स्वास्थ्य ही धन है -कहानी,महत्व, स्वास्थ्य ही जीवन है पर प्रेरणादायक हिन्दी स्टोरी hindi story on health is wealth and life, importance of health story in hindi

अच्छे स्वास्थ्य का महत्व कहानी Story In Hindi On Importance Of Health


  शहर के एक छोटे से इलाके में तेनालीराम की एक छोटी सी दुकान थी जिसका नाम था "नव दुर्गा इंटरप्राइजेज" । दुकान छोटी ही थी परंतु उस छोटी सी दुकान पर ग्राहकों का तांता सारा सारा दिन  लगा रहता ।

  असल में तेनालीराम की दुकान छोटी जरूर थी परंतु अपनी इस छोटी सी दुकान में तेनालीराम ने गागर में सागर भरने वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया था । घरेलू उपयोग का ऐसा कोई सामान नहीं था जो तेनालीराम की दुकान पर न मिल जाए ।

  ऐसे में ग्राहको को समान देने के लिए तेनालीराम ने काफी वर्करों को रख रखा था । जिसके कारण दुकान में अंदर पैर रखने की जगह नहीं थी । वहां आस पड़ोस के बड़े-बड़े दुकानदार अंदर ही अंदर उसकी सफलता से काफी जला करते थे । वो समझ नहीं पाते थे कि आखिर तेनालीराम इतनी छोटी सी दुकान के बदौलत ग्राहक की इतनी बड़ी भीड़ कैसे जुटा लेता है जबकि वहीं बड़े-बड़े दुकानदार दिन भर मक्खियां मारा करते हैं ।

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  असल मे ये सब तेनालीराम की समझदारी का नतीजा था । वह वाकई एक अच्छा बिजनेसमैन था । किसी से कैसे व्यापार करना है यह वो बखूबी जानता था । तेनालीराम की एक पत्नी और एक बेटी थी । शाम को बहुत भीड़ हो जाने की स्थिति मे उसकी पत्नी दुकान संभालने के लिए वहां आया जाया करती । पत्नी का काम बस ग्राहको से पैसों के लेन-देन तक ही सीमित रहता  ।

  इस तरह तेनालीराम के दिन काफी अच्छे गुजर रहे थे कि तभी एक दिन तबीयत खराब होने के कारण तेनालीराम को डॉक्टर के पास जाना पड़ा जहां उन्हें कुछ टेस्ट करवाने पड़े रिपोर्ट में कोई चिंता की   बात तो नहीं थी । हां परंतु इतना जरूर था कि अब तेनालीराम को अपने जीवन के प्रति थोड़ा ध्यान देने की आवश्यकता थी क्योंकि उनके दरवाजे पर उस बीमारी ने दस्तक दी थी जो इस अधेड़ उम्र तक आते आते लगभग-लगभग हर किसी को अपने गिरफ्त मे ले लेती है ।

  असल मे तेनालीराम को डायबिटीज हो गया था  हालांकि यह बीमारी बिल्कुल आम थी । इसमे ज्यादा घबराने वाली कोई बात नहीं थी । ऐसे मे डॉक्टर की सलाह पर तेनालीराम ने कुछ दवाइयां लेनी शुरू कर दी । जिससे धीरे-धीरे उनकी तबीयत में सुधार आ गया अब वे फिर पहले की तरह दुकान पर आने जाने लगे ।

 वैसे तेनालीराम काफी मस्त मौला स्वभाव के थे । ऐसे में उन्होंने ज्यादा कुछ परहेज करने की बजाय अपनी पुरानी जिंदगी को जीना ही बेहतर समझा  हालांकि उनकी पत्नी उन्हें बार-बार समझाती मगर तेनालीराम को अपनी जिन्दगी मे किसी की रोक टोक बर्दाश्त न थी । वे सुबह के लगभग 10:30 बजे उठा करते फिर नहा धोकर, कभी मन किया तो नाश्ता किया अन्यथा वैसे ही दुकान चले गए ।

  हालांकि दवाइयां वे हमेशा समय से लिया करते मगर बाकी चीजों पर ध्यान न देने के कारण उनका शुगर लेवल अक्सर बढ़ा रहता । जिसे लेकर अक्सर  पत्नी और उनके बीच काफी नोकझोंक हुआ करती । जिसके कारण कभी-कभी तो तेनालीराम नाराज होकर सारा दिन खाना ही नहीं खाते । पत्नी द्वारा ज्यादा जोर दिए जाने पर वह दवाइयों को भी कूड़ेदान में फेंक दिया करते ।

 परिणामस्वरूप हट्टे-कट्टे तेनालीराम देखते ही देखते अचानक काफी दुबले पतले हो गए । उनका स्वास्थ अचानक बहुत तेजी से घटने लगा । डॉक्टर के बार-बार समझाने के बाद भी उन्होंने अपने रहन सहन मे कोई परिवर्तन नही लाया उनके न सोने का कोई समय निश्चित था और न ही जागने का, न उन्हे कोई परहेज करना था और न ही समय से कोई दवाइयां लेनी थी ।

  नतीजा तेनालीराम साल गुजरते-गुजरते चलते बने हालांकि उनके इलाज में उनकी पत्नी ने कोई कसर नहीं छोड़ी । उनके पास जितना भी पैसा था वह सब तेनालीराम की जीवन बचाने में उन्होंने खर्च कर दिया मगर आखिर में वह खाली हाथ ही रह गई ।
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  अब उनके पास एक पुराना मकान और अपनी आठ साल की बेटी की ज़िम्मेदारी थी । इसके साथ ही उनके सर पर ढेर सारे कर्ज का बोझ भी लद चुका था जो उन्होंने मजबूरन तेनालीराम के इलाज के दौरान लिया था ।

  समस्याओं से घिरी तेनालीराम की पत्नी को कुछ नहीं सूझ रहा था हालांकि दुकान अभी भी उनके वर्करों की मेहनत से चल रही थी ।

  एक दिन तेनालीराम के वर्करो ने उनकी पत्नी के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसमें उन्होंने उनके ऊपर लदे सारे कर्ज को चुकाने एवं उन्हें आजीवन घर का राशन मुफ्त देने की बात कही बदले में वे तेनालीराम की पत्नी से उनकी दुकान को अपने नाम करने के लिए कहा ।

  तेनालीराम की पत्नी को यह बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी । पहले तो उन्हे उनकी बात को सुनकर बहुत गुस्सा आया उन्होंने उन्हे डांटकर वहां से भगा दिया ।

  परंतु वक्त के साथ तेनालीराम की पत्नी को यह सौदा उचित लगने लगा और उन्होंने अपनी दुकान वर्करो के नाम कर दी । सारे वर्करों ने पाई-पाई जुटाकर वादे के मुताबिक तेनालीराम की पत्नी पर चढ़े कर्ज को उतार दिया ।

  आज तेनालीराम को गए करीब 2 साल हो गए दुकान वही है दुकान पर लगा "नव दुर्गा इंटरप्राइजेज" का बोर्ड भी नहीं बदला अगर कुछ बदला है तो बस इतना की कभी वक्त हुआ करता था जब तेनालीराम की पत्नी शाम को दुकान के अंदर चेयर पर बैठे ग्राहकों से पैसे की लेनदेन किया करती थी मगर आज वह हाथ में थैला लिए दुकान के बाहर खड़ी, ग्राहकों के हटने का इंतजार कर रही है  ताकि वे सौदा के मुताबिक उनसे अपनी रोजमर्रा का सामान ले सके ।

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जान है तो जहान है इसलिए हमें हर जरूरी काम को रोक कर सबसे पहले अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए स्वास्थ्य की अनदेखी करना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है !


                              

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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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