17 June, 2018

संस्कार प्रेरणादायक कहानी | Sanskar Top Motivational Story In Hindi

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 "संस्कार" प्रेरणादायक कहानी | motivational story in hindi with moral. what is sanskar. significance of sanskar

संस्कार क्या हैं अर्थ एवं महत्व हिंदी स्टोरी | Motivational Story In Hindi



  धीरज और नीरज काफी अच्छे दोस्त थे ।  दोनों का बचपन साथ-साथ ही बीता था हालांकि दोनों के स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था । जहां धीरज काफी सज्जन था वही नीरज शैतानी दिमाग वाला था । मगर फिर भी उनकी यह बेमेल जोड़ी काफी दिनों तक सलामत रही चूंकि धीरज पढ़ने में काफी तेज था जबकि नीरज का झुकाव पढ़ाई-लिखाई में कम कुराफात में ज्यादा था ऐसे में उसने कुछ ही दिनों मे पढ़ाई छोड़ दी ।

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  धीरज को जब इस बात का पता चला तो उसने नीरज को समझाने की बहुत कोशिश की परंतु उल्टे नीरज, धीरज को ही समझाने में लगा रहा लाख प्रयासों के बावजूद नीरज आगे पढ़ाई न करने के अपने निर्णय पर अटल रहा । वही धीरज को आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाहर जाना पड़ा । जिसके कारण दो दशकों से चल रही इस दोस्ती में जुदाई का वक्त आ गया  हालांकि  फिर भी दोनों के बीच पत्रों के द्वारा बातचीत का दौर जारी रहा परंतु  यह चिट्ठी-पत्री का दौर भी  ज्यादा दिन  तक जारी न रह सका और बदलते पते के साथ ही दोनों का एक दूसरे से संपर्क आखिरकार टूट गया ।

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  ऊंची शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात धीरज को बैंक मैनेजर की जॉब मिली । वही शैतानी दिमाग वाला नीरज धीरे-धीरे अपनी सोच के मुताबिक लूट, छिनौती एवं चोरी जैसे गलत कामो में रम गया ।

  वक्त गुजरने के साथ धीरज और नीरज दोनों अब विवाह के बंधन में बध चुके थे । कुछ सालों के अंतराल के बाद दोनों के एक-एक पुत्र हुए दोनों अपने नए रूप को अपने सामने पाकर काफी खुश थे । दोनों ने अपने-अपने तरीके से और अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का लालन पालन किया ।

  वक्त के साथ मिले प्रमोशन से धीरज, अब बैंक में काफी बड़ा ओहदा पा चुका था । जिससे धीरज की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी । अपनी स्टेटस के अनुरूप धीरज ने काफी महंगे पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला कराया ।

  वही नीरज लूट एवं चोरी के बल पर कुछ ज्यादा नहीं कमा पाता था और अक्सर उसे इन अपराधों के लिए जेल के चक्कर भी काटने पड़ते थे । जिसके कारण उसकी आर्थिक स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं थी । ऐसे में उसने अपने बच्चे का दाखिला पास के ही एक प्राथमिक विद्यालय में करा दिया ।

  गुजरते वक्त के साथ धीरे-धीरे दोनों  के बच्चे बड़े हो गए  वहीं धीरज और नीरज का बुढ़ापा आ गया ।

  तकरीबन 30 वर्षों की बैंक सेवा देने के पश्चात धीरज अब रिटायर हो रहा था ऐसे मे उसने अपने पुराने शहर वापस लौटने की सोची । रिटायरमेंट के फौरन बाद अपना बोरिया बिस्तर बांधे धीरज अपने पुराने शहर वापस लौट आया । शहर में कदम रखते ही उसे अपने पुराने दिनों की याद आ गई । शहर काफी बदल चुका था, वहां की छोटी-छोटी दुकानें  अब माल का रुप ले चुकी थी । जिन सड़कों पर कभी यदाकदा कोई दिखाई दिया करता था । आज वहां पावं रखने की भी जमी । धीरज मन ही मन सोच रहा था ।

 "कितना कुछ बदल सा गया है मगर फिर भी ये शहर  न जाने क्यूं ये आज भी उतना ही अपना सा लग रहा है जितना कल लगा करता था शायद इसीलिए कहते हैं अपना शहर तो अपना ही होता है । "


  यहाँ पहुंचकर धीरज बहुत खुश था । घर पहुंचकर सबसे मिलने के बाद उसे अपने बिछड़े जिगरी यार नीरज की याद आई वह नीरज से मिलने के लिए अधीर हो गया । परंतु नीरज अपना पुराना मकान छोड़ चुका था । धीरज अपने पुराने मित्रो से नीरज के बारे में मालूमात करने लगा ।

  तब उसे पता चला कि नीरज गलत रास्ता अख्तियार कर चुका है । अब वह चोर उचक्कों की संगत में रहता है । आए दिन थाने के चक्कर काटना उसकी दिनचर्या बन चुकी है । यह सब जानकर धीरज को काफी दुख हुआ हालांकि इन सब बातों से वह ज्यादा आश्चर्यचकित नहीं हुआ क्योंकि वह नीरज के रंग-ढंग से पहले ही पूर्णतः वाकिफ था ।  
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  परंतु धीरज सब कुछ जानकर भी नीरज से मिलने के लिए  बहुत व्याकुल था । काफी मशक्कत के बाद एक दिन उसने नीरज का पता जान ही लिया । अगली सुबह जब नीरज अपने घर के बरामदे में चारपाई पर बैठे चाय पी रहा था । तभी अचानक उसके सामने धीरज आ धमका ।

  उम्र के थपेड़ों ने दोनों के रंग-रूप को इतना बदल कर रख दिया था कि एक दूसरे के सामने होकर भी वे एक दूसरे को बिल्कुल भी नहीं पहचान रहे थे । धीरज को अपने सामने पाकर नीरज खाट से उठ खड़ा हुआ । उसने धीरज से पूछा

 "जी बताएं आप कौन हैं और यहां किस काम से आए हैं"
  वक्त नाम भुला सकता है चेहरे को बदल के रख सकता है परंतु आवाज कभी नहीं बदलती । नीरज की आवाज सुनते ही धीरज उसे पहचान गया और उसके मुख से
"नीरज मेरे दोस्त... "

निकल पड़ा । धीरज की आवाज सुनते ही नीरज ने भी उसे पहचान लिया और उसके चेहरे पर भी एक मुस्कान छा गई । दोनों ने एक दूसरे की तरफ उंगली उठाई शायद वे एक दूसरे से धीरज नीरज होने की बात कंफर्म कर रहे थे ।  

  बरसों के बिछड़े जिगरी यारों ने एक दूसरे को गले लगा लिया । उनके बीच काफी देर तक बातचीत चलती रही । थोड़ी ही देर बाद नीरज के बेटे ने घर में कदम रखा । उसने अपने पिता से धीरज के बारे में बचपन से ही सुन रखा था ।

  ऐसे में जैसे ही उसने जाना कि धीरज अंकल यही है । उसने तपाक से उनके पैर छुए । नीरज के बच्चे में ऐसे संस्कार देखकर धीरज थोड़ा अचंभित रह गया क्योंकि एक चोर-उचक्के के बच्चे में ऐसे संस्कारों का होना बड़ी अजीब सी बात थी ।

  नीरज और धीरज के साथ नीरज का बेटा भी वहीं बैठा रहा । धीरज ने उससे काफी सवाल जवाब भी किए । जिसका उसने बड़ी ही शालीनता और आदर से जवाब दिया । पता चला कि वह एक एम एन सी कंपनी में सेल्स मैन है । काफी देर तक हुई बातचीत के बाद धीरज नीरज से घर आने के लिए कहकर वहां से चला गया । घर पहुंचकर धीरज ने नीरज और उसके बेटे की काफी तारीफ की ।

  उधर पुराने यार से पुनः मिलने की इच्छा ने नीरज को अधीर बना दिया था । ऐसे में अगली ही सुबह वह भी धीरज के घर जा पहुंचा । कल की बची कुची बातें अब उनके बीच पूरी होने लगी । धीरज का घर काफी आलीशान था । घर के सामने ही महंगी-महंगी गाड़ीया उसके रईसी की गवाही दे रहे थे ।
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  इतने में ही धीरज का बेटा घर से बाहर जाने के लिए निकला धीरज ने उसे रोक कर नीरज का उससे परिचय करवाना परंतु  बिना धीरज का बेटा रूके बगैर बस घर से बाहर चलता चला गया और फिर लग्जरी कार में बैठकर तूफान की स्पीड से कहीं गुम हो गया ।

  यह सारी बातें नीरज को काफी अजीब लग रही थी । वहीं बेटे की इस करतूत ने धीरज को भी थोड़ा शर्मिंदा कर दिया था । तब नीरज ने बात को  बदलने की कोशिश करते हुए कहा
 "जाने दे यार बच्चे हैं जरूर कोई इंपॉर्टेंट काम रहा होगा इसीलिए शायद थोड़ी जल्दी में था "

 धीरज ने उसकी हां में हां मिलाई मगर थोड़ी ही देर बाद धीरज से रहा नहीं गया और उसने कहा
 "यार बुरा मत मानना तू चोरी और लूटपाट का काम करता है जिसके वजह से तुझे कई बार जेल भी जाना पड़ता है । अक्सर पुलिस तेरे पीछे लगी रहती है । इसकी वजह से तेरी सामाजिक स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है । फिर भी तुम्हारे बेटे में इतने अच्छे संस्कार कैसे हैं जबकि मैंने अपने बेटे को शुरू से ही अच्छे से अच्छे पब्लिक स्कूलों में पढ़ाया लिखाया उसकी हर जरूरतों को पूरा किया उसे महंगे-महंगे कपड़े मोबाइल गाड़ियां और वह सब कुछ दिलाया जो भी उसने चाहा उसके किसी भी सपने को मैंने टूटने नहीं दिया । मगर फिर भी मेरे बच्चे में संस्कार नाम की कोई चीज नहीं है । ऐसा क्यों हुआ "

  नीरज ने धीरज का ढाढ़स बढ़ाते हुए कहां
 "कोई बात नहीं यार यह उम्र ही ऐसी होती है जब इंसान को अपने आगे कोई दिखाई नहीं देता तुम शायद भूल रहे हो । हम लोगों ने भी यह जिंदगी जी है । अब जब हमारे बच्चे ऐसी जिंदगी जीना चाहते हैं तो हम उन्हें क्यों रोक रहे हैं । उन्हें करने दो जब वक्त आएगा तो वह खुद संभल जाएंगे "
  तब धीरज ने कहा

"मैं तुम्हारे बेटे से मिलने के बाद पूरी रात यही सोचता रहा कि एक चोर उचक्के का बेटा इतना संस्कारी और मेरा बेटा ऐसा कैसे हो सकता है ? आखिर तुमने उसे ऐसी कौन सी सुविधाएं दी जो मैं नहीं दे सकता ? ऐसी तुमने उसे कौन सी शिक्षा दी जो मैंने नहीं दी ? "

  तब नीरज ने कहा
 "ऐसी बात है तो चलो"
   नीरज धीरज का हाथ पकड़े अपने घर ले गया वहां उसने पत्नी से एक शीशे का जार मंगवाया उसने उसमें ढेर सारे बाॅल डाली जब जार गेंद से भर गया । तब उसने उसमें छोटे-छोटे कंकड़ डालना शुरू कर दिया । कंकड़ों के भर जाने के बाद जब उसमें और कंकर डालने की जगह नहीं बची तब उसने उसमें रेत डालनी शुरू कर दी । रेत के पूरा भर जाने के बाद आखिर में नीरज ने उसमें पानी भरना शुरू कर दिया । एक समय ऐसा आया जब शीशे का जार पानी से पूरी तरह भर गया

यह सारी चीजें धीरज बड़े गौर से देख रहा था मगर कुछ समझ नहीं पा रहा था । नीरज ने कहा
 "क्या तुम कुछ समझ रहे हो "
 धीरज ने कहा
 "नहीं यार तुम क्या समझाना चाहते हो मुझे तो कुछ   भी समझ नहीं आ रहा "

 तब धीरज से नीरज ने कहा
 "देखो यार मैंने इसमें सबसे पहले गेंद डाली अगर मैंने इसमें सबसे पहले रेत डाली होती तो रेत से जार के भर जाने के बाद उसमें और कुछ भी नहीं डाला सम्भव नही होता इसीलिए मैंने सबसे पहले इसमें  बॉल डाली । इसी तरह मैंने अपने बच्चे के अंदर सबसे पहले संस्कारों की बॉल डाली । पैसे रुपए के महत्व और दुनियादारी आदि को मैंने उसे तब तक नहीं जानने दिया जब तक उसके अंदर संस्कार पूरी तरह से भर नहीं गए । वही तुमने उसे जीवन में धन के महत्व और दुनियादारी को सबसे पहले समझाने की कोशिश की अर्थात तुमने उसके मन रूपी जार को सबसे पहले रेत से भर दिया । जिसके कारण अब उसमें संसार रूपी बाॅल सामाने की जगह ही नहीं बची । उसे सिर्फ धन का महत्व पता है संस्कारों का महत्व नही"


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इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है | Moral Of This Inspirational Hindi Story



यद्यपि धन का महत्व जीवन में बहुत है परंतु संस्कारों से ज्यादा महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं इसीलिए हमें अपने बच्चों को सबसे पहले संस्कारों की शिक्षा देनी चाहिए !



अक्सर हम अपने बच्चों को अच्छा करियर बनाने के लिए उन्हें तमाम तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । हम उनके सामने डॉक्टर इंजीनियर और तमाम तरह के ऐसे चेहरे रखते हैं जिससे प्रभावित होकर हमारा बेटा आगे चलकर डॉक्टर इंजीनियर या IAS ऑफिसर बने । हम भूल कर भी उनके सामने ऐसे लोगो का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते जो उन्हें संस्कारी बनने के लिए inspired करे जिस देश के  बच्चों में अच्छे संस्कार ही नहीं होंगे उस देश का भविष्य कभी उज्जवल नहीं सकता । बच्चों को सबसे पहले अच्छे संस्कारों की शिक्षा देनी चाहिए क्योंकि अगर हम उन्हें दुनियादारी पैसों की ही Importance सबसे पहले सिखाएंगे तो आगे चलकर उन्हें संस्कारों का महत्व समझा पाना मुश्किल होगा । पैसो से ज्यादा Important संस्कार हैं यह समझा पाना तभी संभव है जब हम उनके अंदर सबसे पहले संस्कारों का बीज बोए ।

                               
         Writer 
  Karan "GirijaNandan"
      With  
 Team MyNiceLine.com

       

    

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