असफलता ही सफलता की सीढ़ी है - प्रेरणादायक हिंदी कहानी


Inspirational Story Asafalata ka rahasya, असफलता से सफलता की सीख देती हिन्दी कहानी

  वसुंधरा के दो बेटे थे जय और विजय दोनों को उसने एक ही दिन जन्म दिया था अर्थात दोनों जुड़वा थे । वसुंधरा ने दोनों का लालन-पालन एक जैसा ही किया । दोनों को समान सुविधाएं दी । 

  वसुंधरा की आशा के अनुरूप उसके दोनों बच्चे पढ़ाई लिखाई में काफी अव्वल साबित हो रहे थे । दोनों के कक्षा में सिर्फ अच्छे नंबर ही नहीं बल्कि क्लास एवं स्कूल में अच्छी पोजीशन भी प्राप्त कर रहे थे ।

  वसुंधरा ने दोनों का बराबर ख्याल रखा । नौनिहालों के इस प्रकार के परिणामों से घर में सभी बहुत खुश थे । वसुंधरा का विवाह काफी दूर हुआ था । उसका मायका इतना दूर था कि जहां जाने में दो दिनों का समय लग जाता था ।

  शादी के बाद वैसे तो कोई समस्या नहीं थी परंतु वसुंधरा के माता पिता का केवल एक पुत्र था । जो की एक दिन अचानक अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

  इस खबर को सुनते ही  वसुंधरा को तो  मानो सांप सूंघ गया । वह बेसुध सी गई । इतनी कम उम्र में ही उसने अपना भाई खो दिया था ।

  वसुंधरा का गम तो फिर भी थोड़ा कम था  मगर  उसके  बूढ़े माँ बाप का तो इकलौता सहारा ही छिन गया था । मायके से लौटने के बाद भी वसुंधरा का मन वही लगा रहा । उसे अपने माता-पिता की चिंता हर पल सता रही थी हालांकि वहां उनकी सेवा के लिए नौकर चाकर की कोई कमी नहीं थी परंतु अपनों की कमी को कोई अपना ही पूरा कर सकता है ।

  ऐसे में वसुंधरा ने अपने दोनों बच्चों में से एक को वहां भेजने की सोची हालांकि उनकी उम्र अभी इतनी नहीं थी कि वह माँ के बिना रह सके ।

  इसके लिए उसने अपने दोनों बच्चों से वहां रहने के बारे में पूछा विजय ने तो माँ की बातों को तुरंत मान लिया परंतु जय ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया ।

  खैर वसुंधरा तो केवल अपने एक ही बेटे को उनके पास भेजना चाहती थी । विजय के हां करने के बाद उसकी प्रॉब्लम सॉल्व हो गई थी । वसुंधरा ने अपने बूढ़े माँ बाप का ख्याल रखने के लिए अपने  बेटे विजय को अपने उनके पास भेज दिया ।

  इस प्रकार वसुंधरा ने अपने सन्तान धर्म का पालन किया और अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से जुदा करते हुए अपने माता पिता के पास भेज दिया । नाना-नानी भी पोते को पाकर बहुत खुश हुए । उनके जीवन का अकेलापन विजय ने खत्म कर दिया ।

  विजय पोता होकर भी उनके पुत्र की कमी को काफी हद तक कम कर दिया । जय और विजय ने पांचवी तक की शिक्षा एक साथ प्राप्त की थी परंतु अब वे दूर थे और दोनों भिन्न-भिन्न स्थानों से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे ।

  एक तरफ जय अपने माता-पिता के पास रह कर पढ़ाई कर रहा था वही विजय नाना-नानी के साथ रहकर अपने आगे की शिक्षा ग्रहण करने में लगा था  हालांकि विजय को नाना नानी की देखभाल के नाम पर कुछ करना तो नहीं था ।

  उल्टे नाना-नानी उसका बहुत ख्याल रखते । उसकी हर छोटी-बड़ी मांग जो कभी उसके माता-पिता शायद न पूरी कर सके थे उसके नाना-नानी पूरा कर रहे थे ।
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  ऐसे में विजय को वहां बहुत अच्छा लगने लगा । उसे वहां नए दोस्त भी मिले गए । नये माहौल मे विजय को खूब मजा आ रहा था ।

  वही दूसरी तरफ वसुंधरा अपने बेटे को वहां भेज कर माता-पिता की चिंता से मुक्त अवश्य हो गई परंतु अब उसे एक नई चिंता हर पल सता रही थी और वह थी अपने लाल की चिंता । स्कूल से आने के  बाद वसुंधरा रोज शाम को विजय को फोन पर बात जरूर करती और हर महीने उससे मिलने जाया करती । विजय के हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के कुछ दिनों बाद ही वृद्ध नानी की मृत्यु हो गई ।

  नानी के जाने का  गम नाना बहुत दिनों तक झेल न सके और उन्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति हो गई परंतु तब तक विजय ग्रेजुएट हो चुका था । ननिहाल में अब किसी के न होने के कारण उसे अपने सारे दोस्तों और यादों को वहीं छोड़कर वापस अपने पिता के पास आना पड़ा ।

  वसुंधरा विजय को पाकर बहुत खुश हुई । अब उसके दोनों आंखों के तारे उसके आंखों के सामने थे । वसुंधरा बहुत दिनों तक खुद से दूर रहे  विजय को उसका खोया हुआ लाड़-प्यार उसे वापस देने की पूरी कोशिश कर रही थी ।

  वैसे तो विजय बचपन से ही सब का आज्ञाकारी था परंतु नाना नानी के छांव में रहते हुए उसके अंदर शिष्टाचार कूट-कूट कर भर गया था । उसके इस रवैये से यहां सब बहुत खुश थे । विजय सबकी बात मानता और किसी को नाराज नहीं होने देता ।

  अगर कोई उससे रूठ जाता तो उसे फौरन मना भी लेता  विजय से कोई कैसा भी काम करने को कह दे पर वह उसे कभी ना नहीं कहता था चाहे उसके लिए उसे खुद का काम क्यों न बीच में रोकना पड़े ।

  उधर दूसरा भाई जय विजय के बिल्कुल विपरीत स्वभाव का था उसे सिर्फ और सिर्फ अपने काम की पड़ी रहती थी । वह दूसरों के काम को बिल्कुल अनदेखा करके चलता था । वह किसी की कोई बात नहीं सुनता चाहे कोई किसी भी परेशानी में क्यों न हो ।

  जय उसकी मदद करने के लिए कभी नहीं आता थक-हार कर अगले को अपना काम स्वयं ही करना पड़ता था । जय की आदत के कारण सभी उससे बहुत नाराज़ रहा करते थे परंतु जय को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता । वह मनमौजी किस्म का आदमी था ।

  कभी-कभी बड़ी मुश्किल से किसी की बात सुन ले तो ठीक वरना कोई चिल्लाता फिरे उसके कानों में तो जूं तक नही रेंगती थी ।

विजय के समझाने के बावजूद जय अपने रवैया पर अड़ा रहा । परंतु विजय के वापस आने से सब को बड़ी राहत मिली ।

  विजय हर महीने के आखिर में दादाजी की पेंशन लेने के लिए उनके साथ बैंक जाता । वही मां को सुबह स्कूल छोड़ने एवं स्कूल से आने जाता जिसके कारण मां को भी बड़ी हेल्प मिलती आज तक जो मां कड़ी धूप में ऑटो पकड़ कर स्कूल जाती और फिर दोपहर की तेज धूप में ऑटो पकड़ कर आती । आज उसे अपने लाल के कारण काफी हेल्प मिल रही थी ।

  जिसके कारण वह भी विजय से काफी खुश थी । ग्रेजुएशन के बाद अब समय था । जॉब के लिए संघर्ष करने का जय और विजय दोनों फिर से एक साथ थे । दोनों ने आगे के भविष्य के लिए आपस में विचार करना शुरू कर दिया ।
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  काफी विचार विमर्श के बाद दोनों ने सरकारी जॉब की सोची । इसके लिए दोनों ने कड़ी मेहनत करना शुरू कर दिया । दोनों रात दिन परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहे ।   एक दिन विजय अपने चाचाजी को काफी परेशान देखा असल मे वे अपने दोनों छोटे बच्चो को विजय की तरह पढ़ाई-लिखाई में अव्वल बनाना चाहते ।

  इसके लिए उन्होंने बहुत प्रयास भी किया उनको होम ट्यूशन की व्यवस्था भी की परंतु इससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ । मास्टर साहब केवल अपनी ड्यूटी बजा कर चले जाते और बच्चों की शिक्षा जस का तस ही बनी रही ।

  विजय ने जब ये जाना तो उसने बच्चों को ट्यूशन के लिए बाहर न भेजकर उन्हे खुद पढ़ाने का निश्चय किया । जिसके बाद स्थिति बिल्कुल बदल गई ।

  अब उन्हें अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा नंबर मिल रहे थे । यहां तक कि स्कूल में भी अब उनकी पोजीशन भी आने लगी थी । यह देखकर चाचा-चाची उससे बहुत खुश हुए । जय भी यह कार्य कर सकता था परंतु उसे खुद के सिवा किसी से कोई मतलब नहीं था । वह सिर्फ अपने काम से काम रखने वालों में से था ।

  इन सब बातों से खुश होकर दादाजी विजय सौ रूपये महीने के पॉकेट खर्च के लिए देने लगे जबकि जय को जो मिलता था वही मिलता रहा ।

  प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी के बाद अब समय था दोनों के एग्जाम में बैठने का परीक्षा अच्छे से संपन्न हुई । दोनों को परीक्षा के रिजल्ट के परिणामों से काफी आशा थी ।

  कुछ ही दिनों बाद परीक्षा का परिणाम आया । जिसमें जय जोकि बचपन से ही विजय से पढ़ने के मामले मे काफी कमजोर था उसने जॉब पाने मे सफलता हासिल की जबकि वही विजय परीक्षा में असफलता रहा ।

  इस असफलता का प्रमुख कारण था विजय का सभी को खुश करने में लगे रहना ।


  एकतरफ जय ने अपना सारा ध्यान पढ़ाई में लगाए रखा जबकि दूसरी तरफ विजय लक्ष्य की तैयारी के साथ-साथ सबको खुश करने में भी लगा रहा ।

  दादाजी को पेंशन लेने के लिए बैंक ले जाना, पिताजी को हर रोज दोपहर में टिफिन पहुंचाना, माता जी को रोज सुबह शाम स्कूल ले जाना ले आना, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, शाम को सब्जी लाना यह सब करने में ही उसने अपने कुल समय मे से आधे ज्यादा वक्त दूसरो को खुश करने मे गवा दिया ।

  जबकि जय इस सब चीजों को दरकिनारे करते हुए सिर्फ अपने लक्ष्य पर फोकस किए रहा जिसका सुखद परिणाम उसे प्राप्त हुआ ।

Moral Of The Story 


moral of the story "असफलता का रहस्य | Top Inspirational Story In Hindi Secret Of Failure"

  जीवन में ऐसी बहुत सी जिम्मेदारियां हैं जिनको निभाना अति आवश्यक है । जिससे मुंह फेर लेना लगे बिल्कुल भी सही नहीं है परंतु यदि हम सबको खुश करने मे लगे रहेंगे करते तो हो सकता है कि हम जिस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं उसमें हमें सफलता ना मिले । हमें सबसे ज्यादा अपने लक्ष्य पर फोकस करना चाहिए उसके अतिरिक्त अन्य कही भी  विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए ।
  अगर हम सभी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को निभाने में ऐसे ही अपना समय नष्ट करते रहेंगे तो हम बड़े लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच पाएगे । हम सब की यही आदत है कि हम अपना लक्ष्य तो बना लेते हैं परंतु उस लक्ष्य के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने की जरूरत होती है जो अक्सर नही हो पाता है ।
  बिना त्याग किए किसी भी लक्ष्य को हासिल कर पाना संभव नहीं है । सबको खुश करने से बेहतर होगा कि आप सिर्फ अपने लक्ष्य पर फोकस करें । उस पर दिन रात मेहनत करें और दूसरो को ना करने की आदत डालें ।
  लोगों को बताएं कि आपका लक्ष्य कितना Important है और उसे लेकर आप कितने ज्यादा Serious है मुझे यकीन है कि आप के अपने आपको समझेंगे और आप पर बेवजह किसी प्रकार का दबाव नही डालेंगे । जिससे आपको अपने लक्ष्य की तैयारी करने में कहीं कोई परेशानी न आए और तभी आप सफल हो सकेगे ।

 "Wish You All The Best"




         Writer
        Karan "GirijaNandan"
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