18 June, 2018

कर्म करो फल की चिंता मत करो एक सच्ची कहानी | Deed A True Story In Hindi

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"कर्म करो फल की चिंता मत करो" प्रेरणादायक कहानी | inspirational story in hindi with moral. results of good deed on hindi story

कर्म का फल प्रेरणादायक कहानी | Good Deed Top Inspirational Story In Hindi


  "क्या हुआ इतने उदास क्यों हो तुम्हें तो खुश होना चाहिए आखिर तुमने जिला टॉप किया है । तुम्हारे पापा होते तो आज कितनी खुश होते कि उनका बेटा कितना समझदार हो गया है"

माँ के लाख पूछने के बाद भी अरनव ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी वह बुत बनी आसमान को एकटक बस निहारे जा रहा था ।

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 आज सुबह से ही दोस्तों के साथ परीक्षा परिणामों का ही इंतजार हो रहा था । शाम को एक गांव का ही शख्स पेपर लेकर आया । जिसमें परीक्षाओं का परिणाम निकला था परंतु अरनव को पेपर में अपना रोल नंबर तलाशने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि उसका नाम तो पेपर के फ्रंट पेज पर छपा था ।

उसने जिला टॉप किया था । मगर रिजल्ट को देखकर पहले तो उसे बहुत खुशी हुई । उसके दोस्तों ने उसे कंधों पर उठाकर पूरे गांव में घुमाया । गांव के बड़े बुजुर्गों ने उसे खूब ढ़ेर सारा आशीर्वाद भी दिया । मगर वहां से लौट के आने के बाद न जाने क्यूँ  वह घर के सामने स्थित पुराने कुएं पर चुपचाप बैठ गया है । इतनी बड़ी सफलता हासिल करने के बाद भी वह मुरझाया-मुरझाया सा कयूं है  वह घर में बैठी अपनी माँ से भी मिलने नहीं गया । काफी देर इंतजार के बाद माँ खुद अरनव से मिलने चली आई ।

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  उसने तो सोचा था कि अरनव आज बहुत खुश होगा । मगर न जाने क्यों अरनव खामोश है वह कुछ नहीं बोल रहा । बिल्कुल गुमसुम उदास सा है क्या उसे और ज्यादा अंक प्राप्त करने की उम्मीद थी ? क्या उसे उतने अंक नहीं मिले जितना के लायक हो खुद को समझता था ? तमाम सवाल अरनव की माँ के मन में गूंज रहे थे ।

  अरनव के पिता उसके दुनिया में आने से पहले ही इस दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह गए थे । एक ट्रेन हादसे में उनकी मौत हो चुकी थी । अरनव की माँ लगभग 8 महीने से गर्भवती थी । पिता की बरखी के दिन अरनव ने जन्म लिया । बेचारा अरनव तो पिता का मुख भी नहीं देख सका था । उसकी माँ उसके लिए माँ और पिता दोनों थी ।

  ऐसे में अरनव की सारी जिम्मेदारी उसके मझले चाचा जी पर थी जो कि एक सरकारी डॉक्टर थे। उन्हीं के दम पर अरनव की पढ़ाई लिखाई चल रही थी । हालांकि अरनव के एक छोटे चाचा भी थे जो खेती किसानी का काम करते थे परंतु उनकी आर्थिक स्थिति बहोत खराब थी जिसकी वजह अच्छी नहीं थी अभाव के कारण ही उन्होंने अपने दोनो बच्चों की पढ़ाई बीच में ही बंद करवा दी थी ।

  आज अरनव एक अबूझ पहेली बने हुए था परंतु अरनव की माँ भी वजह जानने की जिद्द पर अड़ी रही आखिरकार अरनव को माँ से वजह बतानी ही पड़ी ।

  अरनव ने बताया कि बोर्ड एग्जाम के बाद जब वह अपने मझले चाचा के वहां से गर्मियों की छुट्टियां मनाकर वापस आने के लिए ट्रेन मे बैठे गाड़ी के चलने का इंतजार कर रहा था तब चाचा ने उसे रास्ते के लिए कुछ पैसे देते हुए कहा

"देखो अरनव जहां तक हो सकता था मैने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया । अब मेरे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं जिसके कारण मुझपर खर्च का बोझ बढ़ता जा रहा है । ऐसे में अब तुम्हारा खर्च उठा पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है । मैं बहुत ही मुश्किल से तुम्हें मैट्रिक तक खींचकर ला पाया हूँ । अब इसके आगे मैं तुम्हें नहीं पढ़ा सकता बेहतर होगा कि तुम अपने लिए कोई काम धाम ढूंढ लो"

  ये कहते-कहते अरनव की जुबान लड़खड़ा गई वह इधर-उधर थोड़ी देर देखता रहा फिर उसने कहा 
"माँ इस अच्छे रिजल्ट से अब क्या फायदा मेरी मेहनत का अब कोई मोल नहीं रहा"

तब माँ ने उसे समझाया 
"इतनी-इतनी बातों से खुद को मायूस मत करो । तुम आगे की तैयारी शुरू करो । हम कोशिश करेंगे तो कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा"

माँ की बातों में विश्वास तो बहुत था मगर जमीनी सच कुछ और ही था । 

"जेब में नहीं दाने और अम्मा गई भुनाने" 

कुछ ऐसे ही कहावत उनकी दशा पर चरितार्थ हो रही थी । फिर भी माँ की बातों को मानकर अरनव पूरी लगन और मेहनत से गांव के दूसरे बड़े लड़कों से उनकी पुरानी किताबें मांगकर इंटरमीडिएट की पढ़ाई घर पर ही करने लगा ।

  कई महीने गुजर गए मगर अरनव स्कूल नहीं जा सका उधर मझले चाचा ने इस डर से कि कहीं फिर से न अरनव की आगे की पढ़ाई का जिम्मा उनके सर बध जाए, उन्होंने अरनव की इतनी बड़ी सफलता के लिए न कभी उसे मुबारकबाद दी और न  ही कभी उसका हालचाल लिया ।
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  कई महीने गुजर गए परंतु अरनव विद्यालय नहीं गया एक  दिन छोटे चाचा ने अरनव की माँ से पूछा 

 "क्या बात है  काफी दिनों से स्कूल खुल चुके हैं पर अरनव घर पर ही पढ़ रहा है आखिर वह स्कूल क्यों नहीं जा रहा है क्या 
उसने कुछ और करने की सोची है"

  तब माँ ने  उन्हे  सारी बात बताई । यह सुनकर छोटे चाचा को बहुत दुख हुआ परंतु उनके पास तो खुद के बच्चों को पढ़ाने के भी पैसे नहीं थे । ऐसे मे वे अरनव के लिए कर ही क्या सकते थे।

  दो दिनों बाद वे फिर अरनव की माँ के पास आए और बोले 
"मेरी आमदनी वैसे तो बहुत कम है जिसमें मेरा खुद का घर चला पाना बहुत मुश्किल होता है और शायद जिस के नाते मैंने अपने बच्चों की भी पढ़ाई लिखाई बीच में ही बंद करवा दी  हां मगर ये भी सच है कि मेरे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा रुचि भी नहीं थी । मगर अरनव ने जो कर दिखाया है उसके बाद अगर उसकी पढ़ाई बीच में ही बंद करनी पड़ी तो यह शर्म से डूब मरने जैसी बात होगी । अरनव भी मेरे अपने बच्चो जैसा ही है और उसने हमारे पूरे परिवार का नाम रोशन किया है । हम सब का फर्ज बनता है कि उसकी पढ़ाई बीच मे कोई बाधा न रुकने आए । अभी मेरे पास ये थोड़े पैसे हैं जिससे तुम उसका दाखिला कॉलेज में कराओ । मैं नहीं जानता कि मैं उसे कबतक पढ़ा पाऊंगा । मगर फिर भी मेरी कोशिश रहेगी कि वह जितना पढ़ सके मैं उसे उतना पढ़ाउ"

  चाचा जी की बातों को सुनकर जिंदा लाश बन चुके अरनव के अंदर फिर से जान आ गई । माँ ने वो पैसे देकर उसे फौरन स्कूल भेजा और  इस तरह छोटे चाचा की मदद से अरनव ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर ली हालांकि फिर भी हर पल उसे यही डर सताता कि अगले महीने की फीस का इन्तजाम उसके चाचा कर पाएंगे या नही । अगर वो ऐसा ना कर सके तो फिर क्या होगा ?

  परन्तु माँ उसे इन सवालो से बार-बार बाहर निकालने की कोशिश करती वह उसे समझाते हुए कहती 

"कर्म करो फल की चिंता मत करो"

  आखिरकार अरनव की मेहनत और चाचा जी के जिम्मेदारी भरे कदम ने कमाल दिखा ही दिया और अरनव ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में जिला नहीं पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान हासिल किया । यह वाकई चौंकाने वाली बात थी ।

  अरनव इस बार की सफलता से बहुत खुश था । उसे मालूम था कि आगे के रास्ते बहुत सरल नहीं होंगे मगर इस जीत से उसे माँ की कही उस बात पर पूरा  यकीन हो चला था कि "जहां चाह वहां राह" वह अब जान चुका था कि अगर वह सच्चे मन से कोशिश करेगा तो हर उसकी हर परेशानी का कोई न कोई हल जरूर निकल आएगा ।

  अरनव को प्रदेश की कई संस्थाओं की तरफ से इस सफलता के लिए सम्मानित किया इसमें उसे  ढेर सारा धन भी प्राप्त हुआ । इन पैसों से उसकी आगे की राह थोड़ी आसान हो गई और उसने ग्रेजुएशन में दाखिला लिया । टाॅपर होने के नाते बहुत जल्द ही इस अनजाने कालेज मे भी अरनव ने अपनी जगह बना ली सभी उसे बहुत पसंद करते ।  कुछ ही दिनों में अरनव ने, न सिर्फ ग्रेजुएशन प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण की बल्कि अगली साल के लिए हो रही स्कॉलरशिप परीक्षा में भी सफलता हासिल की ।

  स्कॉलरशिप के पैसों से उसने पहले ग्रेजुएशन और उसके बाद  PG तक की शिक्षा हासिल कर ली और फिर आखिरकार उसने एक वह चमत्कार कर दिखाया जिसका सपना उसने शायद बचपन से देखा था । उसने  स्कॉलरशिप प्रोग्राम के तहत कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पीएचडी प्रोग्राम में अपना रजिस्ट्रेशन करवाने में सफलता हासिल की यह उसके लिए वाकई सबसे बड़ा दिन था ।

  पीएचडी पूरा करने के बाद अरनव एक वैज्ञानिक बन चुका था । उसकी मांग अब न सिर्फ इंडिया में थी बल्कि विश्व के कई देशों से उसे आॅफर लेटर प्राप्त हो रहे थे परंतु अपनी मिट्टी को न भूलते हुए उसने इंडिया लौटने का फैसला किया ।

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इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है | Moral Of This Inspirational Hindi Story


पूरी ईमानदारी के साथ प्रयास करने पर सफलता के मार्ग अपने आप बनते चले जाते हैं और मंजिल हमें मिल ही जाती है । इसीलिए फल की चिंता किए बगैर पूरे मन से कर्म करने की जरूरत है क्योंकि अच्छे कर्मों का फल आखिरकार अच्छा ही होता है !

  दोस्तों ये एक शख्स की सच्ची कहानी है | True Story जिसने अभाव मे भी इतिहास रच दिया । ऐसे बहुत से लोग हैं । जिनके पास कुशलता तो है परंतु अभाव के कारण वे अपनी कुशलता के अनुरूप मार्ग चुनने और उसपर चलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते हैं । अगर आप भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं तो आज ही व्यर्थ की चिंताओं को त्याग कर तन मन से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र होकर उसे पूरा करने के लिए तन मन से जुट जाएं । आप देखेंगे की हर समस्या का कोई न कोई हल निकलता नजर आएगा । एक रास्ता बंद होगा तो 10 रास्ते खुलते चले जाएंगे और एक दिन आप success के Top पर नजर आएंगे । अक्सर अभाव में ही success की तरफ लोग देखते हैं और उसे पाना चाहते हैं । अगर सब कुछ हमारे पास पहले से ही मौजूद होगा तो हमें सफलता की क्या आवश्यकता इसीलिए सभी चिंताओं को त्याग कर सिर्फ अपने कर्म पर ध्यान दें फल की चिंता फिलहाल के लिए पूरी तरह त्याग दें क्योंकि यही एक रास्ता है जिससे हम अपनी सफलता को प्राप्त कर सकते हैं । आपको कर्म भी करना होगा और कर्म के बीच आने वाली बाधाओं को भी खुद ही दूर करना होगा । हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ भी नहीं हो सकता । आप अपने लक्ष्य के लिए आवश्यक  कर्मों को जितने दिन टालते जाएंगे आपका लक्ष्य उतना ही कठिन होता चला जाएगा, आगे की डगर और भी ज्यादा मुश्किल और डरावनी होती जाएगी । बेहतर होगा कि समय रहते ही अपना Goal निर्धारित करें और उस पर पूरे मन पूरी लग्न से और उसे पूरा करने के लिए पूरे मन से जुट जाएं । आपको सफलता जरूर मिलेगी Wish You All The Best.


                               
         Writer 
  Karan "GirijaNandan"
      With  
 Team MyNiceLine.com

           

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