बच्चों को दे सही परवरिश - प्रेरणादायक कहानी| कैसे निभाए परवरिश की जिम्मेदारी, कैसे करे बच्चे की देखभाल| child care, parental guidance short moral story in hindi


कैसे निभाए परवरिश की जिम्मेदारी -कहानी Child Care Short Story In Hindi


  अरविंद और अंजना ने प्रेम विवाह किया था । जहां अरविंद शहर के जाने-माने गल्ला व्यापारी का बेटा था । वहीं अंजना मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती थी ।  विवाह के कुछ दिनों बाद ही अरविंद और अंजना के आंगन में नेहल और निशांत का आगमन हुआ । निशांत अपनी बड़ी बहन, नेहल से एक साल छोटा था । वैसे तो अंजना और अरविंद अपने दोनो बच्चो नेहल एवं निशांत को बहुत लाड प्यार करते परंतु नेहल का मान जान निशांत से थोड़ा ज्यादा था । 

  वह इसलिए क्योंकि अंजना और अरविंद ये बात बखूबी जानते थे कि नेहल को एक न एक दिन पराए घर जाना है । ऐसे में वह अपनी बेटी के  प्यार एवं सुख सुविधाओं में किसी प्रकार की कोई कमी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे । 

  धीरे धीरे हालात कुछ ऐसे हो गए कि नेहल यदि जिद्द कर दे तो वे निशांत के सामने रखा निवाला भी उठाकर नेहल को दे दे । हालांकि इन सब के बावजूद निशांत के मन में अपनी बहन को लेकर किसी प्रकार की ईष्या की भावना नहीं जन्म ली । शायद वो भी अपने माता पिता की भावनाओं को बखूबी समझता था ।

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   धीरे-धीरे दोनों बच्चे बड़े होने लगे और देखते ही देखते उनके स्कूल जाने का वक्त आ गया । नेहल निशांत से एक साल बड़ी जरूर थी परंतु अत्यधिक लाड प्यार के चलते उसके माता-पिता ने उसे अकेले स्कूल न भेजकर निशांत के साथ ही स्कूल भेजने की सोची जिसके परिणामस्वरूप नेहल और निशांत में एक साल का अंतर होने के बावजूद दोनों ने एकसाथ पढ़ाई  शुरू की । 

  नेहल के माता-पिता जहाँ एकतरफ नेहल को ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलाने के लिए दृढ कटिबद्ध थे । वहीं निशांत को शिक्षित बनाने के मामले मे उनका रवैया थोड़ा ढुलमुल था क्योंकि वे इस बात को बड़ी अच्छी तरह जानते थे कि बड़ा होकर  निशांत को आखिरकार अपनी पुश्तैनी गल्ले की दुकान ही संभालनी है । 
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  इसलिए वे निशांत को ज्यादा पढ़ाने लिखाने के बजाय उसे घर के काम काज में ही लगाए रखा परंतु वहीं नेहल को एक गिलास तक उठाने की मनाही थी । ऐसे नाजो से पली बढी नेहल के अब लिए रिश्ता ढूंढने का समय हो गया है । पिता ने ढेर सारा पैसा खर्च करके बिटिया का एक अमीर घर मे रिश्ता तय किया । 

  नेहल की शादी करके अंजना और अरविंद ने बहुत सुकून की सांस ली । धीरे-धीरे नेहल की शादी को तकरीबन तीन महीने गुजर जाते हैं । नेहल अपने ससुराल में बहुत खुश है परंतु तभी अचानक उसकी खुशियों को  ग्रहण लग जाता है ।हमारी लेटेस्ट (नई) कहानियों को, Email मे प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें. It's Free !

  एक दिन अपनी माँ अंजना से बात करते-करते नेहल जोर-जोर से रो पड़ती है तब पता चलता है कि नेहल को ससुराल में ढेर सारा काम करना पड़ रहा है । वैसे सही मायने में काम कुछ ज्यादा तो नहीं है मगर हां जिसने जीवन में कभी एक ग्लास तक ना उठाया हो उसके लिए थोड़ा बहुत काम भी वाकई पहाड़ तोड़ने जैसा ही है । फोन पर नेहल मायके आने की जिद्द करती है । अंजना भी नेहल को मना नहीं करती और फौरन उसे मायके बुला लेती हैं । 

  नेहाल को यहां आए लगभग छः महीने गुजर जाते हैं । उधर ससुराल वाले नेहल को वापस बुला रहे हैं परंतु ससुराल जाने के नाम से ही नेहल की रूह कांप उठती है । नेहल की इस स्थिति पर एक कहावत चरितार्थ होती है 
 "बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी एक न एक दिन तो हलाल हो ही जाएगी"

  आखिरकार मन मारकर नेहल को ससुराल जाना ही पड़ता है । नेहल के माता-पिता दातों में उंगली दबा बिटिया को विदा कर देते हैं ।

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बच्चों को सुख-सुविधाओं के साथ-साथ जिंदगी की हर बाधा एवं हर चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करना ही असल मायने मे सही परवरिश है !

हर कोई अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी परवरिश देना चाहता है । मगर अच्छी परवरिश का मतलब क्या है ? क्या उसे बस सुख सुविधाओं के समुंदर में डूबोए रखना, कभी कठिनाइयों का सामना न करने देना, क्या यही है सही परवरिश ? तो मैं कहूंगा नहीं

  दोस्तों यद्यपि किसी का भी Good Time उसका बचपन ही होता है । मगर यह बचपन ही ऐसा समय है जिसमें हम वह सब कुछ सीखते हैं जो युवा होने पर हमारे काम आता है ।

  इसीलिए बेहतर होगा कि हम अपने बच्चों को अधिक से अधिक सुख सुविधाओं के साथ-साथ उन्हें जिंदगी में आने वाली चुनौतियों का भी सामना करने दें । उन्हें वह सब करने के लिए प्रेरित करें जो उन्हें एक न एक दिन करना ही है अगर हम उन्हे ऐसा नहीं करने देंगे या ऐसी चीजों से उन्हें दूर रखेंगे तो जब उन्हें जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा तो वे एक ही पल में टूट कर बिखर जायेंगे ।

                             

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   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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