A best moral story in hindi on "The way of success"

  
  बहुत समय पहले की बात है। महर्षि दयानंद का आश्रम विद्याध्ययन के लिए काफी प्रसिद्ध था। दूर-दूर से लोग अपने बच्चों को वहां अध्ययन के लिए भेजते थे। महर्षि के आश्रम के नियम काफी कठोर थे। इसलिए ज्यादातर छात्र जो उस आश्रम के बारे में पहले से जानते थे। वे वहां जाने से भी कांपते थे।

  अनुशासन महर्षि के आश्रम की अनिवार्य शर्त थी परंतु आश्रम पहुंचने वाला हर छात्र वहां से विद्वान बनकर ही निकलता था यह महर्षि के आश्रम की प्रमुख विशेषता भी थी। आश्रम की यही विशेषता सबको वहां खींच लाती थी।

  आश्रम में प्रत्येक वर्ष हजारों छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते। इसी आश्रम में तीन बच्चे पवन, पुनीत और पंकज भी शिक्षा ग्रहण करने आए। महर्षि ने उन नये बच्चो को आश्रम मे स्थान दिए जाने के बारे मे हां या ना किए बगैर करीब एक महीने तक उन्हे वहां रखा।

  इस बीच उन्हें आश्रम के कठिन कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई । शायद महर्षि उनकी क्षमता और धैर्य को परखना चाहते थे।

  आखिरकार इस परीक्षा में तीनों को सफलता प्राप्त हुई। आश्रम के सभी बच्चों में इन तीनों पर महर्षि की विशेष नजर थी। महर्षि ने उन बच्चों में शायद कुछ विशेष गुण देखे थे। आगे चलकर वाकई वे बच्चे आश्रम में अन्य सभी बच्चों से ज्यादा श्रेष्ठ निकले।

  देखते ही देखते उनकी शिक्षा काल पूरा हो गया। अब समय था, आश्रम से घर लौटने का आज कई वर्षों बाद वे अपने परिवार से दोबारा मिल रहे थे। अगले दिन आश्रम से शिक्षा प्राप्त कर चुके, सभी बच्चों को वहां से जाने की आज्ञा मिल गई।

  परंतु उन तीनों को आश्रम में ही रोक लिया। ये जानकर उन तीनों के मन में कोतूहल का वातावरण बन गया। उनके मन में कई सवाल एक साथ पैदा होने लगे।  


"आखिर उन्हें आश्रम में क्यों रोका गया ? 
 उन्हें आश्रम से जाने की आज्ञा क्यों नहीं मिली ? 
 क्या उन्होंने आश्रम का कोई नियम तोड़ा है ? 
 क्या उन्होंने कोई अनुशासनहीनता की है ? 
 अगर ऐसा है, तो उन्हे इसका क्या दंड मिलेगा ?"

  
  इन सब सवालों ने उन्हें काफी परेशान कर दिया। आश्रम के सभी बच्चों के जाने के बाद महर्षि वहां प्रकट हुए । तीनों के मन में उथल-पुथल कर रहे सवालों को महर्षि ने भाप लिया। वो मन ही मन मुस्कुराने लगे। महर्षि उनके समीप पहुंचे और बोले

"घबराओ मत ऐसा कुछ नहीं है जैसा तुम सब सोच रहे हो, अपितु तुम्हें हमने यहां इसलिए रोका है क्योंकि तुम हमारे आश्रम के सबसे होनहार और योग्य बच्चे हो। आज तुम्हारे शिक्षा प्राप्ति का समय पूरा हो चुका है और तुम्हारा वापस अपने घर जाने का समय आ गया है। ऐसे में परिवार से मिलने कि तुम्हारे मन की व्याकुलता को मैं भली-भांति समझ सकता हूं। परंतु यहां से घर लौटने से पहले मैं तुम सब से कुछ चाहता हूं"
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गुरूवर की इस बात ने उनको चौका दिया । गुरूवर ने फिर कहा 

  

"क्या तुम सब वह करोगे जो मैं चाहता हूं ? क्या
  तुम सब मुझे वह लाकर दोगे जो मै तुम सब से लाने को कहूँगा" 


  महर्षि के प्रश्न का उत्तर तीनों ने एक स्वर में दिया

 "हां गुरु जी बताएं क्या आदेश है" 


  महर्षि "यहां से बहुत दूर एक जंगल है जहां विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। वहां बहुत ही उपयोगी जड़ी बूटियां भी हैं। वहां देव वृक्ष भी है। जिसकी एक छोटी सी शाखा मुझे चाहिए। क्या तुम उसे लाकर मुझे दोगे"


  एक बार पुनः तीनों ने एक स्वर में जवाब दिया
"हां गुरुजी अवश्य हम जरूर लाकर देंगे"


   महर्षि ने उन्हें वहां तक जाने का रास्ता समझाया। महर्षि द्वारा उनसे वह पौधा मांगना तो महज एक बहाना था। असल में महर्षि उन तीनों श्रेष्ठ युवको में सबसे श्रेष्ठतम कौन है इस बात का पता लगाना चाहते थे।

  उनके विद्याध्ययन के दिनों में इस बात को कई बार उन्होंने परखना चाहे। परंतु अपने ही सिखाई उन तीनों बच्चों के बीच श्रेष्ठतम को जानने में वह असफल रहे।

  महर्षि की मात्र एक पुत्री थी। जो रूपवान के साथ-साथ गुणवान भी थी। वह भी आश्रम में उन बच्चों के साथ ही महर्षि से शिक्षा प्राप्त की थी। महर्षि चाहते थे, कि उनकी पुत्री के लिए उसके सामान ही कोई गुणवान वर मिले। जो उसकी तरह सभी विद्याओं में दक्ष हो। 

 इसके लिए उन्हें वो तीनों ही ठीक लगे। परंतु उन तीनों में सबसे श्रेष्ठ कौन है इसके लिए उन्होंने उनमे  ये प्रतियोगिता रखी। वहां से जाते-जाते महर्षि ने उनसे कहा 


"तुम तीनों में से जो उस पौधे की एक डाल सबसे पहले मुझे लाकर देगा । उससे मैं अपनी पुत्री का विवाह करूंगा।"

  
  महर्षि की पुत्री से सभी वाकिफ थे। ऐसी गुणवान प्रतिभासंपन्न युवती को अपना जीवन साथी बनाना भला कौन नहीं चाहेगा। तीनों ने पौधे को सबसे पहले लाने की ठान ली।

चूंकि वहाँ जाने का रास्ता कुछ घण्टो, कुछ दिनो या कुछ हफ्तों का न होकर काफी लंबा था। वहां सिर्फ जाने में ही कई महीनों का समय लग सकता था। वहां से लौट कर आना तो और भी बड़ी बात थी। ऐसे लंबे रास्ते को कैसे तय किया जाए यह सोचे समझे बगैर आगे बढ़ना ठीक नहीं था। इसलिए वह सभी वहां सबसे पहले पहुंचने के विभिन्न मार्गो एवं संसाधनों पर मन ही मन विचार करने लगे ।
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  अगले दिन एकदम सुबह पुनीत वहां से निकल पड़ा। आश्रम के निकट ही जंगल मे उसने कुछ लकड़ियां इकट्ठे की और उससे एक नाव तैयार की यद्यपि नाव को बनाने में उसने निरंतर काफी मेहनत करनी पड़ी। उसने काफी पसीना बहाया परंतु इस योजना की विशेषता ये थी कि एक तो नदी के बीचो-बीच से एक नाव गुजरती थी जो उस जंगल के बिल्कुल समीप से गुजरती थी जहां वह वृक्ष स्थिति था । दूसरे ये सबसे कम खर्च में हो गया।

  मुफ्त की लकड़ियां और थोड़ा कठिन परिश्रम फलतः नाव तैयार हो गई। समय न गवांते हुए वह फौरन नाव को लेकर नदी की ओर चल पड़ा। नदी के तट पर पहुंचकर उसने नाव को नदी में उतारा और उस पर सवार होकर मंजिल की ओर बढ़ा। 


  परंतु यहां आश्रम में पवन और पंकज अभी यही सोच विचार में लगे थे कि वह इसके लिए कौन सा मार्ग चुने। शायद वे ऐसी चैलेंजिंग कॉम्पिटीशन मे किसी प्रकार की जल्दीबाजी नहीं करना चाहते थे। दूर दूर से महर्षि उन पर नजरे गड़ाए हुए थे।


  अगले दिन पवन पास के एक गांव में गया। उस गांव में काफी घोड़े थे। पवन को पता था कि इतना लंबा रास्ता पैदल तय नहीं किया जा सकता और ऐसा दूसरा कोई ऐसा साधन भी नहीं है। जो उसे घोड़े से जल्दी पहुंचा सके हालांकि ये सौदा थोड़ा महंगा था।


  क्योंकि इसके लिए उस घोड़े के मालिक को घोड़े का उचित मूल्य चुकाना पड़ता परंतु पवन ने काफी सोच-समझकर ये फैसला लिया था। उसने घोड़े के मालिक से उसे ऐसा घोड़ा देने को कहा जो सबसे तेज दौड़ता हो। घोड़े के मालिक ने उसे वैसा ही घोड़ा दिया। जैसा वह चाहता था। 


  पवन ने उस घोड़े को खरीदा और उस पर सवार होकर काफी तेजी से मंजिल की ओर बढ़ चला। अब अंत में केवल पंकज रह गया। कई हफ्ते गुजर गए परंतु पंकज नहीं गया महर्षि ने सोचा

  "कहीं इसने लड़ाई से पहले ही, हार नहीं मान ली परंतु फिर महर्षि सोचने लगे। क्या मेरे सिखाए बच्चे ऐसे भी हो सकते हैं"


  परंतु वह एक बात हमेशा गौर करते कि पंकज का वहां सिर्फ तन ठहरा था मन तो प्रकाश से भी अधिक तीव्र गति से गतिमान था। कुछ दिनों बाद पंकज भी वहां से निकल पड़ा। महर्षि भी उसके पीछे पीछे चल पड़े। पंकज ने न नाव बनाई और न ही घोड़ा खरीदा वह पैदल ही पास के जंगल के रास्ते निकल पड़ा। 

    जंगल का रास्ता विभिन्न जानवरों से भरा होने के नाते खतरनाक था परंतु पंकज को तो सिर्फ अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा था। वह जंगल को पार करके सामने एक विशाल पर्वत पर चढ़ने लगा। महर्षि वही ठहर गए। उन्होंने उसे रोकना चाहा क्योंकि ये काफी जोखिम भरा था।


  

  परंतु पंकज काफी आगे निकल पड़ा था। महर्षि की आवाज उस तक नहीं पहुंच सकी। पंकज कठिन पर्वत की चढ़ाई चढ़ता चला गया। महर्षि आश्रम वापस जरूर चले आए परंतु उन्हें अब उस पौधे से ज्यादा अपने तीनों शिष्यों की चिंता सताने लगी।

  वह अपने आदेश पर थोड़ा पछताने लगे परंतु सिवाय इंतजार के उनके हाथ में अब कुछ भी नहीं था। लगभग 4 हफ्तों बाद आश्रम में पंकज ने प्रवेश किया। उसके हाथों में गुरु जी की इच्छा अर्थात वह पौधा था। महर्षि ने सबसे आखरी में जाने के बावजूद सफलता के साथ लौटे पंकज को बस देखते ही रह गए।

  

Moral Of The Story 

   
        Moral of the story
                     
               




   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
 Team MyNiceLine.com

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