मेरे प्रिय बच्चों !

सदा खुश रहो !

  मैं जल रही हूँ, मेरे बच्चों गर्मी तो तुम भी महसूस कर रहे हो , पर बुद्धि से उससे जीतने के लिए मशीन बनाकर संतुष्ट हो । मेरे बच्चों अब तुम बहुत बड़े हो गए हो माँ की ज्यादातर बातें तुम्हें कोरे उपदेश सी ही लगेंगी ; जानती हूँ , फिर भी मैं अपना फर्ज़ जरूर निभाउँगी । तुम जहाँ से आए हो आज उस जगह से अपने आप को बहुत ऊँचाई पर देख रहे हो और अपनी उपलब्धियों पर खुश भी हो ।होना भी चाहिए  , तुम्हारी इस विकास यात्रा को देख- देख कर मैं भी फूले न समाती थी । मेरे बच्चों ! आगे और आगे दौड़ते – दौड़ते तुम भूल गए कि हर ऊँचाई के साथ ही ढलान भी होती है ।

  मेरे प्यारे बच्चों ! तुम ने सुना ही होगा कि तुम्हारे जन्म से पहले मैंने कितना संघर्ष किया है । आग में तपकर  , बारिश में भीग कर मैं अपने अस्तित्व की रक्षा करती रही । इन प्राकृतिक आपदाओं को ही मैंने अपनी उर्जा बना ली ताकि तुम्हें जीवन दे सकूँ । हर माँ का यही तो सपना होता है न , उसकी संतति बढ़े , फले फूले विकास की नई ऊँचाईयों को छू ले । मैंने भी वही छोटा सा एक सपना देखा था ।

   आज भी याद है मुझे जब तुम अपने बाल्यकाल में थे तो हमेशा मेरी गोद में ही खेलते , खाते और सोते थे । जल , जंगल हो या जमीन , मेरे हर रूप से तुम्हें प्यार था । तुम मेरी देख भाल करते थे मेरा ख्याल रखना अपना फर्ज समझते थे ।यहाँ तक कि तुम मुझे भगवान मानकर मेरी पूजा करते थे । ये पेड़ , ये पौधे मेरे रोम रोम को तुम प्यार करते थे । एक शाखा भी टूटती तो तुम व्याकुल हो कर कई पेड़ लगा देते । मेरे बच्चों ! याद है तुम्हें जब मेरे हृदय के रुप में नदियाँ कल-कल कल-कल बहा करतीं  तो उनके साथ खेलते खेलते कैसे तुमने बोलना सीख लिया । पंछियों के साथ जब मैं गुनगुनाती तो तुम्हारे होंठ भी गुनगुना उठते । याद है तुम्हें एक दिन सागर से जल को पीकर भागते बादलों को जब मैंने वृक्ष रूपी हाथों को उठाकर रोक लिया था तब उसने झमझमाकर बूँदो को तुम्हारे ऊपर उड़ेल दिया था और तुम नाच उठे थे और मोर , वो तो खुशी के मारे पागल ही हो गया था । 
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    हम दोनों कितना खुश थे न ! तुम्हें जीवन जीने के लिए जिन जिन चीजों की आवश्यकता होती मैं सब तैयार कर संतोष पाती और तुम कितना ख्याल रखते थे मेरा  । एक तिनका भी बर्बाद नहीं होने देते । देखते ही देखते तुम बड़े हो गए । अब तुम्हारी जरूरतें भी बढ़ने लगीं । अब तुम्हारे पास तुम्हारी संतान थी उसके सुखद भविष्य के सपने अपनी आँखों में लिए तुमने अपनी माँ का ही हृदय विदीर्ण करना शुरू कर दिया । 
   मेरे बच्चों ! याद है तुम्हें तुमने मेरे हर अंग को नोंचा खसोट डाला । तुमने उन्ही पेड़ों को बेदर्दी से काट डाला जिनसे मैं अतिवृष्टि अनावृष्टि से तुम्हें बचाया करती थी । तुम्हारी संवेदना की परतें एक एक करके खत्म होती गईं । पहले जब तुम गलतियाँ करते थे तो मुझे लगता तुम नादान हो मैं हल्की चपत जड़ देती तुम्हारे गालों पर । परंतु मैं धीरे धीरे यह अनुभव करने लगी कि तुम्हारी नादानियाँ बढ़ती ही जा रही हैं । मैंने तुम्हें थोड़े बड़े बड़े झटके देकर समझाने का प्रयास किया पर अब तो तुम पर अपने बड़े होने का सुरुर सा चढ़ने लगा है । माँ हूँ न ! क्या करूँ ? कैसे अपने ही बच्चों को धीरे-धीरे काल के गाल में समाता देखती रहूँ !! अब तो लगता है मेरे जीवन की सांध्य बेला करीब आ रही है ।
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    मेरे बच्चों ! आज यह चिट्ठी मैं तुम्हें यह बताने के लिए लिख रही हूँ कि जहाँ खड़े हो वहाँ से एक ऐसी ढलान की शुरुआत होती है जो तुम्हें जीवन के अंतिम छोर पर ले जाकर ही मानेगी । मैं माँ हूँ तुम्हारी । माना तुमने मेरी बोटी-बोटी नोंच डाली है , फिर भी अपने संतान के आने वाले कष्टों को महसूस कर मेरी छाती दर्द से फट रही है । मेरे दिल के टुकड़ों ! ये एक माँ  का हृदय बोल रहा जहाँ अपने बच्चों के सुख के अलावा और कोई कामना होती ही नहीं है । अब तो मेरे आँसु भी सूख गए हैं । मुझे कमजोर होता देख सूरज भी आँखें दिखाने लगा है । बादल भी किसी की कहाँ सुनते हैं जब मन करता है जहाँ मन करता है बरसते हैं , ज्यादातर तो बरसते ही नहीं हैं । पानी मेरी सतह छोड़कर भागता जा रहा है ।

    मेरे प्रिय बच्चों ! आशा करती हूँ अपनी माँ की बात समझोगे और आगे गलतियाँ करने से बचोगे । 

  तुम्हारे जीवन की मंगलकामना के साथ 
                                    तुम्हारी माँ
                                          पृथ्वी


  Writer
  बन्दना पाण्डेय वेणु


  यह लेख "डॉ बन्दना पाण्डेय जी" द्वारा रचित है । आप मधुपुर, झारखंड स्थित एम एल जी उच्च विद्यालय, में सहायक शिक्षिका हैं । आपको, कविता, कहानी और संस्मरण के माध्यम से मन की अनुभूतियों को शब्दों में पिरोना बेहद पसंद है । आप  की एक रचना "सो गईं आँखें दास्ताँ कहते कहते" मर्मस्पर्शी एवं हृदयविदारक है । अपना लेख MyNiceLine.com पर साझा करने के लिए हम उनका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं!


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