01 July, 2018

आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है प्रेरक कहानी | Hindi Story On Laziness

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"आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है" प्रेरणादायक हिंदी स्टोरी | inspirational hindi story on laziness with moral


आलस्य आया सफलता भागी प्रेरणादायक कहानी | Laziness On Story In Hindi



  बहुत समय पहले की बात है ।  एक राजा के तीन पुत्र थे । काफी समय तक सत्ता संभालने के बाद अब राजा समय रहते अपने राज्य की कमान किसी योग्य के हाथ में देकर जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते थे । वैसे तो इसके लिए वे अपने तीनों पुत्रों में से सबसे बड़े पुत्र को  उत्तराधिकारी घोषित कर सकते थे परंतु वे ऐसा करके वे अपने तीनों पुत्रों में किसी प्रकार का कोई कलह पैदा नहीं करना चाहते थे ।

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  ऐसे में उन्होंने अपने तीनों पुत्रों में योग्यता के आधार पर राज्य के अगले उत्तराधिकारी का निर्णय करने की सोची । राजा का ये फैसला राजकुमार को ही नही वरन मंत्रीगणों को भी काफी पसंद आया क्योंकि योग्यता के आधार पर उत्तराधिकारी का चयन होने से, आगे भी राज्य का भविष्य उज्जवल रहने की पूरी उम्मीद थी । अब सवाल यह था कि राजा अपने तीनों पुत्रों में सबसे योग्य का चयन कैसे करें ।

  इसके लिए उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ काफी मंथन किया । एक दिन राजा ने अपनी तीनो बेटो को अपने पास बुलाया और कहां

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"मेरे अंदर अब पहले जैसी शक्ति और सामर्थ्य नहीं रहा । ऐसे में मैं वक्त रहते अपने अगले उत्तराधिकारी अर्थात राज्य के अगले शासक का चयन कर देना चाहता हूँ । जिससे आगे चलकर मेरे न रहने पर इस बात को लेकर तुम तीनों में किसी प्रकार का संघर्ष की स्थिति उत्पन्न न हो । राज्य की सत्ता मै उसके हाथ मे देना चाहूँगा जो राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ठीक समझ सके और उसे ठीक से निभा सके । उसमें वह योग्यता हो जिससे वह प्रजा की समस्याओं का ठीक ढंग से निवारण कर सके और उनकी रक्षा कर सकें । ऐसे में मैं तुम तीनों में सत्ता की कमान उसे देना चाहूंगा जो तुम तीनों में सबसे योग्य हो"

राजा की ऐसी बातों को सुनकर तीनो बहुत खुश हुए । राजा ने फिर कहा

 "मैं तुम तीनों के मध्य कुछ प्रतियोगिताए रखूंगा । जिसमें जो खुद को सबसे बेहतर साबित करेगा उसी को मैं अपना उत्तराधिकारी बनाऊंगा "

राजा ने इस प्रतियोगिता के लिए अगला दिन निर्धारित किया । अगले दिन सुबह राजा ने अपने तीनों बच्चों को अपने पास बुलाया । जहां राजा ने अपने बड़े लड़के से एक काठ का उल्लू बनाने को कहा

  उसने दूसरे बेटे को मिट्टी का उल्लू बनाने को कहा वही उसने अपने सबसे छोटे बेटे को कागज पर एक खूबसूरत उल्लू बनाने को कहा

  काम देने के बाद राजा ने अपने तीनों बेटों से कहा मैं शाम को आकर तीनों का काम देखूगा जिसका काम सबसे अच्छा होगा मैं उसे राजा बनाऊंगा । पिता के जाने के बाद दोनों बड़े बेटे काम को अपने काम को पूरा करने के लिए तन मन से जुट गए । वहीं राजा का तीसरा बेटा जो थोड़ा आलसी था वह थोड़ी ही देर काम करने के बाद थकावट महसूस करने लगा ।

 मेरे उसने पास रखे पलंग पर लेटकर थोड़ा आराम करने की सोची। पलंग पर लेटते ही वह अपने राजा बनने के बाद अपने सुनहरे भविष्य और अपने ऐशो आराम की कल्पनाओ मे डूब गया । उसे लगने लगा कि अब तो उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होगी । उसे जिस चीज की इच्छा होगी वह वस्तु अगले ही पल उसके समक्ष प्रस्तुत हो जाएगी ।

  हालांकि  बीच-बीच में उसका मन ख्यालों से निकलकर काम की तरफ भी लौटता मगर जब भी वह काम की ओर देखता तो उसे आलस्य पूरी तरह घेर लेता उसे लगता कि

"ये काम काफी आसान  है ऐसे मे थोड़ा आराम करने से कुछ नही बिगड़ने वाला । वह उसे  कुछ ही समय की मेहनत में उसे पूरा कर लेगा"

देखते ही देखते सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम होने को थी  मगर उसके  ख्याली सपनों का न तो अंत हुआ और न उसने  काम को शुरु किया । लेकिन देर होता देख मन ही मन उसके अंदर  छटपटाहट सी होने लगी थी ।

"अब देर हो रही है उठो और काम शुरू करो" एक मन उससे बार-बार कहता कि मगर तबतक उसका आलसी मन उसके पैरों को जोर से जकड़ लेता और उसे लेटे रहने और ख्यालों में डूबे रहने के लिए मजबूर कर देता है ।

  तभी अचानक  पिता के आने की आहट ने उसके  शरीर में मानो  440 बोल्ट का  करंट पैदा कर दिया हो । वह पिता की आवाज को सुनते ही घबरा गया  क्योंकि उसने तो अभी तक तो काम शुरू भी नहीं किया था । ऐसे मे वह भागकर काम करना शुरू कर दिया । अभी उसने काम शुरू ही किया था कि तभी उसके पिता वहां आ धमके ।  पिता को  सामने पाकर वह और ज्यादा घबरा गया । वही बेटे के इस आधे अधूरे काम को देखकर राजा बहुत क्रोधित हुए क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से जिस तरह की काम की अपेक्षा की थी बेटे ने उसके बिल्कुल विपरीत काम किया था । ऐसे में पिता का क्रोधित होना स्वभाविक था । पिता के गुस्से को देखते हुए बेटे ने कहा कि

  "बस-बस हो गया है पिताजी"


  यह कहकर अपने काम में लग गया । मगर पिता जी ने उसे रोक दिया और कहा
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"समय अब खत्म हुआ तुम्हें जितना वक्त मुझे देना था मैं दे चुका हूँ अब बारी तुम्हारे किए काम को जानने की है । तुमने अपना कार्य बिल्कुल भी पूरा नहीं किया है मुझे लगता है कि तुम इस राज्य के राजा बनने के योग्य नहीं हो बल्कि इस राज्य का उत्तराधिकारी बनने के योग्य तुम्हारे दोनों बड़े भाई हैं । जिन्होंने अपना कार्य बड़ी ही सफाई से और समय रहते पूरा कर लिया है"
तब छोटे बेटे ने कहा

  "नहीं नहीं पिताजी ऐसा नहीं है असल में मेरा काम उन लोगों से थोड़ा कठिन था इसीलिए मैं अभी तक अपना काम पूरा नहीं कर सका हूँ । अगर मुझे भी वैसा ही काम मिला होता तो आप देखते हैं कि मेरा भी काम उनकी तरह समय से पूरा हो गया होता"


  पिता को बेटे की ऐसी बातों को सुनकर बहुत अजीब लगा । उसने कहा

 "अच्छा अगर ऐसा है तो ठीक है मैं तुम्हें एक आखरी मौका अवश्य दूंगा "

  अगले दिन राजा ने बड़े लड़के को बाग में गिरे समस्त पत्तों को इकट्ठा करने एवं उन्हे गिनकर टोकरी मे रखने को कहा, जाते-जाते उन्होंने बेहद कठोर शब्दों में उससे कहा कि

 "ध्यान रहे इस कार्य मे किसी प्रकार की कोई त्रुटि होने पर तुम इस प्रतियोगिता से सीधे बाहर हो जाओगे"
इसके बाद राजा ने अपने दूसरे पुत्र को एक महुए के बाग में बुलाया जहां ढेर सारे महुए, पेड़ो के नीचे बिखरे पड़े थे । राजा ने दूसरे पुत्र से सभी महुआ को उठाने और उन्हें ठीक से गिनकर टोकरी मे रखने को कहा जाते-जाते राजा ने उसे भी प्रतियोगिता को गम्भीरता से लेने और किसी भी प्रकार की गलती न करने के लिए सचेत किया ।

आखिर में राजा अपने तीसरे बेटे को कनैल के फूल वाले बाग में बुलाया और उससे नीचे जमीन पर गिरे हुए सारे फूलों को इकट्ठा करने एवं उन्हें ठीक से गिनकर टोकरी मे रखने को कहा

  इस प्रकार राजा अपने तीनों बच्चों को काम सौंप कर वहां से चले गए । शाम को वे अपने बेटों को दिए गए कार्यों मूल्यांकन करने के लिए निकले । राजा, पहले और दूसरे बेटे के काम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि दोनों ने ही कार्य को पूरी ईमानदारी और लगन के साथ करते हुए, समय रहते ही पूरा कर लिया था । ऐसे में अब बारी थी अपने तीसरे बेटे के किए को जानने की ।

  वैसे तो राजा को अपने दोनों बेटों की तरह ही अपने तीसरे बेटे की योग्यता एवं क्षमता पर पूरा भरोसा था । परंतु तीसरा बेटा पिता के जाने के बाद बागों के बीच लेटे हुए अपने राजा बनने के बाद अपने द्वारा किए जाने वाले राज्य मे अहम बदलाव का खाका खीचने और लंबे चौड़े एक्शन प्लान बनाने में लगा रहा और इसप्रकार आलसी बेटे ने फिर पूरा दिन बस अपने आराम तलबी और ख्याली पुलाव बनाने मे गवां दिया ।

  थोड़ी ही देर में उसे राजा की आवाज सुनाई दी ।  राजा की आवाज सुनते ही वह घबरा गया क्योंकि अभी तो काम शुरू भी नहीं हुआ था और इधर राजा के आने की आहट सुनाई देने लगी ।

  ऐसे में वह काफी तेजी से दोनों हाथों से बाग में गिरे फूलों को उठाकर टोकरीयो में भरने लगा । हड़बड़ाहट में वह किसी जानवर की तरह बाग में आधा लेटे-लेटे कर फूलों को टोकरियों में भरने लगा ।  अभी उसकी एक टोकरी भी पूरी नहीं भरी थी कि तभी राजा उसके सामने आ खड़े हुए । राजा को देखते ही पहले से ही पसीने में लतपत छोटा बेटा और घबरा गया और

  
  "बस-बस हो गया है पिताजी"


  यह कहकर अपने काम में लग गया । मगर पिता जी ने उसे रोक दिया और कहा

"तुम्हे हर बार और वक्त चाहिए मगर वो मैं नही दे सकता तुम एकबार फिर फेल हुए हो इसबार तुम क्या कहना चाहोगे"

तब छोटे बेटे ने अपनी वही पुरानी बात दोहराई ।
"नहीं नहीं पिताजी ऐसा नहीं है असल में मेरा काम उन लोगों से थोड़ा कठिन था इसीलिए मैं अभी तक अपना काम पूरा नहीं कर सका हूँ । अगर मुझे भी वैसा ही काम मिला होता तो आप देखते हैं कि मेरा भी काम उनकी तरह समय से पूरा हो गया होता"

पिता को बेटे की दुबारा वही बात सुनकर उन्हे पहले तो बहुत गुस्सा आया परन्तु एक राजा का दायित्व निभाते हुए उन्होंने उसे एक आखरी मौका देने की सोची ।
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  अगले दिन राजा ने अपने तीनों बेटों को अपने महल के पीछे बुलाया  महल के पीछे एक बहुत बड़ा सा कुआं था । राजा तीनों बेटों को कुए से थोड़ी दूर ले गए । वहां पहले ही से थोड़े बड़े आकार के गड्ढे खुदे हुए थे । राजा ने कहा

 "इस बार तुम लोगों को मैं एक ही जैसा काम देना चाहता हूँ ताकि किसी के साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो और कोई ये न कह सके कि मेरा काम दूसरे वाले के काम से कठिन था । मैंने यहां तीन समान गड्ढे खुदवा रखे हैं और मैं चाहता हूँ कि तुम तीनो इन गड्ढों में से अपने लिए एक-एक गड्ढे को चुनकर उसमे सामने वाले कुएं से पानी लाकर डालो जिसका गड्ढा सबसे पहले भरेगा मैं उसे ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करूंगा "

  राजा के जाने के बाद राजा के दोनों बड़े बेटे तन मन से काम में लग गए । वही तीसरा बेटा गढ्ढे से थोड़ी दूर बने एक झूले पर लेट गया । यह काम उसके लिए बहुत ही सरल था ऐसे में वह जान गया कि उसे इस देश अगला राजा बनना अब तय है ऐसे में उसने झूले पर लेटे लेटे एकबार फिर राजा बनने के बाद आगे की योजनाओं पर विचार करना शुरू कर दिया । इन्हीं योजनाओं पर विचार करते करते न जाने कब दोपहर और फिर दोपहर से शाम हो गई ।

हालांकि इस बीच उसने कई बार उठकर काम करने की सोची मगर कभी उसका मन नहीं हुआ तो कभी "अभी तो बहुत समय है थोड़ी और आराम करके फिर चलता हूँ" इन्हीं सब बहानो में उसका सारा दिन निकल गया तभी अचानक उसकी नजर ढल रहे सूरज पर पड़ी ।

  वह समझ गया कि एक बार फिर उसने काफी देर कर दी है ऐसे में वह तेजी से कुए की तरफ दौड़ा और जल्दी-जल्दी पानी भरकर उसे गड्ढे में डालने लगा । उसने थोड़े ही समय में बहुत ढेर सारी मेहनत की परंतु यह क्या उसकी मेहनत तो कहीं दिखाई ही नहीं दे रही थी । वह गड्ढे में जो भी पानी डालता वह पलक झपकते ही कहीं गायब हो जाता । दुबारा से जब वह पानी लेकर आता तो गड्ढे में एक बूंद भी पानी नजर नहीं आता थोड़ी ही देर में वह झल्ला गया क्योंकि एक तो सूरज को डूबने की जल्दी पड़ी थी दूसरे गड्ढे में पानी ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा था ।

  असल में गड्ढे की मिट्टी बलुवट थी । जिसके कारण पानी डालते ही मिट्टी सारा पानी सोख लेती थी । ऐसे में उसकी मेहनत निरर्थक जा रही थी । हालांकि काफी प्रयासों के बाद गड्ढे में थोड़ा पानी जरूर आ गया मगर तब तक लगभग अंधेरा होने को था । तीसरे बेटे ने समझ लिया कि यह काम जितना आसान लग रहा था उतना आसान था नहीं पिताजी ने बहुत सोच समझकर यह काम उन्हें सौंपा था । वे जानते थे कि इन गड्ढों को भरना इतना आसान नहीं होगा जितना कि दिख रहा हैं मगर

 " अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"


बेचारा छोटे से गड्ढे तक की दौड़ ऐसे लगा रहा था । जैसे कोई ट्रेन छूट रही हो । वैसे यह एक सच भी था ट्रेन छूट ही रही थी उसके सुनहरे भविष्य की थोड़ी देर में ही राजा का वहां आना हुआ राजा को देखते ही दोनों बेटे काफी खुश हुए । उनके द्वारा सुबह से की जा रही अथाह मेहनत के बाद अब उन्हें  पिता से मिलने वाले एक अच्छे फल का इंतजार था ।

  वहीं तीसरे बेटे ने पिता को सामने देखते ही मिट्टी के घड़े को कुएं में फेंक दिया ऐसा करके उसने शायद उसने अपने कार्यो का मूल्यांकन स्वंय कर दिया था । राजा ने दोनों बेटों के कार्यो को देखने के बाद सीधे तीसरे बेटे के पास पहुंचे और बोले 

"क्यों आज तो तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं है ना आज तो मैंने तुम्हें वही काम दिया है जो इन दोनों को दिया है अब बताओ तुमने मेरे द्वारा दिए गए कार्य को कितना पूरा किया"

पिता की बातों का उसके पास कोई जवाब न होने के कारण उसने एक बार फिर पिता से कहा

   "बस-बस पिताजी थोड़ी देर और बस हो ही गया है" 

मगर पिता ने कड़े शब्दो मे कहा

"नहीं बस, अब इससे ज्यादा मैं और समय मैंने तुम्हे नहीं दे सकता अब समय खत्म हुआ । अब बारी परिणामों की है।  मैं समय है तुम सबके कार्यो के मूल्यांकन का"
ऐसा कह कर पिता खुदे हुए गड्ढों की तरफ बढ़ गए उन्होंने बारी-बारी से सभी गड्ढों को देखा । मगर परिणाम फिर वही थे । दोनों बेटों के गद्दे पानी से लबालब थे वही छोटे बेटे के गद्दे में पानी इतना ही था मानो जैसे भूमि पूजन हुआ हो । पिता को ऐसे में अपने छोटे बेटे पर बहुत गुस्सा आया उन्होंने कहा

  "अब बताओ इस बार तुम क्यों फेल हो गए ? अब क्या तुम्हारा गड्ढा उन सब से बड़ा था ? या कोई और वजह बताना चाहोगे कि जिससे यह समझा जा सके कि तुम्हारा काम दूसरो से कठिन था । तुम कब तक झूठे बहाने से हकीकत को छुपाते रहोगे । तुम कब जागोगे आज तुमने अपने जीवन का सबसे सुनहरा मौका गवा दिया । तुम्हारे अंदर भी वही क्षमताए है जो इनमे हैं मैं जानता हूँ कि तुम किसी भी मामले में इन दोनो से कम नहीं थे मगर आलस्य मे हर काम को आगे और आगे टालते जाने की आदत ने तुमसे इस देश की सत्ता पाने का भावी मौका छीन लिया"


  राजा ने फिर कहा
"वैसे भी मैं नहीं चाहता कि एक ऐसा शख्स इस देश की सत्ता संभाले जो खुद एक नंबर का आलसी हो । ऐसा आलसी व्यक्ति कभी भी किसी भी जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा सकता क्योंकि वह किसी भी काम को तुरंत करने की बजाय उसके लिए आगे की तारीख तय करने मे में भरोसा करता है । ऐसे शख्स को इस देश का उत्तराधिकारी बनाकर मै देश के भविष्य को अंधकार में नहीं डाल सकता । आखिर कैसे कोई राजा अपने देश के भविष्य को अपने ही हाथो गर्त में धकेल सकता है ।
  राजा ने अपने दोनो बड़े बेटो को आधे-आधे राज्य की कमान सौप दी कर स्वंय को जिम्मेदारीयों से मुक्त कर लिया ।

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इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है | Moral Of This Inspirational Hindi Story


आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो व्यक्ति आलस्य करता है वह स्वयं अपने भविष्य को निरंतर गर्त की ओर धकेलने का कार्य करता है अगर आपको सफल होना है तो सबसे पहले अपने अंदर से आलस्य रूपी विकार को दूर भगाना होगा! !


  दोस्तों अक्सर हम सभी थोड़ा या ज्यादा पर आलस से जरूर घिरे रहते है जो काम किसी भी वक्त किया जा सकता है उस काम के लिए भी हम दिन व मुहूर्त तय करते हैं और कभी-कभी तो उस का दिन और मुहूर्त कभी आता ही नहीं वह दिन प्रतिदिन टलता चला जाता है और फिर वही आसान सा काम काफी कठिन लगने लगता है यहां तक कि कभी-कभी तो वह काम हमें डराने भी लगता है हम उससे दूर भागने लगते हैं उस उस काम के बारे में हम फिर सुनना भी नहीं चाहते और 1 दिन उसके बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं आलस्य एक प्रकार का विकार है जो कम या ज्यादा हर किसी में जरूर होती है हम इसे अपने से जितना दूर रख पाएंगे, खुद से जितना दूर भगा पाएंगे हम अपने काम को उतने ही सही तरीके से पूरा कर सकेंगे और अपने लक्ष्य के प्रति खुद एक प्रकार का अवरोध न बनकर उसे सही समय पर सफलतापूर्वक पूरा कर सकेंगे इसीलिए बेहतर होगा कि आज से ही हम ये Promise करें कि जो काम हमें मिला है उसे वक्त रहते पूरा कर दें Laziness एवं आराम तलबी को काम पूरा होने तक किसी भी हाल में अपने समीप नही आने देगें अगर हम ऐसा प्लान करके चलेंगे तो निश्चित रुप से कभी भी Laziness हमारे काम में बाधक नहीं बन सकी ।

      Writer 
  Karan "GirijaNandan"
      With  
 Team MyNiceLine.com

           


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