मुंबई सपनो का शहर जहाँ कभी रात नही होती रोली छोटी सी उम्र मे न जाने कितने सपनो को अपनी आखो मे सजोए रोज जिन्दगी के नये नगमे बुन रही थी । रोली अपने पिता रमेश की एकलौती लाडली बेटी है । वो अपने पिता से जो भी इच्छा जताती शाम होते-होते पूरी हो जाती और क्यू न हो रमेश उसे अपनी जान से भी ज्यादा मानते थे । उधर अक्सर बिमार रहती रोली की माँ मीना उसकी बढती उम्र मे कम होने की बजाए उसकी बढती चंचलता सेे कभी नाराज और थोड़ी डरी भी रहती थी, रोली पर कहा मानने वाली मे से थी, उसका बचपन तो आज भी बरकरार था ।  जया जो मीना के घर के ठीक सामने वाले घर मे रहती थी, रोली की नादानियो के वजह से उसे बहुत मानती, शायद अपनी बेटी को वो रोली मे देखा करती थी, रोली का सबसे बेस्ट फ्रेंड जो रोली से उम्र मे काफी  बड़ा था,जया का बेटा मनोज था, रोली उससे अपनी सारी बाते शेयर करती यहा तक की मैट्रिक मे पढ़ने वाली रोली ग्रैजुएशन कर रहे ।

मनोज के साथ उसके कालेज भी जाया करती कालेज मे मनोज के सभी दोस्त रोली को बहुत मानते रोली भी वहाँ खूब मस्ती करती मैट्रिक मे ही कालेज के दिनो का आनंद वो मनोज की वजह से लेने लगी थी, रोली अपने स्कूल मे जाना कम पर उसके कालेज मे जाने के लिए ज्यादा उत्सुक रहती थी, रमेश भी ये बात जानते थे, पर रोली की खुशी मे वो भी खुश थे, जया को शोरगुल पसंद नही था, विवेक का एक दोस्त विकास जो जया के बगल मे रहता था ।


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  अक्सर तेज गाने बजाया करता था, रोली,विवेक, मनोज कुछ  मुहल्ले के साथी गोवा घूमने गए थे, जया विकास के घर से आ रही जोर-जोर की आवाजो से परेशान हो गई । उसने कई बार विकास से जाके आवाज धीमी करने को कहा पर विकास कहा मानने वाला वो और उसके कुछ दोस्त छुट्टिया इन्जॉय कर रहे थे, फिर क्या वही हुआ जिसका डर था, जया और विकास मे बहस छीड़ गई मनोज के पिता भी वहाँ जा पहुंचे सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया । तब तक विकास ने जया को कुछ अपशब्द कह डाला । मनोज के पिता बर्दास्त नही कर सके, और विकास को एक थप्पड़ जड़ दिया। इतने मे ही विकास और उसके दोस्त मनोज के पिता पर टूट पड़े। जया एक तरफ अपने पति को बचाती और दूसरी तरफ जोर-जोर से मीना और रमेश को बुलाती पर उनका दरवाजा नही खुला। मनोज के पिता और जया दोनो को बहुत चोटे आई।

  शाम को मीना बरामदे मे रमेश से हंस-हंस के बाते कर रही थी, जया को रहा नही गया वो तुरन्त मीना के पास पहुंच कर उसे बहुत खरी-खोटी सुनाई पर सच तो यह था कि झगड़े के समय संयोगवश रमेश और मीना गहरी नींद मे सो रहे थे, अन्यथा वो मदद के लिए आए होते। जया की सुनते-सुनते मीना भी भड़क उठी क्योंकि उसकी कोई गलती नही थी, रमेश को भी जया का बर्ताव अच्छा नही लगा और एक गलतफहमी से  सालो के रिश्ते टूट गए। मीना और जया के इस मनमुटाव से दोनो परिवारो की दोस्ती पर गहरा असर पड़ा।

  दोनो परिवारो का मिलना-जुलना तो दूर एक-दूसरे को देखना भी गवारा न था, पर नादान रोली उसको इन सब बातो की कोई परवाह नही थी, बिमारी का बहाना बनाकर वो एक दिन स्कूल नही गई और बाहर कमरे की खिड़की से मनोज के घर पर नजरे टिकाए बैठी थी, मनोज जब अपने कालेज के लिए निकला तो पीछे-पीछे रोली भी चल दी कुछ दूर जाने के बाद रोली ने मनोज को आवाज लगाई । मनोज ने पीछे मुड़कर देखा रोली पीछे खड़ी अपनी मासूम मुस्कान बिखरे रही थी, मनोज  ठहर गया, रोली ने मनोज से कहा "आज मै भी तुम्हारे साथ कालेज चलूंगी। हम ढेर सारी मस्ती करेंगे" मनोज ने दोनो परिवारो के बीच जन्मे दुश्मनी की ओर रोली को इशारा किया पर रोली ने उसकी एक न सुनी, फिर क्या था मनोज और रोली कालेज की तरफ चल दिए।

  जब मीना ने रोली को बहुत देर तक नही पाया तो उसने अपने बेटे विवेक से पूछा पर उसे भी रोली के बारे मे कुछ पता नही था, विवेक रोली को दिनभर ढूंढता रहा पर वो नही मिली अचानक घर से कुछ दूर बाजार मे रोली मनोज के साथ गोलगप्पे खाती दिखी बड़े भाई विवेक को ये सब देखकर बड़ा गुस्सा आया,फिर क्या था भरे बाजार मे विवेक ने रोली को जोरदार थप्पड़ लगाया जिसे देखकर मनोज ही नही आसपास के सभी लोग सहम गए । विवेक का गुस्सा उसकी लाल हुई आंखो मे साफ झलक रहा था, रोली कुछ पूछती उससे पहले विवेक रोली का हाथ पकड़े उल्टे पैर घर की तरफ चल दिया। मनोज ने इशारो-इशारो मे विवेक शायद रोकना चाहा पर विवेक की आंखो मे नई नफरत को देख उसने विवेक से कुछ नही कहना ही सही समझा। कुछ दूर तक मनोज,रोली,विवेक के पीछे-पीछे चलता रहा फिर वो रूक गया। विवेक ने रोली को घर लाकर सारी बाते बताई माँ से  बात नई थी, ऐसा नही था पर अब रिश्ते नए थे, मीना और जया के नफरत का रिश्ता दोनो परिवार पर पड़ना लाजिमी था ।

  रमेश ने रोली को जया और उसके  परिवार  से मिलने से मना कर दिया। रमेश ने पहली बार रोली को किसी बात के लिए रोका था, रोली ने पिता के कहे को नजरअंदाज नही किया चार महीने बीत गए रोली अपने बेस्ट फ्रेंड मनोज को देखती तो थी, पर बातचीत  बन्द थी, इस दूरी ने शायद छोटी सी रोली को मनोज को उसकी जिंदगी मे एहमियत को समझा दिया था, रोली और मनोज को एक-दूसरे से मिलने के लिए बेचैन हो उठे।

  चार महीने की दूरी ने दोस्ती को शायद प्यार मे बदल दिया था, आखिरकार वो दिन आ ही गया जब दोनो का एक-दूसरे से मिलने का सपना हकीकत मे बदला। नए वर्ष का शुभारंभ हो रहा था,रोली भी अपने दोस्तो के साथ घूमने गई थी, इत्तफाक से मनोज रोली को वहाँ मिल गया । फिर क्या था रोली मनोज को लेकर वहाँ से चली गई। रोली मनोज के सीने से लग कर बस रोती रही मनोज की आंखो से भी अश्को की धारा बह निकली शायद ये अश्क नही इजहार-ए-मुहब्बत थी नया साल दोनो की जिन्दगी मे नई सुबह लेकर आया था, रोली अपने प्यार को पाके बहुत खुश थी, उधर मनोज भी पूरी रात रोली को याद करता रहा।

   अगली सुबह रोली की नजरे मनोज के घर पर टिक गई रोली तो बस मनोज को एक नजर देखना चाहती थी, पर सुबह के दस बज गये मनोज बाहर निकलने का नाम ही नही लिया,शायद मनोज के कदम दोनो परिवारो के बीच चल रही नफरत को देखते हुए पीछे ठिठक गए। ये क्या एक पल मे जगी आस अगले ही पल बूझ गई। मासूम रोली बहुत दुखी हुई माँ के कहने पर भी उसने कुछ नही खाया। इधर मनोज रोली की यादो मे खोये-खोये रात भर जगे रहने की वजह से सुबह देर तक सोया रहा माँ के बहुत जगाने पर उठा, उठते ही मनोज तेजी से बाहर निकला पर तब तक रोली पीछे अपने कमरे मे जा चुकी थी, मनोज बिना कुछ खाये पिये रोली की राह देखता रहा, शाम होने को आयी के तभी मायूस रोली किसी की आवाज सुनकर बाहर आयी बाहर आते ही रोली की खुशी का ठिकाना न रहा ।

----- क्योंकि सामने रोली का प्यार अपने दरवाजे पर खड़ा,एक टक रोली को देखे जा रहा था, एक-दूसरे को देख दोनो के दोनो खुशी से झूम उठे।

 आंखो आंखो मे बाते शुरू हो गई। ठंड का मौसम घूप सेंकने के बहाने बाहर अपने-अपने बरामदे मे ही दोनो पूरा दिन गुजार देते आंखो ही आंखो मे, इशारो ही इशारो मे न जाने कितनी बाते करते रहते। मगर न जाने क्यो इतनी जल्दी रहती थी, उस सूरज को डूब जाने की, पर फिर भी जब तक मीना आवाज न लगाती रोली के पैर वही थमे रहते। दोनो के प्यार मे रूकावट फिर भी नही आती क्योंकि फिर देर रात तक चैटिंग चलती रहती। घरवालो से छुप-छुप के दोनो ने मिलना-जुलना भी शुरू कर दिया। साथ घूमना, गोलगप्पे खाना,यहा तक की सिनेमा देखना भी।

  तभी एक दिन मनोज ने जो कहा रोली के तो पाँव से जमीन ही खसक गई। माँ जया ने मनोज की शादी तय कर दी।

  मनोज के लाख समझाने पर भी रोली ने रोना नही बन्द किया। आखिरकार मनोज ने रोली से वादा किया कि वो शादी करेंगा तो अपनी रोली से मनोज और रोली ने अपने परिवार वालो को सब कुछ बताने का निश्चय किया। परन्तु हुआ वही जिसका डर था ।

  बीमार माँ मीना ने रोली का घर से निकलना तो दूर बाहर बरामदे मे भी निकलना बन्द कर दिया। उधर मनोज की माँ ने उसे बहुत फटकार लगाई पर मनोज अपनी जिद पर अड़ा रहा ।

  अब तो रोली से मुलाकात का हर जरिया बन्द हो चुका था, रोली का फोन भी उससे छीन लिया गया। रमेश जो अपनी बेटी रोली को बहुत नाजुक समझते थे, आज उससे कठोर व्यवहार करने से नही चूकते। धीरे-धीरे समय बीतता गया।

   एक दिन जिस मौके का इन्तजार था, वो मिल ही गया। विवेक अपना फोन घर पर ही भूल बाहर दोस्तो के साथ निकल गया था, रोली ने मनोज को फोन किया और दोनो घण्टो फोन पर लगे रहे।  सोमवार की सुबह विवेक रोली को परिक्षा दिलाने स्कूल छोड़ आया। वापस जब रोली को लेने आया तो रोली वहा नही थी, रोली तय स्थान पर मनोज का इन्तजार कर रही थी, दोनो शादी करने वाले थे, पर शाम होने को आयी मनोज का कुछ अता-पता नही चल रहा था ।

  रोली के पास फोन भी नही था, कि वो मनोज से पूछ सके कि वो अपने वादे से क्यो मुकर गया। आखिर अब रोली भी घर वापस नही जा सकती थी, क्योंकि वो घर वालो के नाम मनोज के साथ शादी करने का खत छोड़ आई थी, मैट्रिक मे पढ़ने वाली रोली इतनी छोटी उम्र मे इतना बड़ा फैसला ले तो ली पर जो परिस्थिति बन रही थी, उसके आगे उसकी समझ काम नही कर रही थी, वो सोच नही पा रही थी, कि आगे क्या करे उसने अन्त तक हिम्मत नही हारी। पर जब अन्धेरा होने लगा। तो रोली की हिम्मत जवाब देने लगी। उसके चेहरे के आगे कभी मनोज,कभी मीना, तो कभी अपने पिता का चेहरा घूम रहा था, जो सोचा था, वैसा कुछ भी नही हुआ। रोली को जब कुछ भी नही सूझा। तो उसने वो किया जिसे सोच कर भी रूह कांप जाए।

  रोली ने तेज से आ रही कार के आगे कूद गई।
 
  उधर रोली के न मिलने पर रमेश और मीना अपनी जान से प्यारी रोली की फिक्र मे पागल हुए जा रहे थे, रोली का चेहरा हर वक्त उनके समाने था, जाने किस मुसीबत मे होगी वो ये सोच-सोच के वो और पागलो की तरह उसे ढूंढे जा रहे थे, जिसे ढूंढ रहे थे, पता नही वो जिन्दा थी या नही।

  बस स्टेशन,रेलवे स्टेशन,दोस्तो के घरो जहा भी रोली के होने की उम्मीद लगती वहा जाते।

  उधर रोली के गुम होने पर विवेक के दोस्तो ने भी खूब साथ दिया। चूकी मनोज सबसे अधिक शक के घेरे मे था, इसलिए सबसे पहले उन्होंने मनोज को पकड़ा, उसकी बहुत पिटाई की, कुछ न बताने के कारण उसे पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने अपनी तरीके से पूछताछ तो की पर मनोज के कुछ न बताने के कारण अगली सुबह मजबूरन उन्हे मनोज को छोड़ना पड़ा।
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  स्टेशन से छूटने के बाद मनोज सीधे भाग कर वहां गया जहाँ रोली से उसने मिलने को बोला था, पर वहा जाने के बाद रोली वहा नही थी, बस सड़क पर खून के धब्बे जो तेजी से चलती गाड़ियो के टायरो से रगड़ कर हल्के होते जा रहे थे, मनोज घुटनो के बल बैठ गया। शायद वक़्त ने ऐसा खेल खेला था, जिसका मनोज ने कभी सोचा भी न था, काफी देर तक मनोज वही बैठा रहा चेहरे पर उसके एक खामोशी थी, शाम को जब वह घर आया तो रोली की माँ मीना उसके पास आई और उससे हाथ जोड़कर उसने रोली के बारे मे पूछती रही। रमेश का गुस्सा भी अब आंसूओ मे तब्दील हो गया था, और चेहरे पर खामोशी थी, वो कुछ बताता इससे पहले जया उसे खींच कर ले गयी जाते-जाते जया ने मनोज की इस हालत के लिए मीना को खूब बूरा-भला कहा।

  पुलिस के पास जमा मनोज के डाइविंग लाइसेंस, उसकी मोबाइल उसके पिता उसको लाकर दिए। पर मनोज की तो दुनिया ही लुट चूंकि थी, किसी को बताए भी तो क्या बताए। उसने फोन देखा तो वह डिस्चार्ज हो गया था, उसने फोन को चार्ज मे लगा कर बाहर बरामदे मे बस अपनी रोली को तकता रहा कि जाने कब रोली वहा दौड़ के आ जाए आधी-रात हो गई थी, तभी फोन बजा उसने फोन उठाया तो फोन किसी और का नही बल्कि उसके दोस्त सन्दीप का था, उसने बताया कि वह बहुत बार फोन मिला रहा था पर उसका फोन स्विच आफॅ बता रहा है, उसने बताया कि रोली उसके पास है, और पूरी तरह से ठीक है, सन्दीप सबसे करीबी दोस्त था मनोज का।

   उसे मनोज व रोली के स्कूल से निकालने और शादी करने तक की एक-एक बात पता थी ।

  जब विवेक और उसके दोस्तो ने मनोज को पुलिस के हवाले कर दिया था तभी उसने मनोज को छुड़ाने का बहुत प्रयास किया। बात न बनती देख और दिन ढलता देख वो तेजी से वहा भागा जहा रोली मनोज का इन्तजार कर रही थी, और रोली किसी ओर कि नही बल्कि सन्दीप के गाड़ी के आगे कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की। सन्दीप ने गाड़ी को रोकने की बहुत कोशिश की। पर फिर भी रोली को कुछ चोटे जरूर लगी।

  सन्दीप हालात को देखते हुए रोली को अस्पताल न ले जाकर सीधे अपने घर लाया। पेशे से डॉक्टर सन्दीप की माँ ने एक डॉक्टर के रूप मे रोली को उसके खराब हालात से उसे बाहर निकाला और बस इतना ही नही उसकी जान बचाई।

  मनोज को ये सब सुन कर खुशी का ठिकाना न रहा।  अगली सुबह रोली लाल जोड़े मे अपने प्यार जो अब उसका जीवन साथी बन चुका था, मनोज को लेकर घर पहुंची। कई दिनो से अपनी प्यारी बेटी के फिक्र मे व्याकुल रमेश, मीना जो कई रातो से सोये नही थे, भूख-प्यासे रोली के तलाश मे लगे थे, उनके सामने ये नजारा देखने लायक था, शायद रोली इस रूप मे उन्हे मिलेगी इसकी कल्पना भी नही की थी, रमेश को कुछ समझ नही आ रहा था कि वह क्या कहे या क्या नही। धीरे-धीरे मुहल्ले वाले आ गए। जिन आंखो मे रोली के लिए निरंतर आंसू बह रहे थे, अचानक उसमे एक अजीब सी नफरत और गुस्से की आग धधक उठी।

  रोली ने जैसे ही अन्दर आने का प्रयास किया मीना ने दरवाजा बन्द कर दिया। रमेश तो बिल्कुल खामोश थे, ये सब देख रोली खुद को रोक न सकी। उसने अपनी माँ को अपनी बात समझाने का बहुत  प्रयास किया, मगर कुछ ही देर मे मीना,रमेश के साथ घर मे चली गई। शायद रोली मनोज के नए रिश्ते के आगाज के साथ ही माँ-बेटी के रिस्ते का अन्त हो चुका था, मनोज का परिवार भी अपने बेटे के कृत से हतप्रभ था, परंतु मनोज के पिता इस नाजुक हालात को शायद समझ रहे थे, उन्होंने बेटे-बहू को साथ चलने को कहा।

  मगर तभी जया ने रोली को अपने घर आने से मना कर दिया। मीना से उसकी नफरत को वो भुला न सकी थी, कोई आशियाना न देखे मनोज रोली का हाथ थामे वहा से चल दिया। कहाँ ये शायद उसको भी नही पता। इकलौते बेटे को खोने की जया कल्पना भी नही कर सकती थी, मजबूरन वो रोली को साथ रखने को तैयार हो गई। बड़ा ही अजीब नजारा था ।

  मायका और ससुराल आमने-सामने, कई बार रोली अपने पिता और माँ को अपने समाने देखती पर जैसे ही वह कुछ कहना चाहती वो मुँह फेर लेते यहाँ तक कि मीना उसे देखकर तो अपना दरवाजा ही बन्द कर लेती। मुहल्ले वालों को तो चर्चा करने के लिए इससे मसालेदार मुददा तो और कोई दिखता ही नही था, कई महीने गुजर गए पर दोनो घरो के सम्बन्ध जस के तस थे ।

   रक्षाबंधनका त्यौहार आया बड़ी हिम्मत करके रोली मनोज के साथ बड़े भाई विवेक को राखी बांधने अपने मायके पहुंची। उसे देखते ही मीना का गुस्सा सातवे आसमान पर जा पहुंचा उसने रोली के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा। और उसे घर से बाहर कर दिया। जब ये सब हो रहा था, उस समय रोली अपने पिता की आंखो मे देखती रही,मानो वो अपने पिता से सब कुछ भूल के वापस उनके दिल मे वही जगह मांग रही थी, जहां शायद अब वो नही थी, क्षुब्ध रमेश अपनी नौकरी छोड़ परिवार के साथ अपने गांव चले आए। वो रोली को भूल तो नही पाए। पर शायद कुछ सुकून जरूर मिल गया। दो साल गुजर गए। मगर रोली को रमेश और मीना ने माफ नही किया। तभी एक दिन आया जिसे रमेश और मीना ही नही रोली भी शायद कभी न भूल पाए।

  कालेज से लौटते वक्त विवेक का एक्सिडेंट हो गया, उसकी मृत्यु हो गई। रमेश और मीना की दो ही सन्तान थी, एक को खुदी खुद से दूर कर दिया और दूसरे को खुदा ने, दोनो पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा। विवेक की मौत की खबर गांव के ही एक व्यक्ति ने रोली को दी। आज रोली को उतना दुख हुआ शायद जितना अपनी शादी के बाद उस घर से निकाले जाने पर नही था,  वो जोर से चिल्लाते हुए बाहर की तरफ दौड़ी मनोज और उसके पिता भी पीछे-पीछे दौड़े।

  मनोज ने जब रोली से बात जानी। तो वह भी तुरन्त उसके साथ निकल पड़ा। रोली इतना बदहवास हो गई थी, कि वो नगे पावं ही गांव को चली गई। रास्ते भर वो बस रोती रही। घर पहुंचते ही रोली सामने  पड़ी विवेक के शव से लिपट कर फफक-फफक कर रोने लगी। उसकी यह दशा देखकर हर कोई भावुक हो बैठा, तभी उसने अपनी बदहवास बैठी माँ को देखा वो जैसे ही उसकी तरफ बढी।
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  रमेश ने उसे रोक दिया और उसे चले जाने को कहा,गांव के सभी लोगो ने रोली को माफ करने को कहा पर शायद रमेश मुम्बई के साथ रोली को भी सदा के लिए अलविदा  कर आए थे।

"कसूर" क्या था,रोली का"


   Writer
  Karan "GirijaNandan"
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