03 July, 2018

सोने का कटोरा प्रेरक कहानी | Golden Bowl An Inspirational Hindi Story

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"सोने का कटोरा" प्रेरणादायक हिंदी स्टोरी | inspirational hindi story on effort for success with moral


सफलता मिलने तक प्रयास जारी रखे प्रेरणादायक कहानी | Success Hindi Story



"अरे इस बुढ़िया को देखो एक पाँव कब्र में है मगर फिर भी झूठ पर झूठ बोले जा रही है । जब इसे राम का नाम लेना चाहिए ऐसे समय में भी यह सिर्फ पाप पर पाप ही किए जा रही है"
गांव वालों के कुछ ऐसे ही विचार थे चंदन की दादी के विषय में असल में चंदन की दादी अब तक उम्र का  सैकड़ा पूरा करने वाली थी । हाथों में लाठी, आंखों के मोटा-मोटा चश्मा, कांपते हाथ और पांव भी जब ठीक से जमीन पर न रख सके कोई जिन्दगी के ऐसे पड़ाव पर पहुंच चुकी थी चन्दन की दादी ।
  मगर फिर भी हर किसी की झूठी बुराइयां करना, हर किसी के बारे में झूठी बातें बनाना उनकी पुरानी आदतों में शुमार था जो आज भी जस की तस बनी हुई थी । दूसरों की चुगली करने की उनकी आदत उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी दहाड़ मार रही थी । सारा गांव उनकी इस आदत से काफी परेशान रहता था । मगर फिर भी दादी, राम का नाम लेने की बजाए बेकार की बातों में अपना समय जाया कर रही थी । वैसे चंदन की दादी उसकी जिंदगी का एक मात्र सहारा थी । चंदन के माता पिता काफी पहले ही इस दुनिया से जा चुके थे । ऐसे में चंदन की दादी के ऊपर ही उसकी परवरिश की पूरी जिम्मेदारी थी ।


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  चंदन की दादी जुबान से चाहे कितनी भी कड़वी क्यूँ न हो मगर वह दिल की बहुत अच्छी थी । वे चंदन को भी कई बार बुरा भला कह देती, मगर उन्हें चंदन की बहुत फिक्र भी थी । वह एक पल के लिए भी अपने घर के अंतिम चिराग को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहती थी । अगर उसे कहीं से लौटने में जरा सी भी देर हो जाए तो उसके घर वापस आने पर वे उसे सुना सुना कर उसके कान पका देती हालांकि चंदन भी दादी की मन की स्थिति को बड़ी अच्छी तरह समझता था ।
  आखिर दादी का भी इस दुनिया में उसके सिवा और कौन था यूं कहें कि चंदन ही उस बुढ़िया का लाठी था । धीरे-धीरे वक्त गुजर रहा था और चंदन की दादी का इस दुनिया से जाने का समय नजदीक आ रहा था । ऐसे में उसे चंदन के भविष्य की चिंता और सताने लगी वह बार-बार चंदन को पढ़-लिख कर कुछ बनने की नसीहत देती थी । मगर छोटा सा चंदन इन सब बातों अक्सर नजरअंदाज अपने लंगोटिया यार विषम और गांव के बच्चों के साथ बस इधर-उधर घूमने और खेल कूद में अपना समय नष्ट करता रहता ।
  एक  दिन की बात है, दादी की तबीयत अचानक बिगड़ गई । दादी की तबीयत बिगड़ने से गांव वाले दादी को ले जाकर शहर अस्पताल मे भर्ती कर दिए । हालांकि वहां भी दादी की तबीयत में कुछ खास सुधार नहीं हो सका  जिसके कारण डॉक्टर उसे अस्पताल से डिस्चार्ज करने को तैयार नहीं थे । मगर दादी तो आखिर दादी थी । उसके हठ के सामने ईश्वर भी सर झुका ले फिर ये सरकारी डॉक्टर किस खेत की मूली थे ।  लिहाजा डॉक्टरों ने दादी के हठ के सामने मजबूरन होकर डिस्चार्ज पेपर पर 'ऑन योर रिस्क' लिखकर उसे डिस्चार्ज कर दिये ।
  बुढ़िया उल्टे पांव गांव वापस लौट आई । चंदन भी उसका घर पर बेसब्री से इंतजार कर रहा था । दादी को पाकर वह बहुत खुश हुआ पर दादी की खस्ता हालत देखकर उसे मन ही मन कुछ अजीब सा भय सताने लगा । पूरे दिन गांव में उसे देखने वालों का आना-जाना लगा रहा ।  इस बीच दादी चंदन से कुछ कहना चाही, मगर गांव वालो के सामने वह कह नहीं पाई क्योंकि बात शायद ऐसी थी जो सबके सामने नहीं कही जा सकती थी । ऐसे में दादी ने सब्र रखते हुए अपने मुंह पर चुप्पी साधे रखी । चंदन और उसका दोस्त विषम दादी के सेवा में सारा दिन लगे रहे । अंधेरा होने के बाद जब लोगों का आना लगभग खत्म हो गया तब दादी ने चंदन के दोस्त विषम को थोड़ी देर के लिए वहां से जाने को कहा दादी की बातों से विषम को कुछ शंका हुई क्योंकि दादी ने आज तक चंदन के दोस्त विषम को कभी इस तरह से वहां से जाने को नहीं कहा था । चंदन और विषम इतने गहरे दोस्त थे कि कभी-कभी तो रात-रात भर विषम चंदन के घर पर ही जाया करता था ।

  ऐसे में आखिर आज दादी ने उसे इस तरह से वहां से जाने को क्यों कहा और अगर वे उसे अत्यधिक रात हो जाने के कारण घर भेजना चाहती थी तो बस थोड़ी देर के लिए ही उसे वहां से जाने को क्यों कहा? इन बातों को सोचकर विषम के मन मे शंका गहराने लगी । ऐसे में वह कमरे से बाहर निकला तो जरूर परंतु वह घर न जाकर वहीं किवाड़ के बगल में छुप गया और  चंदन और दादी की बातें सुनने लगा ।


  विषम को वहां से गया समझकर दादी ने चंदन से कहा
 "देखो बेटा मैं जानती हूँ, कि तुम अभी बहुत छोटे हो और जो मैं तुम्हें बताने जा रही हूँ शायद उसे समझने कि तुम्हारी उम्र भी नहीं है मगर तुम बस इतना समझ लो कि यह दुनिया तुम्हें जितनी सीधी दिखती है उतनी है नहीं यहां पर अच्छे लोग जरूर हैं मगर उनके साथ-साथ बुरे लोगों की भी कमी नहीं है । मुझे लगता है कि अब मैं और ज्यादा दिन नहीं जी सकूंगी ।
चूंकि मैं जानती हूँ कि मेरे जाने के बाद तुम्हारा इस दुनिया में कोई सहारा नहीं होगा । ऐसे में जाने से पहले मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूँ इसीलिए मैं अस्पताल से जबरदस्ती करके यहां वापस चली आई"
दादी के मुख से दुनिया से जाने की बातों को सुनकर चंदन की आंखों से डब डब आंसू बहने लगे । चंदन को रोता देख दादी का भी गला सूख गया बूढ़ी दादी की आंखों से भी लाचारी के आंसू छलक उठे । मगर अब वह कर भी क्या सकती थी । उसने बिस्तर पर पास बैठे चंदन को अपने कलेजे से चिपका लिया और कहा
 "अब तुम शांत हो जाओ क्योंकि रोने से कोई फायदा नहीं है तुम्हारी जिंदगी अभी बहुत लंबी है ऐसे मैं तुम्हें गुजारा करने के लिए कुछ पैसों की भी आवश्यकता पड़ेगी और हमारे पास तो फूटी कौड़ी तक नहीं है । ऐसे में तुम अपनी जिंदगी को आगे कैसे बढ़ाओगे यह काफी मुश्किल होगा इसीलिए मैं जो तुमसे कह रही हूँ उसे ध्यान से सुनो "
  दादी के समझाने पर चंदन ने रोना बंद कर दिया और उनकी बातों को गौर से सुनने लगा । दादी ने  आगे कहा

  "नीचे एक तहखाना है जिसमें ढेर सारा कूड़ा कबाड़ पड़ा हुआ है । उन सबके बीच तुम्हें ढेरों बेकार के सामान मिलेंगे जिनमें कुछ टूटे-फूटे बर्तन भी होंगे । उन्हीं बर्तनों के बीच में एक कटोरा होगा क्योंकि काफी समय से वहां कोई गया नहीं है इसलिए धूल मिट्टी चिपक जाने के कारण वह दिखने में तो उन्हीं बर्तनों जैसा होगा मगर वह एक आम कटोरा नहीं बल्कि वह एक सोने का कटोरा है । उस कटोरे का सही उपयोग करके तुम अपनी हर कठिनाई को आसान कर सकोगे और अपना भविष्य उज्जवल बना सकोगे "

  
  इन बातों को बताते-बताते अचानक दादी के मुख से खून की उल्टियां शुरू हो गई । जिसके लिए डॉक्टरों ने उसे पहले ही आगाह किया था । ऐसे में चंदन जोर-जोर से चिखने चिल्लाने लगा । उसकी आवाज सुनकर गांव वाले एक बार फिर से वहां इकट्ठा हो गए, देर न करते हुए वे दादी को लेकर शहर की तरफ भागे । इस बार दादी की गंभीर हालत देखते हुए चंदन ने भी दादी के साथ जाने की जिद्द की । जिसके कारण गांव वालो को उसे भी साथ लेकर जाना पड़ा । शहर में एक बार फिर से दादी का इलाज शुरू हुआ ।
  काफी लंबे समय तक चले इलाज के बाद आखिरकार दादी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया । दादी के जाते ही चंदन इस दुनिया में बिल्कुल अनाथ हो गया । उसके सर से दादी का अंतिम साया छीन चुका था ।  ऐसे में वह अपनी सुध-बुध खो बैठा । गांव वाले उसे लेकर वापस लौट आए । घर आने के बाद भी काफी दिनो तक चंदन इधर-उधर चुपचाप गुमसुम बैठा रहता । लोगों के समझाने पर भी उसमें जरा भी परिवर्तन नहीं आया । वह बस दादी को याद करके रोता रहता है ।
  कुछ दिनों बाद उसे अपने दोस्त विषम की याद आई । मगर न जाने क्यों जब से चंदन अस्पताल से वापस घर लौटा था तब से उसका दोस्त विषम उसके पास एक बार भी नहीं आया । वह आजकल चंदन से काफी दूर दूर रहा करता था ।
  चंदन को समझ नहीं आ रहा था कि दादी के जाने के बाद विषम के व्यवहार में इतना फर्क क्यों आ गया था ? असल में दादी द्वारा चंदन को बताए जा रहे सोने के कटोरे की बात विषम ने भी कमरे के बाहर किवाड़ के बगल में छुपकर सुन ली थी । जब गांव वाले चंदन और उसकी दादी को लेकर अस्पताल जा रहे थे । तब विषम चंदन के घर के एक कोने में जाकर छुप गया और उनके जाने के बाद वह तहखाने की ओर बढ़ा तहखाने में घुसकर उसने पूरा तहखाना खंगाला काफी मशक्कत के बाद उसे वहां ढेर सारे टूटे फूटे बर्तनों का ढेर मिला । बर्तनों को सामने पाकर उसे दादी की बातें याद आई ।  काफी थक चुके विषय में अचानक उमंग की लहर दौड़ पड़ी वह और ज्यादा आत्मविश्वास और उत्साह के साथ उन बर्तनों में सोने के कटोरे को ढूंढने लगा ।
  यहां एक कमाल की बात यह थी कि दादी ने सिर्फ एक सोने के कटोरे के बारे में चंदन को बताया था । मगर यहां बर्तनों के बीच ढेर सारे कटोरे मौजूद थे । ऐसे में विषम ने सारे कटोरो को इकट्ठा किया और फिर एक-एक कटोरे को पास पड़े पत्थरों पर रगड़-रगड़ कर उन्हें परखना शुरू कर दिया । लगभग-लगभग सारे कटोरे उसने चेक कर डाले मगर सोने का कटोरा उसे नहीं मिला । ऐसे में उसे चंदन की दादी के झूठे चरित्र की याद आई ।
  वह समझ गया कि दादी जब अपने बेटे से भी अक्सर झूठ बोला करती थी तो वह भला चंदन से क्या सच बोलेंगी । वह समझ गया कि यह सब तो दादी ने चंदन से अपनी और ज्यादा सेवा कराने और अपना ख्याल रखने के लिए कहा होगा । सारी माजरा समझ आते ही विषम को अपनी नासमझी पर बहुत गुस्सा आया गुस्से में उसने सामने पड़े आखरी कटोरे को आधे-अधूरे मन से पत्थरों पर रगड़ा जैसे उसे पहले से ही मालूम हो कि यह कटोरा भी सोने का नहीं है और फिर उसने उसपर सरसरी निगाह दौड़ने के बाद उसे उसने बाकी बर्तनों के ढेर पर दे मारा और झल्लाते हुए बाहर निकल गया । बाहर निकलते समय उसने बोला
"इस बुढ़िया को दुनिया से जाते समय भी सिर्फ झूठ बोलने की पड़ी है । आखिर जाते-जाते तो सच बोल दिया होता झूठ में मेरा सारा वक्त बर्बाद किया"
   वक्त के साथ धीरे-धीरे चंदन का दुख पहले से कुछ कम हो गया । अब उसे अपने खाने-पीने एवं अन्य चीजों की कमी महसूस हुई तभी उसे दादी द्वारा बताए गए सोने के कटोरे की याद आई । उसने देर न करते हुए तहखाने  की ओर कदम बढ़ाया । जैसे ही चंदन तहखाने मैं घुसा उसे अपनी दादी की बताई बातों से बिल्कुल विपरीत यहां का नजारा दिखाई पड़ा ।
  दादी ने बताया था कि तहखाने मैं काफी समय से कोई नहीं गया है मगर यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे अभी-अभी कोई यहां से होकर निकला है । सारा सामान उधेड़बुन हो चुका था । चंदन समझ गया कि उससे पहले यहां कोई जरूर आया था । खैर ज्यादा न सोचते हुए चंदन दादी की कही बातों के हिसाब से सोने का कटोरा ढूंढने में जुट गया आखिरकार उसे भी ढेर सारे टूटे फूटे बर्तनों का ढेर मिला ।
  चंदन ने फटाफट उन बर्तनों में से सोने के कटोरे को ढूंढने लगा । मगर विषम की तरह ही उसे भी यहां ढेर सारे कटोरे मिले जिसे पाकर चंदन भी थोड़ा कंफ्यूज हुआ । खैर उसे दादी की बातों पर पूरा भरोसा था । ऐसे में उसने सारे कटोरों को पत्थरों पर घिस-घिस कर देखना शुरू दिया । तब उसे पहले से ही कटोरे पर घिसने के निशान दिखाई दिए । इन सब बातों को भूलकर चंदन अपने काम में लगा रहा । एक-एक करके वह सारे कटोरों को पत्थरों पर घिसता और उनमें सोने का कटोरा ढूंढने  की कोशिश करता ।
  

  मगर काफी मशक्कत के बाद भी उसे सफलता नहीं मिली । वह अभी भी खाली हाथ ही था परंतु उसे दादी की बातो पर पूरा भरोसा था इसीलिए इस कड़ी मेहनत के बीच उसने अपना आत्मविश्वास कभी कम नही होने दिया । आखिर में उसके सामने मात्र एक कटोरा ही बचा था । उसे देखकर चंदन का चेहरा एकदम से खिल उठा । मानो दादी ने जिस सोने के कटोरे के बारे में उससे कहा था वह कटोरा वही हो । ऐसे में चंदन ने तपाक से वह कटोरा उठाया और फिर उसे भी दूसरे कटोरों की तरह ही बहुत ही इत्मीनान से पत्थरों पर घिसना शुरू किया । थोड़ी देर घिसने के बाद बरसों से जमी धूल मिट्टी के कटोरे पर से हटते ही वह चमक उठा  उस सोने के कटोरे की चमक से चंदन का भी चेहरा भी चमक उठा । उसकी विश्वास भरी मेहनत रंग लाई और अपनी दादी के बताए हुए रास्तों पर चलकर वह अपनी किस्मत को चमकाने में सफल रहा । 

  
  असल में यह आखरी कटोरा विषम के हाथ भी लगा था । मगर इतने कटोरों को रगड़ते रगड़ते उसे जैसे भरोसा हो चुका था कि इसमें कोई सोने का कटोरा है ही नहीं यह तो सिर्फ झूठी दादी की झूठी बातें थी जिसमे वह बेवकूफ़ बन गया । उसने अपने आधे प्रयासो मे ही मन ही मन शायद अपनी हार स्वीकार कर ली थी । जिसके कारण आखिर में, सामने पड़े सोने के कटोरे को भी उसने लगभग-लगभग नजरअंदाज कर दिया । उसने उसे पत्थरों पर रगड़ा तो जरूर मगर शून्य विश्वास के साथ और फिर बाद मे उसने उसे ठीक से देखा तक नहीं ।


इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है | Moral Of This Inspirational Hindi Story



  कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं सफलता पाने के लिए बहुत जरूरी है कि हम तब तक अपना प्रयास दोहराते रहे जब तक हमें सफलता मिल नहीं जाती !



 ऐसे बहुत से लोग दुनिया में हैं जो शुरू शुरू में तो लक्ष्य के लिए जी तोड़ प्रयास करते हैं । उसके लिए हरसंभव कष्ट उठाने को तत्पर रहते हैं । मगर जैसे-जैसे सफलता मिलने का समय बढ़ता चला जाता है । वैसे वैसे उनका विश्वास भी डगमगाने लगता है वह शायद मान लेते हैं कि यह काम वह नहीं कर सकते या ऐसी सफलता हासिल नहीं की जा सकती । ऐसे में वह बीच में ही अपना प्रयास बंद कर देते हैं या आधे अधूरे मन से प्रयास करने लगते हैं । जिसके कारण success मिलने के chances और भी कम हो जाते है ।  सामने Goal होते हुए भी उन्हें वह दिखाई ही नहीं देती वह मान लेते हैं ये उनके बस की बात नहीं है । इसीलिए यह Important है कि हम अपना प्रयास regularly जारी रखें असफलताओं से हतोत्साहित हुए बगैर और ज्यादा उत्साह के साथ अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर प्रयास करते रहे । ऐसा करने पर success निश्चित रूप से एक न एक दिन हमें अवश्य मिलेगी । जैसा की इस कहानी में हमने देखा विषम पहले तो पूरी लगन और मेहनत से सोने के कटोरे को ढूंढने में लगा रहा मगर जब उसे अल्प समय में सफलता प्राप्त नहीं हुई तो उसका confidence धीरे-धीरे घटने लगा और आखिर में सामने मंजिल होते हुए भी उसने उसे ठीक से जांचना परखना नहीं चाहा । वही इस कहानी के दूसरे पात्र चंदन ने आखरी समय तक प्रयास करना नहीं छोड़ा और अंततः उसे सफलता हाथ लगी इसीलिए आप को विषम नहीं बल्कि चंदन बनने की कोशिश करनी चाहिए । हमें आखिर तक  प्रयास करने की आवश्यकता है जब तक की सफलता हमें मिल नहीं जाती । अगर हम इस विश्वास के साथ अपना कदम आगे बढ़ाते हैं तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी ।



      Writer 
  Karan "GirijaNandan"
      With  
 Team MyNiceLine.com

           


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