21 July, 2018

मुफ्त मे मिली सुविधाओ की कीमत जाने Nothing Is Free In This World Story

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मुफ्त की सुविधाओ की value समझे- हिन्दी स्टोरी, | nothing is free in this world motivational story in hindi


क्यों कुछ भी मुफ्त नही कहानी | Nothing Is Free In Life Story In Hindi


  बहुत समय पहले की बात है एक गांव में  एक लकड़हारा रहा करता था । वह बहुत गरीब था उसके पास न तो ढंग का भोजन था और न ही सर पर छत, किसी तरह से उसका गुजारा हुआ करता था । वह रोज सुबह-सुबह बिना कुछ खाए पिए ही जंगल की ओर निकल जाता और पूरा दिन भूखे-प्यासे जंगल में लकड़ियां इकट्ठा करता । उन लकड़ियों को  बाजार में बेचकर उसे जो पैसे मिलते उससे वह खाने-पीने के जरूरी सामान खरीद लाता । इस प्रकार किसी तरह से वह एक दिन के भोजन का इंतजाम कर पाता । 
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  वैसे तो उसके खर्चे बहुत ज्यादा नहीं थे क्योंकि वह दुनिया में बिल्कुल अकेला था परंतु फिर भी उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी ।

   एक बार जब वह घर का कुछ सामान दुकान से लेकर जा रहा था तभी पीछे से आ रहा एक तांगे से उसे जरा सी ठोकर लग गई जिसके कारण झोले में रखी गयी दाल के कुछ दाने जमीन पर बिखर गए । वह फौरन उन दानों को उठाकर उन्हे झोले मे रखना  लगा । तभी सामने से आ रहे गांव के एक चरवाहे की नजर उस पर पड़ी । वह लकड़हारे की आर्थिक स्थिति को बहुत अच्छी तरह से जानता था । ऐसे में उसने लकड़हारे का मजाक उड़ाते हुए बोला

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  "अरे भाई इन चार दानों में क्या रखा है । कहीं इन चार दानों को उठाने में, तुम सड़क पर आ रही इन गाड़ियों के शिकार न हो जाओ"
  तब लकड़हारे ने कहा 

  "ये चार दाने नहीं मेरे खून पसीने की कमाई है इसका मोल तुम नही समझ सकते"

  एक दिन जब वह अपने घर के बाहर चारपाई पर गेंहू को धुल कर सुखा रहा था तभी बैठे-बैठे अचानक उसकी आंख लग गई । उतने ही देर में जाने कहां से ढेरों पंछी वहां आकर गेंहू के दानों को खाने लगे तभी अचानक उसकी आंख खुली मेहनत से कमाये गए अनाज का एक-एक दाना उसके लिए बहुत कीमती है । ऐसे में उसने दौड़कर उन पंछियों को भगाया और फिर उनके द्वारा जमीन पर बिखरे दानों को उठाने लगा । तभी वहां पास बैठे गांव के कुछ लोगों ने चरवाहे की निर्धनता का मजाक उड़ाते हुए बोला 

"भाई सारा का सारा अनाज क्या तुम ही खा जाओगे कुछ इन पंछियों के लिए भी छोड़ दो इतनी कंजूसी ठीक नहीं"

  उनकी बातों को सुनकर लकड़हारे ने जवाब दिया 


"जिसे खुद का पेट भरना मुश्किल हो वह भला दूसरों का पेट भरने की कैसे सोच सकता है, ये सब मेरे बस की बात नहीं"


  परंतु गांव वाले उसकी गरीबी का मजा लेने का एक भी मौका नहीं गवाते । बेचारा लकड़हारा उनके इरादों को बड़ी अच्छी तरह समझता, मगर अपनी विवशता के कारण वह उन्हे ज्यादा कुछ नही कह पाता । 

  एक दिन जब लकड़हारा जंगल में लकड़ियां बटोर रहा था । तभी अचानक उसने किसी के चिल्लाने की आवाज सुनी । वह तेजी से उस आवाज की तरफ दौड़ा वहा पहुंचकर उसने देखा कि एक युवक जोर-जोर से चिल्लाया जा रहा है । उसके सामने एक तेंदुआ खड़ा है जो उसे अपना आहार बनाने के प्रयास मे लगा है । लड़का इधर उधर भाग कर किसी तरह अपनी जान बचाने का प्रयास कर रहा है । जंगल में वर्षों से काम करते-करते चरवाहे को ऐसे मुश्किल हालातो का सामना करने का काफी अनुभव था । 

  ऐसे मे वह लकड़ी की एक मोटी सी डाल को लिए  तेंदुए के सामने आ खड़ा होता है, वह काफी मशक्कत के बाद लड़के की जान बचाने में सफल हो जाता है । लड़का घबराया हुआ वहां से भागकर अपने घर पहुचता है । 

  दूसरे दिन जब लकड़हारा रोज की तरह सुबह उठकर जंगल की तरफ निकल रहा था तभी उसे रास्ते मे मुखिया जी मिल जाते हैं । वह मुखिया जी को नमस्कार करता है तब मुखिया जी उसे बताते हैं कि कल उसने जिस युवक की जान बचाई थी वह युवक कोई और नहीं उनका अपना इकलौता बेटा है । मुखिया जी लकड़हारे के एहसान तले पूरी तरह दब चुके थे ।

  चूँकि वे जानते थे कि लकड़हारे की आर्थिक हालत बहुत ही दयनीय है ।  ऐसे में मुखिया जी उसे अपने साथ अपने घर ले आए हैं और उसे अपने लोगों के साथ भंडार घर में भेजते हुए कहा

  

"मैं जानता हूँ कि तुम्हारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है । बहुत ही मुश्किल से तुम अपने दो जून की रोटी का गुजारा कर पाते हो । आज से तुम रोज सुबह हमारे भंडार गृह मैं आ जाना और फिर जितना भी तुम खा सको उतना अनाज और अन्य सामान यहां से ले जाना । तुम्हें अब किसी प्रकार की कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं है" 


  मुखिया जी की बातों को सुनकर लकड़हारे को अपार हर्ष की प्राप्ति हुई । वह फौरन मुखिया जी के लोगों के साथ भंडार गृह की ओर चल पड़ा वहां पहुंचकर मुखिया जी के लोगों ने भंडार गृह का ताला खोलते हुए उसे जो चाहिए और जितना चाहिए उतना ले जाने को कहा । इतना ढेर सारा सामान अपने सामने देखकर लकड़हारे की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा । कभी नमक-भात तो कभी दाल-रोटी खाकर गुजारा करने वाले लकड़हारे के लिए आज बहुत खुशी का दिन था ।
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  उसने फटा-फट झोले में एक सेर आटा, एक सेर चावल, आधा सेर दाल, हरी सब्जी, आलू, मर्चा,  नमक, हल्दी, एक बाल्टी दूध, दही और ढेर सारे खाने के सामान को लेकर घर की ओर निकल पड़ा । घर पहुंच कर उसने ढेर सारा खाना पकाया और खाया, जीवन मे आज पहली बार उसने पेट भर खाना खाया था ।

  अगले दिन सुबह वह फिर मुखिया जी के भंडार गृह पर पहुंच गया । जहां से उसने फिर उतना ही राशन का सामान लिया और घर वापस चला आया हालांकि पिछले दिन वह इतना ही राशन लेकर आया था जो उसके खाने के बाद भी बचा रह गया था और जो शाम तक खत्म नहीं हुआ जिस के नाते उसे खाना फेंकना पड़ गया था । 

मगर मुफ्त में मिल रहे सामानों को लेने और खर्च करने में ज्यादा क्या सोचना इसलिए उसने आज भी फिर ढेर सारा खाना पकाया और फिर बचे खाने को उसने बाहर पशु पक्षियों को डाल दिया । गांव वाले उसके इस काम को देखकर आश्चर्यचकित थे क्योंकि जो लकड़हारा आज तक एक-एक दाना बटोर-बटोर कर रखा करता था । वह आज इतना बड़ा धनपत सेठ कैसे बन सकता है । अगले दिन गांव वालों ने उसकी चुटकी लेते हुए बोला

  "अरे भाई तुम तो अब नवाब हो गए हो जो कल तक एक-एक दाने को बचाने मे लगा रहता । वही आज बने बनाये खाने को नालियों मे बहाए जा रहा है"

तुम्हारे तो दिन ही बहुर गए हैं । कभी हमें भी दावत पर बुलाओ अकेले-अकेले पकवानों का मजा लेते रहना ठीक नहीं है"

  तब लकड़हारे ने कहा 

  "अच्छा ठीक है कल तक का इंतजार करो कल मैं तुम सबको मै दावत दूंगा"

  दूसरे दिन लकड़हारे ने मुखिया के भंडार गृह से ढेर सारा आटा और उसी अनुपात में सभी चीजें बढ़ा-बढ़ा कर ली और फिर घर आकर उसने उन्हें पकाने के बाद अड़ोस पड़ोस के सभी लोगों को दावत दी । दावत खाकर सभी बहुत खुश हुए और उसकी तारीफ पर तारीफ करने लगे । अपनी तारीफ सुनकर लकड़हारे को बहुत खुशी हुई ।

  इस तारीफ को सुनने के लिए उसे कुछ करने की भी जरूरत नहीं थी क्योंकि इसके लिए जिन चीजों की आवश्यकता थी वो तो उसके लिए बिल्कुल मुफ्त थी । अब उसे जो चीजें चाहिए वो सब उसे मुफ्त मिल रहा था तो फिर इस अवसर का लाभ उठाने में जाता ही क्या  है ।

  अगले दिन से वह मुखिया के भंडार गृह से और ज्यादा खाद्य सामग्री लेकर घर आता और फिर पूरे गांव वालों को दावत देता जिसके नाते कल तक जो लकड़हारा, गांव वालों के लिए सिर्फ एक मजाक की वस्तु था आज वही लकड़हारा उनके लिए आम से खास बन चुका था । सब के सब, दिन-रात बस उसी के गुणगान में लगे रहते । 

  एक दिन कुछ अस्वस्थ होने के कारण लकड़हारा  मुखिया के वहां न जाकर अपने घर पर ही लेटा रहा चूंकि मुखिया जी दिन का पहला निवाला मुंह में डालने से पहले अपने इकलौते  संतान की जान बचाने वाले लकड़हारे के खैरियत के बारे में अपने लोगो से मालूमात जरूर करते, परंतु उन्हे पता चला कि लकड़हारा आज तो नहीं आया है । यह जानकर  मुखिया जी को उसकी बड़ी चिंता होने लगी । 

  उन्होंने स्वयं लकड़हारे घर जानकर उसका हालचाल जानने की सोची । ऐसे मे उन्होंने उन्होंने अपने लोगो से, लकड़हारे द्वारा ले जाने वाले रोज के राशन को भी साथ ले चलने को कहा । जब मुखिया के आदमी लकड़हारे द्वारा ले जाने वाले रोज के राशन को लेकर उनके सामने पहुंचे तो मुखिया राशन की सामग्री को देखकर हसने लगे और बोले 

  "अरे मुर्खो मुझे बस उसके द्वारा ले जाने वाले एक दिन का राशन ही दो क्योंकि उसकी क्या आवश्यकता है और क्या नहीं यह वही बेहतर समझ सकता है ऐसे मे उससे बिना पूछे इतना ढेर सारा सामान ले जाना बेवकूफी होगी"
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  मुखिया के लोगों ने उसे बताया की यह उसके हफ्ते या महीने भर का राशन नहीं बल्कि एक दिन का ही राशन है । वह रोज इतना राशन ले जाता है । मुखिया यह सुन कर हंस पड़ा और बोला इतना राशन ? इतने राशन का वह करता क्या होगा ? मैंने सुना था कि 


 "पतली डेहरी में ज्यादा अन्न आमाता है"


  मगर इतना आमाता है ये तो मैंने कभी सपने मे भी नही सोचा था ।
यह कहकर मुखिया जी जोर-जोर से हंसने लगे तब उनके एक भरोसेमंद नौकर ने कहा

  "नहीं-नही मालिक यह सच है वह रोज इतना अनाज और दूसरे सामान ले जाता है चूंकि आपने हमें पहले ही कह रखा है कि वह जो चाहे जितना चाहे उतना उसे ले जाने देना । ऐसे में हमने उसे कभी किसी बात के लिए रोका नहीं । मुखिया जी ने कहा 

  "तुमने ठीक किया उसने मेरी एकलौती संतान की जान बचाई है ऐसे में यह उसका हक है मैं चाहता हूँ कि उसे खाने पीने या किसी चीज की कोई कमी न हो । मगर फिर भी मैं देखना चाहता हूँ कि आखिर वह रोज-रोज इतने राशन का करता क्या है । वैसे तो मैं यह राशन लेकर खुद ही उसके पास जाना चाहता था क्योंकि उससे मिले हुए भी मुझे बहुत दिन हो गए । मगर तुम लोगों की ये बातें सुनकर मुझे कुछ शंका हो रही है ऐसा करो यह राशन लेकर तुम लोग ही उसे दे आओ और साथ ही यह भी पता लगाकर आना कि वह इतने राशन का करता क्या है ?"


   मुखिया के लोग लकड़हारे का राशन लेकर उसके घर की ओर चल पड़े । वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि लकडहारा घर के सामने बने छप्पर में अपनी खटिया बिछाए ठाठ से लेटे हुए हैं । 

  जब उन्होंने उसके घर के आसपास नजरे दौड़ाई तो देखा कि ढेर सारा अनाज इधर-उधर गिरा पड़ा हैं । वहीं नालियों में दूध, दही बहती नजर आयी । पास ही एक कूड़े के ढेर से कई दिनो से सड़ रहे खाने दुर्गन्ध आ रही थी । शंका होने पर उन्होंने आसपास से पता लगाया । तब उसे लकड़हारे के नफासत का पता चला ।

  वापस लौट के उन्होंने मुखिया को लकड़हारे की सारी करतूत बताई । जिसे सुनकर मुखिया को बहुत गुस्सा आया । अगले दिन जब लकड़हारा राशन लेने भंडार गृह पहुंचा तब वहां ताला लटका मिला । जब उसने मुखिया के लोगों से ताले को खोलने को कहा तब उन्होंने उसे मुखिया जी के पास भेज दिया लकड़हारे को सामने पाकर मुखिया जी ने उसे बड़े ही आदर और सम्मान से अपने पास बुलाया और कहा

"तुमने मेरे एकलौते संतान को बचाकर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया था । एक ऐसा एहसान जिसे मैं शायद पूरी जिंदगी न चुका पाऊं चूंकि तुम्हारी स्थिति काफी दयनीय थी इसलिए मैंने ताउम्र तुम्हारे खाने-पीने का प्रबंध करना चाहा । तुम्हें हर सुविधा दी । मगर तुमने इन सब सुविधाओं का नाजायज फायदा उठाया । तुमने पूरे गांव वालों को रोज-रोज दावत देनी शुरू कर दी । खून-पसीने से कमाए अनाज तुम्हारे घर की नालियों में सड़ रहे हैं । मुफ्त में मिली चीजों की तुम्हें कोई कदर ही नहीं है"

 मुखिया जी ने फिर कहा

 

  "तुम्हें शायद नहीं पता कि अनाज का एक दाना कितनी मुश्किल से उगाया जाता है । इन्हें यूं ही बर्बाद करने का हक किसी को नहीं है । मैंने तुम्हें जो भी मुफ्त की सुविधाएं दे रखी थी । आज से मैं उन सभी सुविधाओं को बंद करता हूँ । मैं तुम्हारे एहसानों को कभी भूल नहीं सकता इसलिए मैं तुम्हें फिर भी जीने का एक रास्ता दे रहा हूँ । आज से तुम जंगल से जितनी लकड़ियां लाओगे उसके बाजार मूल्य का तीन गुना राशन मैं तुम्हें दूंगा । अब ये तुम जानो कि उतने में अपना काम तुम कैसे चलाते हो"


  लकड़हारे को अपनी गलतियों का एहसास हो चुका था । मन ही मन वह पछताता हुआ घर वापस चला गया । अगले दिन बहुत दिनो बाद दुबारा  से जंगल में लकड़ियां इकट्ठा करने गया । काम करने की आदत छूट जाने के कारण उसे बहुत बुरा महसूस हो रहा था । मगर फिर भी खाने के लिए काम तो करना जरूरी था । 

  दिनभर की लकड़ियां इकट्ठा करने के बाद जब वह उन लकड़ियों को मुखिया जी के वहां ले गया तब उसे उसके बाजार मूल्य का तीन गुना राशन मुखिया के लोगों ने उसे दे दिया । वह राशन काफी था मगर इतना नहीं था कि उसे गांव वालों में लुटाया जाए या उसे इधर उधर नालियों में फेंका जाए । जहां मुफ्त की मिली सुविधाओं को वह इधर उधर बर्बाद करने मे लगा था वही मेहनत के बल पर मिली मुट्ठी भर राशन का मूल्य उसने समझ लिया था । वह अनाज के एक दाने को जाया नहीं होने देना चाहता था ।

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कहानी से शिक्षा | Moral Of This Best Inspirational Story In Hindi 


मुफ्त में मिली सुविधाओं का मूल्य समझना हर किसी के लिए काफी कठिन होता है । अगर कोई चीज हमें मुफ्त में मिल रही है तो उसको खर्च करने के बारे में ज्यादा सोचना बेफिजूल की बात लगती है । उसे हम जितना चाहे जैसे चाहे वैसे खर्च कर सकते हैं उसका सही ढंग से उपयोग करें या उसे बर्बाद करें इससे क्या फर्क पड़ता है आखिर वह चीजें हमें मुफ्त में मिल रही है और जब मुफ्त में मिल रही हैं तो उसके लिए ज्यादा गुणा-गणित करना बेवकूफी होगी ।

  ऐसी सोच हर किसी में है जब हम मार्केट में कहीं पर सेल लगी हुई देखते हैं उस पर 50% डिस्काउंट देखते हैं तो फौरन उधर दौड़ पड़ते हैं क्योंकि हमारा 50 परसेंट का मुनाफा हो रहा है हमारा पैसा बच रहा है वैसे ही जब हम कोई सुविधा चाहे सरकार की तरफ से दी जाए चाहे अन्यत्र कहीं मिल रही हो अगर वह मुफ्त में है तो उसे जितना हो सके हम उतना लेने पर टूट पड़ते हैं चाहे उसका सही उपयोग हम कर पाए या न कर पाए चाहे वह चीज हमारे उपयोग से ज्यादा ही क्यों ना हो मगर ऐसी सुविधाओं को वक्त रहते जितना ज्यादा से ज्यादा लूट लिया जाए उतना अच्छा है ।

  मुफ्त की चीजों का मूल्य न समझना आज हमारी जिंदगी में काफी सारी परेशानियों की वजह बनता जा रहा है कभी वक्त हुआ करता था जब यहां पानी की कोई समस्या नहीं थी सभी के सभी जितना चाहे उतना पानी हर मौसम में यूज कर सकते थे मगर आज उसी पानी का दुरुपयोग हमें कहां से कहां ले आया ।

  जब गर्मियों का सीजन आता है तो हम पानी की एक-एक बूंद को बचाने की कोशिश करते हैं मानो वह पानी की बूंद न हो कर कोई अमृत हो क्योंकि शायद सच भी यही है कि पानी का एक-एक कतरा अमृत के समान है या इस बात को एक प्यासा ही समझ सकता है वह कभी नहीं समझ सकता जिसने प्यास से पहले ही पानी को प्राप्त कर लिया आज के मॉडर्न युग में धीरे-धीरे पानी की किल्लत बढ़ती चली जा रही है एक दिन वह भी आएगा जब एक बोतल पानी में पूरा दिन चलाना होगा ।

  नई रिसर्च के मुताबिक अगले कुछ वर्षों में पृथ्वी पर अनाज की उपज भी आधी रह जाएगी मतलब जितना आज के समय में हम उगा पा रहे हैं उसका भी आधा अनाज हम उगा पाएंगे वैसे तो आज हमारे समाज में अधिकांश वर्ग को अनाज की कोई समस्य नहीं है आधे से ज्यादा आबादी अनाज का उपयोग करती है उससे कहीं ज्यादा वह बना-बनाकर इधर-उधर वेस्ट करती है और क्यों ना करें आखिर उसने इसका मूल्य चुकाया है हम अनाज का मूल्य चुका कर उसके मालिक हो गए हैं और हम चाहे उसे खाएं या बर्बाद करें इसमे किसी का क्या जाता है ।


  मगर जब इसी अनाज की उपज आधी और फिर आधी की भी आधी हो जाएगी तब हम शायद इसका मूल्य समझ आएगा क्योंकि अभी ये हमे लगभग मुफ्त में ही मिल रहा है और मुफ्त में मिलने वाली चीजों की कोई कद्र नहीं होती मगर जब अनाज के एक-एक दाने के लिए लोग तरस जाएंगे तब  अनाज की वैल्यू हमें समझ आ जायेगी ।

  ऐसा दिन ना आये तो ही अच्छा है हमें मुफ्त में मिली सुविधाओं का मूल्य समझना होगा क्योंकि जो मुफ्त है उसका भी कोई मूल्य जरूर है ऐसा नहीं है कि उसकी कोई कीमत ही नहीं कोई भी चीज दुनिया में मुफ्त मे नहीं मिलती है उसका मूल्य कोई ना कोई जरुर चुका रहा है इसलिए बेहतर होगा कि हम वक्त से पहले संभल जाएं और मुफ्त मिलने वाली सुविधाओ का भी उपयोग उतना ही करें जितना उसकी आवश्यकता है । उसका मिस यूज न करें यही हम सब के लिए और आने वाली अगली पीढ़ियों के भविष्य के लिए अच्छा होगा ।

      

Writer 
  Karan "GirijaNandan"
 With  

                              




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