"झूठ का फल" प्रेरणादायक हिन्दी स्टोरी | A top moral story in hindi "Result Of Lie". inspirational story in hindi | 'झूठ न बोलने' की सीख देती हिन्दी मे स्टोरी. झूठ बोलने के नुकसान और लाभ - प्रेरणादायक हिन्दी कहानी

झूठ बोलने के नुकसान और लाभ - प्रेरणादायक हिन्दी कहानी | What Is The Advantage And Disadvantage Of Lying - Inspirational Story In Hindi


  गांव में महेश और उसका परिवार रहता था। परिवार छोटा होने के बावजूद खाने पीने के लाले पड़े हुए थे। पति कमाने की बजाय सिर्फ बड़ी-बड़ी डींगे हॉकने में लगा रहता । वह रोज शाम को नदी के किनारे बैठ कर बांसुरी बजाया करता। इसके सिवा उसके पास दूसरा कोई काम नहीं था।

  महेश एक नंबर का  निठल्ला, कामचोर और आलसी था। हालांकि बड़ी-बड़ी ज्ञानवर्धक बातें करना उसकी फितरत थी। पत्नी के बार-बार समझाने पर भी नहीं समझता, बल्कि उल्टे उसी से झगड़ता। जिसके कारण कभी पत्नी से उसका बेइन्तेहाँ प्यार आज मनमुटाव में परिवर्तित हो चुका था।

  महेश के किसी काम में मन न लगने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि उसे हर काम छोटा लगता था । कोई भी काम उसके लायक नहीं था । परंतु 'वह जब चाह लेगा, तब सब हो जाएगा' ऐसा उसका मानना था।

   एक दिन जब वह शाम को नदी के किनारे बैठे-बैठे बांसुरी वादन कर रहा था तभी अचानक उसकी बांसुरी की धुन से मंत्र-मुग्ध हुई एक जलपरी वहां प्रकट हुई। वह वहीं खड़ी उसके बांसुरी की धुन को चुपचाप सुनती रही । बांसुरी में पूरी तरह डूबे महेश को इस बात का खबर ही नहीं थी कि कोई उसे सुने रहा है।

  सामने खड़ी जलपरी मुस्कुराए जा रही थी। वह उसकी इस कला पर काफी प्रसन्न थी। अचानक जलपरी पर उसकी जैसे ही निगाहें पड़ी। वह थोड़ा डर गया। इस प्रकार की रंग, रूप और आकृति वाली स्त्री उसने पहली बार देखी थी। जो नदी के जल पर सीधी खड़ी थी। उसके मनः स्थिति को भाप जलपरी ने उससे बोला

 "हे मनुष्य तुम डरो मत मैं जलपरी हूं मैं तुम्हारा कुछ भी अहित नहीं करूंगी मैं तो इधर से गुजर रही थी कि तभी तुम्हारी बांसुरी की धुन ने मेरा मन मोह लिया और मैं आगे जाने के बजाए नदी की सतह पर आने और तुम्हें सुनने को मजबूर हो गई"

  जलपरी की यह बात सुनकर उसकी जान में जान आई। अपनी तारीफ की बातों ने उसके डरे हुए चेहरे पर हल्की सी मुस्कान बिखेर दी। वह बोला 
 "ऐसा है क्या"
  जलपरी ने बोला 
 "हां ये सच है मैं तुमसे और तुम्हारी इस कला से बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें कुछ देना चाहती हूँ। अगर तुम्हारी कोई विश है तो तुम मुझे बताओ मैं अभी उसे पूरा कर दूंगी"

  तब उसने घमंड के स्वरों में बोला 
 "वैसे तो मुझे किसी चीज की कोई कमी नहीं है। परन्तु मुझे काम करना पसंद नहीं, अगर सारे ऐसो आराम मुझे बैठे-बिठाये ही मिल जाते और मुझे कुछ करना न पड़ता तो फिर क्या बात होती"

  जलपरी ठहाके मार कर हंसने लगी और बोली   
 "जैसी तुम्हारी इच्छा"
  उसने नदी के तट पर बिखरे पत्तों में से एक पत्ते को उठाया और उसे थोड़ी देर देखने के बाद उसे महेश को दे दिया और बोला

"ये लो इसे हमेशा संभाल कर रखना। इसको सामने रखकर तुम इससे जो विश मांगोगे वह तुरंत पूरी हो जाएगी"
  यह सुनकर महेश बहुत प्रसन्न हुआ। तभी जलपरी ने फिर बोला

"परंतु ध्यान रहे इसे कभी हानि नहीं पहुंचनी चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो इससे मिली सारी धन संपदा पल भर में लुप्त हो जाएगा"

  ऐसा कहकर जलपरी वहीं जल में समा गई। आश्चर्यचकित उस महेश ने उस पत्ते को लिया और बासुरी को वहीँ फेक, फ़ौरन घर की तरफ चल दिया । घर पहुंचकर उसने पत्ते को एक घड़े में छुपा दिया और पत्नी से आज के इस सारी घटना के बारे में कुछ नहीं बताया।
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  दूसरे दिन पत्नी के वहां न रहने पर उसने घड़े में से पत्ता निकाला और बिस्तर पर रखकर उसने सोने के सिक्के मांगे। पलभर में ही बिस्तर सिक्कों से भर गया। पहले तो उसे जलपरी की बातों पर तनिक भी विश्वास न था। मगर इस घटना ने उसे चौंका दिया। वो खुशी के मारे बिस्तर से उछल पड़ा।

  इस बात को पत्नी न जान जाए। इसलिए उसने फौरन घर के पीछे जमीन में वह सिक्के छुपा दिए और पत्ते को उसने पुनः घड़े में छुपा दिया।

  अब उन सिक्कों को इस्तेमाल करके वह घर में रोज कुछ न कुछ ले आता। पत्नी के द्वारा पूछने पर कि इन सब के लिए पैसे कहां से आए तो वह इसको अपनी बुद्धिमता और कुशलता से कमाया हुआ धन बताता ।

  पहले तो पत्नी को उसकी बातों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ परन्तु बाद में वह उसकी बड़ी-बड़ी बातों में आ गई। कुछ दिनों बाद ही उसने गांव से थोड़ा दुरी पर जंगल के पास पत्ते को रखकर उससे एक महल जैसा घर बनाने को कहा, महल के बनते ही वह पत्नी के साथ वहाँ रहने लगा।  नए घर में मौजूद महंगी-महंगी वस्तुओ के होते हुए भी महेश उस घड़े को अपने साथ ही रखता।

  एक दिन किसी काम से पत्ते को निकालने महेश घड़े के पास आया परन्तु घड़ा वहाँ नही था । वह वहां से गायब था। उसे वहां न पाकर उसका दिल घबरा गया वह पत्नी को जोर-जोर से पुकारने लगा। चिल्लाने की आवाज सुनकर पत्नी भागे-भागे वहां पहुंची ।

  काफी नाराज महेश ने कठोर स्वरों में पत्नी से पूछा "घड़ा कहां है" तब उसने बताया कि

"मैंने सोचा कि इतने कीमती सामानों के बीच गंदे और टूटे-फूटे इस घड़े का क्या काम तो मैंने उसे पीछे पड़े कूड़े के ढेर के पास रख दिया"

  पत्नी से ये सब सुनकर उसे उसपर बहुत गुस्सा आया परंतु पत्नी के सामने झूठ की दिवार पर खड़ा उसके पुरूषार्थ का महल कही धड़ाम से निचे न गिर जाये, उसकी काबिलियत की सारी पोल न खुल जाए। इस डर से उसने पत्नी को कुछ भी न कहते हुए चुपचाप वहां से घर के पीछे उस कूड़े के पास पहुंचा और घड़े को उठाकर चुपके से अपने कमरे में बेड के नीचे छुपा दिया। 
  शहर में उस निकम्मे की हर तरफ मान जान था । एक दिन जब पत्नी घर में झाडू लगा रही थी। तभी बेड के नीचे बिल्कुल किनारे रखे घड़े से झाड़ू टकरा गया और वह टूट कर बिखर गया। पत्नी ने घड़े के टुकड़ों को झट से उठाया और बाहर सड़क पर फेंक दिया।
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  उसने घड़े के टुकड़ों के साथ-साथ उस पत्ते को भी सड़क पर फेंक दिया। पत्ता सड़क पर उसके इस छोर से उस छोर तक गुलाटी मरता रहा। थोड़ी ही देर में वह सामने से आ रहे तागों और बैलगाड़ीयों के नीचे आने लगा परिणामस्वरुप उस पत्ते के कई टुकड़े हो गये। जैसे ही पत्ता खंड-खंड हुआ। राजमहल जैसा उसका घर कहीं गायब हो गया।

  पत्नी यह सब देखते ही रह गयी। दिन भर की डींग हाँकने के बाद पति जब घर लौटा तो उसने वहां अपना घर न पाकर पहले तो ये सोचा कि शायद 'वह रास्ता भटक गया है' मगर जैसे ही वह वहां से आगे बढ़ा उसे लगने लगा कि वह सही जगह पर आया है।

  परंतु उसका अतिसुंदर महल आखिर गया कहाँ ? वह चकित निगाहों इधर उधर देखने लगा । उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सामने उसे अपनी पत्नी सर लटकाए दूर बैठी नजर आई।

  उसके पास जाकर जब उसने, अपनी पत्नी पूछा तो पत्नी ने उसे सारी बात बताई। वह भागे-भागे पागलो की तरह उस स्थान पर कुछ ढूंढने लगा । पत्नी के बार-बार पूछने पर भी कि "क्या ढूंढ रहे हो" उसने उससे कुछ न बताकर बस ढूंढता रहा

  काफी देर बाद थक हार कर वह चुपचाप वहीं बैठ गया।पत्नी भी उसके पास बैठ गई। तब उसने पत्नी से बोला

"घड़ा कहीं देखी हो"

तब पत्नी ने घड़े के टूटने और उसे बाहर फेंकने की सारी बात पति से बताई। पत्नी से ऐसा सुनते ही वो भाग कर सड़क के चारों तरफ पत्ता ढूंढता रहा।अँधेरा होने को आया मगर पत्ता उसे कहीं नहीं मिला। वह सड़क पर अपना माथा जोर-जोर से पटकने लगा।

  तभी उसे ध्यान आया कि उसने थोड़े सोने के सिक्के पुराने मकान के पीछे जमीन में पत्नी से छुपा कर रखे थे। वह पत्नी को कुछ भी न बताए बिना भागे-भागे वहां पहुंचा और उस जगह पर खोदना शुरू कर दिया।

  मगर वहां भी अब मिट्टी के सिवा कुछ भी नहीं था। तब तक पत्नी भी उसके पीछे पीछे वहां पहुच गई । वह सर पकड़ कर वहीं बैठ गया। काफी देर तक वो चुपचाप गुमसुम वहीं बैठा रहा फिर थोड़ी देर बाद उसने सारी बातें अपनी पत्नी को बताई उसकी बातें सुनकर पत्नी ने अपना सिर पकड़ लिया।
 

Moral Of  The Story

  

  अपनों से हमें कोई भी बात छुपानी नहीं चाहिए अन्यथा जाने अनजाने में उनसे वह नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई शायद कभी न की जा सके  !




   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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