा की यह दुर्दशा देख रानी बहुत दुखी हुई। रोते हुए वह साधु से कभी राजा की गलतियों की माफी मांगती तो कभी उसे छोड़ने के लिए साधु से विनती करती पर साधु था कि उसकी कोई बात सुनने को तैयार न था। मगर रानी भी राजा को लिए बिना वापस जाने वाली नहीं थी।

  उसने राजा को साधु की कैद से छुड़ाने का प्रण कर लिया था। आखिरकार रानी पर तरस खाकर राजा को मुक्त करने की बात के लिए राजी हो गया । उसने  रानी से कहा

"मैं तुम्हें राजा को छुड़ाने का एक मौका देता हूँ। अगर तुम सफल हुई तो मैं इसे छोड़ दूंगा"


मजबूर रानी के पास हाँ करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं थ इसलिए झिझकते हुए रानी ने धीरे से सर हिलाते हुए साधु के प्रश्नों के उत्तर देने को तैयार हो गई। साधु ने रानी से उसका फेवरेट कलर पूछा।
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  रानी ने पिंक कलर बताया। साधु ने कपड़े के दो छोटे-छोटे टुकड़े निकालें। एक पिंक और दूसरा हरा। दोनों टुकड़ों में एक-एक कंकड़ रखकर गोला बनाया और उनको लपेट कर पुनः उन्हें थैले में रखकर रानी से उसका फेवरेट कलर वाला गोला निकालने को कहा ।

  रानी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ थैली में हाथ डाली । काफी देर तक हाथ डाले रखने के बाद उसने जब एक गोला चुनकर बाहर निकाला तो सब अवाक रह गए। उस गोले का कलर पिंक था। रानी जीत चुकी थी और इस प्रकार रानी ने राजा को बंधन से मुक्त करा लिया था।

  असल मे रानी को हर हाल में राजा को मुक्त कराने के लिए यह बाजी जीतनी थी हालांकि रानी इसके लिए तैयार नहीं थी। मगर उसके सामने दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था।

  हामी भरने के बाद से ही रानी साधु की हर हरकत पर पैनी नजर रखी हुई थी। उसने देखा था कि जब साधु कपड़ों के दोनों टुकड़ों में एक एक कंकड़ डाल कर उन्हें उनमे लपेटकर गोला बना रहा था।

  तो हरे वाले कपड़े मे छोटा सा धागा निकला हुआ था। जबकि पिंक कपड़े में ऐसा नहीं था। बस क्या था, रानी ने थैली के अंदर जब हाथ डाला तो उसने सारा समय यही अंदाजा  लगाने में लगाया कि किस गोली में कपड़े का धागा निकला हुआ है।

  जब उसे पूरा भरोसा हो गया कि वह सही है तो उसने गोले को बाहर निकाला जबकि अपने ज्ञान, चतुराई और बुद्धिमत्ता के अहंकार में डूबे राजा ने साधु को शर्त के लिए हां करने के बाद भी वह अपने अति आत्मविश्वास में ही खोया रहा और साधु के ऊपर नजर नहीं रखी जिसके कारण वह असफल रहा ।

Moral of The Story

moral of the story "अहंकार पर प्रेरणादायक हिन्दी स्टोरी | Inspirational Story In Hindi On Ego With Moral"

               

         Writer
        Karan "GirijaNandan"
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