16 July, 2018

आत्मविश्वास कैसे बढ़ायें | How To Build Self Confidence Story In Hindi

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आत्मविश्वास या मनोबल क्या है आत्मविश्वास की कमी को दूर कैसे करे, आत्मविश्वास का महत्व, आत्मविश्वास बढाने के उपाय या मूलमंत्र


आत्मविश्वास क्या है, आत्मविश्वास की कमी को दूर कैसे करे, महत्व - कहानी



  आसमान को छूते बांस के दो ऊंचे-ऊंचे खंभो के बीच बधी रस्सी पर नन्ही सी परी के कदम बिना किसी डर के एक छोर से दूसरे छोर की ओर ऐसे दौड़ लगा रहे हैं जैसे वह रस्सी न होकर लंबा चौड़ा कोई पुल हो । नीचे लोगों की भारी भीड़ जमा है । सब रोंगटे खड़े कर देने वाले नन्ही सी परी के इस करतब को देख काफी आश्चर्यचकित है । तालियों की गड़गड़ाहट से आसमान गूंज उठा है । परी की माँ और उसका बड़ा भाई दर्शकों द्वारा लूटाए जा रहे पैसों को बटोरने में लगे हैं ।
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  सुबह से शाम हो जाती है मगर परी के करतब दिखाने का खेल अभी बंद नहीं होता है वह तबतक जारी रहता है, जबतक लोगों के वहां आने-जाने, तालियां बजाने और पैसे लुटाने का सिलसिला जारी रहता है । परी के माता पिता अब बुजुर्गों हो चले हैं । ऐसे में अपने से दो साल बड़े भाई के बाद अब वही इस घर का सहारा है, उनकी कमाई का वही एकमात्र जरिया है । नन्ही सी परी इतनी छोटी सी उम्र में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझती है इसीलिए उसे जब भी मौका मिलता है वह पिता से नए-नए करतब सीखने की कोशिश करती है ।

  उसका मन जोखिम भरे चीजों को सीखने और फिर उसे लोगो के सामने कर के दिखाने में ज्यादा लगता है । वह  अपने पिता से जोखिम भरे करतब को सिखाने के लिए बार-बार कहती है  परंतु इसका मतलब ये बिल्कुल नही कि परी कोई शैतान बच्ची है । असल में वह कई सालों से गांव और शहर के चौराहों पर छोटे-मोटे सर्कस दिखाकर अब तक ये समझ चुकी है कि उसका काम जितना जोखिमभरा होगा लोगों को उतना ही ज्यादा मज़ा आएगा और ऐसे में ज्यादा से ज्यादा लोग उसे देखने आएंगे । जिससे उनकी आमदनी भी ज्यादा होगी ।

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  ऐसे में वह जोखिम भरे करतब को सीखने की लगातार कोशिश करती रहती है । वह जानबूझकर बास के ऐसे ऊंचे-ऊंचे खम्भो पर करतब दिखाती जिसेपर उसे थिरकता देख अच्छे-अच्छों की सांसे अटक जाए । ऐसा नहीं है कि नन्ही सी परी को डर नहीं लगता मगर  

  ये रोटी न जाने क्या-क्या करवाती है । 
  
  बहन के ऐसे हिम्मत भरे करतब को देखकर परी का भाई जो उससे लगभग दो साल बड़ा है वह भी उसी के जैसा बनना चाहता है और उसके जैसा ही जोखिम भरा करतब सीखना चाहता है ।  जिससे वह भी अपने माता-पिता की थोड़ी मदद कर सके । 
  
  मगर वह जब भी ऐसा करने के लिए रस्सियो पर चढ़ता है तो फौरन ही उसके पैर ऐसे कांपने लगते हैं मानो उसे कोई बिजली मार गई हो और फिर थोड़ी ही देर में पसीना-पसीना होकर एक कदम भी रस्सी पर चले बगैर वह धड़ाम से नीचे गिर जाता है । उसे यह काम सीखते हुए लगभग तीन या चार साल हो गए । मगर आज तक उसने रस्सी पर एक कदम भी चलना नहीं सीखा ।  हालांकि इस बात का बहुत ही दुख भी था ।  
  
  वह जब भी परी को हजारों की भीड़ में ऊंचे-ऊंचे बांस के खंभों पर बधी रस्सी पर चलते देखता है । तब उसका मन उसे बहुत धिक्कारता है क्योंकि उससे दो साल छोटी परी जो काम बड़ी आसानी से कर रही है । उसी काम को उसे करने में आज तक सफलता नहीं मिली । दर्शकों के तालियों की गड़गड़ाहट जहां उसके परी का हौसला बढ़ाती, वही उन तालियों की गड़गड़ाहट सुनकर उसके भाई को ऐसा लगता मानो उसके कान के परदे अभी के अभी फट ही जाएंगे । कभी-कभी तो वह इन सब बातों से इतना परेशान हो जाता कि पैसों को बटोरना छोड़ वहां से कहीं दूर चला जाता है ।

  एक दिन ऐसे ही परी जब सबको सर्कस दिखा रही थी तब परी का भाई, दर्शको से परी की वाहवाही को सुनकर पैसों को  बटोरना छोड़ मुंह गिराए वहां से कहीं चल पड़ा । यह सारा वाक्य जब हो रहा था तब उसके पिता उसे काफी गौर से देख रहे थे । सर्कस खत्म हो जाने के बाद पिता को जब फुर्सत मिली तब वे अपने बेटे को इधर-उधर ढूंढने लगे । तभी उन्होंने देखा कि पास ही उनका लाल दोनों पैरों में अपना सर गाड़े चुपचाप एक चबूतरे पर बैठा है ।  
  
  पिता को उसकी हालत देखकर उसपर बहुत तरस आया हालांकि शायद वह उसकी मन की स्थिति को काफी दिनों से समझ रहे थे । ऐसे में वह तुरंत अपने बेटे के पास जाकर चुपचाप वहीं बैठ गए बेटा पिता को पास देख कर भी कुछ नहीं कहा पिता भी उससे कुछ कहने की बजाय काफी देर तक वहीं चुप-चाप बैठे रहे ।

  धीरे-धीरे अंधेरा होने को था । मगर दोनों में कोई बात नहीं हो रही थी । बेटे को कुछ न कहता देख पिता ने ही आखिरकार खुद ही बातचीत की शुरुआत की और कहा
"क्या हुआ ? तुम वहां सर्कस छोड़ यहां क्यों चले आए ? क्या तुम्हें किसी ने कुछ कहा क्या और तुम यहां गुमसुम-गुमसुम क्यों बैठे हो ? क्या बात है मुझे बताओ"
कुछ न कहते हुए बस सर हिलाकर, "ऐसी कोई बात नही ही" ऐसा बेटे ने पिता से कहा 
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  मगर पिताजी तो बेटे के मन में चल रहे उथल-पुथल   को भली-भांति समझ रहे थे ।

  ऐसे में पिता ने उससे इस हाल का कारण जानने का बार-बार प्रयास किया । पिता के बार बार फोर्स करने पर आखिरकार बेटे ने बताया 

  "पिताजी में परी से दो साल बड़ा हूँ । जब वह जमीन पर भी ठीक से नहीं चल पाती थी मैं तब से बांस से बधी रस्सी के ऊपर चलने का प्रयास करता आया हूँ । मगर मैं आज तक उन राशियों पर नहीं चल सका । वही मेरी छोटी बहन बांस के आसमान छूती खंभों पर बधी रस्सी पर ऐसे दौड़ लगाती है जैसे उसके पैर राशियों पर चिपक से गए हो । परी के इस शानदार सफलता को देखकर मुझे उससे तनिक भी ईर्ष्या नहीं होती बल्कि मैं तो यह सोचता हूँ कि काश मैं भी उसकी तरह बन पाता तो परिवार का खर्च और अच्छे से चल पाता । वह मुझसे छोटी हो कर भी जो काम कर रही है वह मैं शायद कभी न कर पाऊं यह वाकई शर्म से डूब मरने वाली बात है । जब लोग परी के अच्छे काम को देखकर तालियां बजाते हैं तब मुझे अपने अंदर बहुत हीनता महसूस होती है । मेरा मन खुद को बहुत धिक्कारता है । ऐसे में मुझे वहां एक पल भी रुकना ठीक नहीं लगता इसीलिए मैं आज वहां से उठकर यहां चला आया"
  
  बेटा फिर कहता है 

  "पिताजी मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि जो काम परी बहुत ही आसानी से कर लेती है उसी काम को मैं क्यों नहीं कर पाता आख़िर परी में ऐसा क्या है जो मुझ में नहीं है । वह जो काम कर सकती है उसे मैं क्यों नहीं कर सकता" 
  
  पिता बेटे की बातों को सुनकर थोड़ा मुस्कुराते हैं और फिर बेटे से कहते हैं 

  "कुछ नहीं तुम में और परी में कोई अंतर नहीं है तुम दोनों एक ही मां-बाप की संतान हो तुम दोनों की रगों में हमारा ही खून दौड़ रहा है । तुम दोनों की परवरिश भी हमने एक जैसी ही की है । ऐसे में तुम्हारे और परी में किसी प्रकार का कोई अंतर होना संभव ही नहीं है । अगर कोई फर्क है तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे और उसके सोचने के तरीके में क्योंकि तुम जब भी रस्सी पर चलने का प्रयास करते हो तो तुम्हारे अंदर हमेशा यह भय बना रहता है कि रस्सी अगर थोड़ा भी डगमगाई तो फिर नीचे गिरने से तुम खुद को बचा नहीं पाओगे और सीधा नीचे जा गिरोगे और फिर तुम्हारा क्या होगा । वही जब परी रस्सी पर चलती है तो उसे रस्सी पर नहीं बल्कि अपने पैरों पर भरोसा होता है उसे भरोसा होता है की रस्सी चाहे लाख डगमगाए अगर उसके पैर रस्सी से फिसलते भी हैं तो वह अपने पैरों के भरोसे सही सलामत जमीन पर कूद जाएगी । जहां उसका यह भरोसा उसे रस्सी पर चलने में सफलता दिलाता है । वही ऐसे विश्वास की कमी तुम्हारे अंदर भय पैदा कर देती है । घबराहट में तुम्हारे पैर  जोर-जोर से कांपने लगते है । तुम इतने घबरा जाते हो कि खुद ही अपना संतुलन बिगाड़ बैठते हो और रस्सी के डगमगाए बगैर ही तुम खुद-ब-खुद  फिसल नीचे गिर जाते हो"


  पिता की बातों को सुनकर उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ । वह समझ गया अपनी असफलता की वजह को समझ चुका था अपनी गलतियों को जान लेने के बाद बेटे को अपनी सफलता की राह दिखने लगी थी । वह पिता की अंगुलियां पकड़े खुशी-खुशी उनके साथ घर वापस लौट आया । 
  
  अगले दिन से बेटे ने भी अपने पैरों पर भरोसा रखते हुए रस्सी पर चलने का प्रयास शुरु किया और देखते ही देखते परी की तरह वह भी आसमान छूते खंभों पर बधी रस्सी पर दौड़ने लगा ।

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कहानी से शिक्षा | Moral Of This Best Inspirational Story In Hindi 


 success, सफलता की राहों पर भरोसा करके नहीं बल्कि खुद पर भरोसा करके प्राप्त की जाती है !


Success पाने के लिए सफलता की राहों पर भरोसा करने से ज्यादा जरूरी खुद पर भरोसा करना । सफलता की राह चाहे कितनी भी कठिन क्यू न हो उन पर चलकर सफलता हासिल की जा सकती है । मगर यह तभी हो सकेगा जब हमें खुद की क्षमताओं पर Belive हो खुद पर किया गया अटूट विश्वास मुश्किल से मुश्किल राहों को भी आसान कर देता है और  Success हमारे कदमों में होती है ।

  मगर जब हम सिर्फ राहों को ही निहारते रहते हैं और उन पर चलने के लिए पर्याप्त साहस नहीं जुटा पाते, खुद पर भरोसा नहीं दिखा पाते तब वही राहें हमें काफी Difficult  नजर आने लगती हैं और  जिस पर चलना तो दूर उसकी तरफ देखने पर भी हमें भय लगने लगता है ।

  इस Hindi Story में हमने देखा कि किस प्रकार परी जो अपने भाई से काफी छोटी है वह ऐसे करतब दिखा रही है जो अच्छो-अच्छों के रोंगटे खड़े कर दें यह सब वह इसलिए कर पाना रही थी क्योंकि उसे अपने कदमों पर पूरा भरोसा था यह भरोसा कितना सच्चा था और कितना झूठा यह नहीं पता लेकिन उसका यह भरोसा ही उसे सफलता दिलाए जा रहा था ।

  वहीं उसके भाई का खुद के ऊपर भरोसे की कमी उसे उन्हीं रस्सियों पर एक कदम भी चलने से रोक दे रहा था । मगर जब उसने खुद पर भरोसा दिखाया तो वही रस्सियां जिनकी तरफ देखकर भी उसके पैर कांप उठते थे वह अब उसे एक चौड़े पुल के समान नजर आने लगी थी । जिस पर चलना उसके लिए अब बेहद आसान था ।

दोस्तों बड़ी Success की राहें अक्सर काफी Difficult  होती है । उन पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं होती और जोखिम भी इतना होता है कि जिसे सोच कर भी रूह कांप उठे। कुछ लोग बार-बार बस योजनाएं बनाते रहते हैं । मगर जब भी उस पर चलने का प्रयास करते हैं तो आधे रास्ते से ही वापस लौट आते हैं और कुछ प्रयासों के बाद वे धीरे-धीरे ये मान लेते हैं कि इन राहों पर चलना उनके बस की बात नहीं । Success तो चाहिए । मगर उसके लिए खुद पर किया जाने  वाला जरूरी भरोसा वे नही जुटा पाते ।

  दोस्तों Success अगर पाना है तो उसके लिए खुद पर ज्यादा से ज्यादा भरोसा और पर्याप्त Risk उठाना होगा क्योंकि मात्र यही एक रास्ता है जिससे कठिन से कठिन रास्तों को भी तय किया जा सकता हैं वरना अविश्वास के साथ किसी भी डगर पर चल पाना Difficult ही नहीं Impossible साबित होगा ।

     
Writer 
  Karan "GirijaNandan"
 With  

                             

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