कैद से मुक्ति- कहानी| भाई बहन के प्यार भरे रिश्ते पर स्टोरी| best emotional hindi story on divorce. bhai behan story| दहेज उत्पीड़न पर दिल को छू लेने वाली कहानी

दहेज उत्पीड़न पर दिल को छू लेने वाली कहानी | Story On Divorce In Hindi


  धू धू कर जलती चिता की लपटें आसमान को भी निगल जाने को व्याकुल दिख रही थीं । लेकिन धीरे धीरे श्मशान की खामोशी में लपटों ने भी दम तोड़ दिया । लगभग खाली हो चुके श्मशान में एक जोड़ी आँखें टुकुर-टुकुर चिता को निहार रही थीं , आँसु थे कि रूकने का नाम नहीं ले रहे थे ।

तभी जोर के अट्टहास से रात्रि की निस्तब्धता चीत्कार कर उठी । कुशल ने देखा वह काव्या थी और उसे ही संबोधित कर कह रही थी

 “ जाओ भैया घर जाओ निश्चिंत होकर। पापा को बोल देना अब मैं सभी कष्टों से मुक्त हो गई हूँ । अब कभी उनकी नाक नहीं कटेगी, अब मुझे तलाक लेने की कोई जरूरत नहीं । अब तो बस एक ही इच्छा है बेफिक्र होकर सोने की । मुझे जोरों की नींद आ रही है और आज मुझे डर भी नहीं लग रहा है । घर जाओ भैया मेरी चिंता मत करो मैं अब एकदम ठीक हूँ ---

  काव्या  बोलती जा रही थी और कुशल का व्यथित हृदय दर्द से फटता जा रहा है । काव्या के स्वर में आक्रोश मिश्रित उलाहना भरा था । काव्या का एक-एक शब्द उसके हृदय को छलनी कर रहे थे, कुशल रो पड़ा, फूट फूटकर रो पड़ा । रोते हुए कुशल एक ही बात दोहरा रहा था



 "हमें माफ कर दे काव्या, मेरी छुटकी हमें माफ कर दे----"  


  कुशल ने माथे पर माँ के स्नेह स्पर्श को महसूस कर कातर दृष्टि से माँ की ओर देखा । माँ बेटे के आँसुओं से भीगे चेहरे को देख स्तब्ध थीं और आशंकित भी । माँ ने हाथ में पकड़ा पानी का ग्लास पकड़ाते हुए पूछा ही दिया

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  "स्वप्न में तुम काव्या से क्षमा क्यों मांग रहे थे दोनों भाई बहन में लड़ाई तो नहीं हो गई"

अब कुशल को थोड़ी राहत मिली यह एक बुरा सपना था ।

    “राखी आने वाली है , काव्या को कुछ दिनों के लिए यहीं लेकर आ उसका भी मन बदल जाएगा । परंतु अभी खाना खाने का समय हो गया है पापा टेबल पर इंतजार कर रहे हैं तेरा--"

  माँ बोलती जा रही थीं पर कुशल का मन तो कहीं और ही था ।

   कुशल उठा , हाथ मुँह धोकर खाना खाने के लिए आ तो गया पर अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने में देखी गई बातें उसे परेशान कर रही थीं।
  दरअसल कुशल और काव्या दोनों भाई बहन एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे। दोनों ही पढ़ाई लिखाई में कमाल के थे । सफलता के कई परचम लहराए थे दोनों ने । अभी दो वर्ष ही हुए काव्या की शादी हुए । अपनी ही दूर की रिश्तेदारी में राजीव जो एक प्राइवेट कंपनी में अच्छी सेलरी के साथ नौकरी करता है काव्या की शादी तय हो जाती है ।

  शादी बड़े ही शानदार ढंग से सम्पन्न हुई काव्या सबकी लाडली थी इसलिए यह खास ख्याल रखा गया था कि मायके से विदा हो रही काव्या की हर छोटी-बड़ी इच्छा का ध्यान रखा गया था। कुशल ने भी अपनी छुटकी की खुशियों का पूरा ध्यान रखा था । मध्यमवर्गीय परिवार के लिए आज कल की शानदार शादी के आयोजन में कमर टेढ़ी हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी । काव्या के पापा भी इससे अछूते नहीं ।

  लेकिन समय की विडंबना कब समझ आई है, अभी दो महीने भी नहीं हुए थे कि खबर मिली कि राजीव को ऑफिस जाने में रोज दिक्कत हो रही है मोटरसाइकिल चाहिए । फिर कहीं किसी तरह से व्यवस्था कर दामाद की मांग पूरी कर दी गई आखिर अपनी भी तो नाक का सवाल था । इसके बाद तो मांगों का सिलसिला बढ़ता ही गया। हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते ।

  एक दिन काव्या ने स्पष्ट कर दिया अब मेरे पापा से आप लोग कुछ नहीं मांग सकते बहुत हो गया । आनन फानन में उसके पापा को बुलाकर कह दिया गया कि आप अपनी बदतमीज बेटी को यहाँ से ले जाएँ तलाक के कागज वहीं पहुँच जाएंगे । पापा सन्न रह गए ब्लडप्रेशर बढ़ कर 240/150 । बस एक ही चिंता

  "लोग क्या कहेंगे --!"

  काव्या ने बहुत समझाने का प्रयास किया कि वह पढ़ी लिखी है नौकरी कर लेगी लेकिन इन दरिंदो को और सह नहीं देगी । लेकिन पापा पर काव्या की किसी बात का कोई फर्क नहीं पड़ा । उल्टा पापा ने इसे ही समझा दिया यदि तूने उनसे माफी नहीं मांगी और ससुराल नहीं गई तो हमारा मरा मुँह देखेगी । हम तलाकशुदा बेटी को लेकर समाज में किस तरह बाहर निकलेंगे । माँ ने दबे शब्दों में विरोध करना चाहा तो उन्हें भी पापा की डांट खानी पड़ी।
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    अंततः पापा की जिद्द के आगे सबको घुटने टेकने पड़े। काव्या ढेर सारे उपहार लेकर ससुराल चली गई । अब यह एक क्रम सा बनता जा रहा था । और काव्या का मन इस शोषण को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था । उसने तय कर लिया मर जाएगी पर मायके नहीं जाएगी न उपहार लाएगी । अब उसपर होने वाले अत्याचार भी बढ़ते जा रहे थे, मार पीट तो रोज नास्ते की बात थी।

  तभी एक दिन जब कुशल का फोन आया कि मैं भारत वापस आ रहा हूँ काव्या तैयार रहे रक्षाबंधन पर घर आने को । पर काव्या ने स्ष्ट रूप से मना कर दिया यहां तक कि उसने कुशल को भी यह कसम दे दी कि वह उसके ससुराल नहीं आएगा ।

  काव्या की शादी के बाद ही कुशल अमेरिका चला गया था, वह अपने भावी जीवन की तैयारी में लगा था इसलिए किसी ने काव्या की समस्या भी उससे बताना उचित नहीं समझा । पर अब तो वह वापस आ रहा है माँ के मन को भी कहीं न कहीं एक उम्मीद जगी कि बेटा सब ठीक कर देगा ।

    कुशल भी आते ही मौका निकाल कर पहले माँ से काव्या के बारे में पूछा , माँने शुरू से आज तक की सारी घटनाएं कह सुनाईं ।

  “हम आज भी ये किस मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ जान से अधिक इस बात की चिंता होती है कि लोग क्या कहेंगे—” 

सोचते-सोचते कुशल की आँख लग गई और उसने एक भयानक स्वप्न देखा जिसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

  पापा उससे उसके बारे में पूछते रहे पर वह तो अपनी छुटकी को कैद से आजाद कैसे कराया जाय इस सोच में डूबा था । खाना खाकर हाथ धोकर वह तैयार हुआ और उसने पापा से स्पष्ट कह दिया

  "पापा मैं छुटकी को एक अनचाहे निरशंस रिश्ते की कैद से मुक्त कराने जा रहा हूँ , और पापा लोग तभी बोलते हैं जब हम सुनते हैं । इसलिए डर या शर्म की बात हमारे लिए छुटकी की खुशियों से बड़ी नहीं हो सकती"

  जवान बेटे के निर्णय ने पिता के झुके कंधों को सहारा दिया तो बेटी के लिए जो चिंता उनके हृदय में भरी हुई थी वह आँसुओं की अविरल धार के रूप में बह निकली ।  अब पापा की सोन चिरैया फिर से चहकेगी--- ।



Writer
         बंदना पाण्डेय वेणु               

   
 यह कहानी "डॉ बन्दना पाण्डेय जी" द्वारा रचित है । आप मधुपुर, झारखंड स्थित एम एल जी उच्च विद्यालय, में सहायक शिक्षिका हैं । आपको, कविता, कहानी और संस्मरण के माध्यम से मन की अनुभूतियों को शब्दों में पिरोना बेहद पसंद है । आप द्वारा लिखी गई कहानी सो गईं आँखें दास्ताँ कहते कहते ,  अहंकार या अपनापन  व लेख "एक चिट्ठी यह भी" आपके गहरे चिंतन पर आधारित है । अपनी रचना MyNiceLine.com पर साझा करने के लिए हम उनका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं!

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