"बच्चों को बनाए संस्कारी" प्रेरणादायक कहानी | Inspirational Story In Hindi with moral

   चंदन विष व्यापत नहीं,  लिपटे रहत भुजंग - हिंदी स्टोरी | Inspirational Story In Hindi 


  शिवनाथ ने अपने इंजीनियर बेटे की शादी बड़ी ही धूमधाम से की । बेटे की शादी में अपने सभी जानने वालों और दूर-दूर बस चुके रिश्तेदारों को भी बुलाना वे नहीं भूले । महानगर की सबसे पुरानी बस्ती के बीचो-बीच शिवनाथ जी का बंगला था । शिवनाथ का सिर्फ एक ही पुत्र था । वैसे तो भुसवल स्थित इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर शिवनाथ जी बेटे को अपनी तरह ही अध्यापक बनाने की इच्छा रखते थे परंतु बेटे की शुरू से ही दिलचस्पी इंजीनियरिंग मे थी ।

  शिवनाथ को भी बेटे की इच्छा से कोई विरोध नहीं था और एक दिन बेटे ने पिता का नाम रोशन करते हुए न सिर्फ अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की बल्कि कॉलेज से निकलने के कुछ ही दिनों में मोटी कमाई वाले PWD विभाग में इंजीनियर की नौकरी प्राप्त कर ली ।

  अब तो शिवनाथ जी की सारी चिंताएं दूर हो गई थी । एक तो खुद मोटी पेंशन पाने वाले शिवनाथ जी ऊपर से बेटा सरकारी इंजीनियर वह भी PWD में अब तो उनके दसों की दसो उगलियाँ मानो शुद्ध देसी घी में हों ।  सरकारी नौकरी मिलते ही बेटे के लिए रिश्तो का तांता लगा गया ।

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  ऐसे में बड़े घर की बहू मिलना और साथ ही साथ ढेर सारा दहेज मिलना लिए लाजमी था । शादी के बाद बहू के पैर जैसे ही घर में पड़े चारों तरफ मानों खुशियाँ ही खुशियाँ बिखर गई । आज सब बहुत खुश थे । काफी सालों बाद घर में ऐसा माहौल बना था । बहू ने भी सबकी उम्मीदों पर खरे उतरते हुए सबको खुश करने की बहुत कोशिश की ।

   बड़े घर की बहू  के अंदर कोई भी बड़े घर की बेटी जैसे नखरे नहीं थे । ऐसे में बहू सबको रास आ रही थी । धीरे धीरे वक्त के साथ घर में ईश्वर की कृपा से नन्ही किलकारियां गूंज उठी । बेटे के जन्म के 25 वर्षों बाद आज जाकर घर में किसी नन्हे मेहमान ने कदम रखा था ।


यह वाकई बहुत यादगार समय था । शिवनाथ ने दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर का धन्यवाद किया । पोते के आने की खुशी में उन्होंने सारी बस्ती को दावत दी ।  पोते को पाकर दादा-दादी को ऐसा लगा  जैसे उन्होंने  मानो वैतरणी पार कर ली हो । विश्वनाथ जी के आंगन में चारों तरफ मानो खुशियाँ ही खुशियाँ बिखरी हुई थी ।  धीरे-धीरे शिवनाथ का पोता बड़ा होने लगा और अब उसके स्कूल जाने के दिन थे । काफी दिनों बाद आया नन्हा मुन्ना सबकी आंखों का तारा था । उसे अकेले स्कूल भेजने की इच्छा तो किसी की नहीं थी ।

  मगर शिवनाथ शिक्षा के मामले में किसी प्रकार की रियायत बरतने वालों में से नहीं थे । स्कूल जाने की उम्र होते-होते शिवनाथ ने पोते का दाखिला शहर के सबसे जाने-माने पब्लिक स्कूल में कराया ।

  काफी दिनों से अध्ययन  का कार्य छोड़ चुके शिवनाथ जी एक बार फिर से अपने पुराने प्रोफेशन में लौट आए थे । वे अब अपने पोते को स्वयं अपनी पुरानी Maruti 800 सीसी  से  पोते को स्कूल छोड़ने एवं ले आने जाते । घर लौटने पर  वह पोते के साथ एक अच्छे दोस्त की तरह उसके साथ खेलते खाते और उसका स्कूल का होमवर्क भी कराते ।

  इस तरह से शिवनाथ जी एक बार फिर से जिंदगी में काफी बिजी हो चुके थे । उनके पास अब अपने यार दोस्तों से मिलने का भी समय तकरीबन न के बराबर रह गया था । शिवनाथ का पोते के प्रति इस रवैया के नाते पोता भी पढ़ाई-लिखाई में काफी अच्छा निकल रहा था ।

  एक दिन हमेशा की तरह स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग का कार्यक्रम रखा गया । संजोग से इंजीनियर साहब काम के सिलसिले में दूसरे शहर गए हुए थे । ऐसे में बहुरानी को अकेले ही पेरेंट्स मीटिंग में जाना पड़ा ।

  वहां पहुंचने के बाद वैसे तो हर बार बहुरानी को हमेशा अच्छा अच्छा ही सुनने को मिला करता क्योंकि उनका बेटा उनका नन्ना मुन्ना शिवनाथ जी की छत्रछाया में काफी होनहार था ।
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  परंतु इस बार जैसा बहुरानी सोचकर घर से बच्चे के साथ स्कूल आई थी वैसा तो बिल्कुल भी नहीं हुआ उल्टे इस बार उसे अपने बच्चे के स्कूल की क्लास टीचर से कुछ शिकायत सुनने को मिली ।

  क्लास टीचर ने बताया कि
"अपका बेटा  कभी कभार गवारो की भाषा बोलता है । जो इस अंग्रेजी मीडियम विद्यालय में बोलना बिल्कुल भी अलाव नहीं है"

सबके सामने बेटे की शिकायत सुनकर बहुरानी को काफी शर्मिंदगी महसूस हुई । शायद वह इसके लिए मानसिक रूप से  तैयार नहीं थी । उसे बहुत गुस्सा आया । उसने बेटे का हाथ पकड़ा और चुपचाप घर वापस लौट आईं ।

  घर आने के बाद बहुरानी ने वैसे तो  इस संदर्भ में किसी से कोई बात नहीं की परंतु अगले दिन स्कूल से लौटने के बाद शाम को दादाजी ने पोते को हमेशा की तरह पास के चौराहे पर घुमाने के लिए उसे आवाज़ लगाई । आवाज लगाएं काफी देर हो गई मगर पोता उतरकर नीचे नहीं आया ।

  ऐसे में दादाजी ने कई बार दुबारा से आवाज़ लगाई, बार बार आवाज लगाने पर भी अंश के नीचे न आने पर दादा-दादी थोड़े चिंतित हुए ।  ऐसे में दादी स्वयं बहुरानी के कमरे के पास जाकर उसे आवाज लगाई । तब बहुरानी ने तीखे स्वरों में अंश को बाहर भेजने से साफ इन्कार कर दिया ।

  दादी ने इसका कारण जानना चाहा परंतु बहुरानी ने उनके किसी भी प्रश्न का जवाब न देते हुए चुप्पी साधी रखी । बहुरानी के पीछे खड़ा अंश बार-बार दादा जी को  छत से निहार रहा था कि कब उसे माँ के द्वारा जाने की आज्ञा मिलेगी  क्योंकि सैर सपाटा अंश को काफी पसंद था ।

  हर शाम उसे का दादा जी के साथ जाना, वहां खूब  सारी मस्ती करना, खाना-पीना उसकी आदत बन चुकी थी परंतु दादी के लाख कहने के बावजूद बहुरानी ने पोते को नहीं जाने दिया । कई दिन गुजर गए मगर अंश घर से सिर्फ स्कूल जाने के लिए ही बाहर निकलता ।
  रविवार का दिन था संजोग से इंजीनियर साहब घर पर ही थे । दादा जी के एक करीबी दोस्त जोकि उसी मोहल्ले के थे वे भी वहां आए हुए थे । काफी देर तक दादाजी की उनके दोस्त से बातें चलती रही ।

  जब वे वहां से चलने लगे तब दादाजी भी उनके साथ चल पड़े । दादा जी के दोस्त ने अंश को भी अपने साथ चलने को कहा मगर अंश भी उत्साहित होकर उनके साथ निकलना चाहा । तभी उसकी नजर छत पर खड़ी, उसे घूर रही अपनी माँ पर पड़ी । बिचारे अंश के तो प्राण ही सूख गए । वह बस चुपचाप वही ठिठक गया ।
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  जब यह सब कुछ हो रहा था तभी इन सब बातों को इंजीनियर साहब बहुत गौर से देख रहे थे । उनके जाने के तुरंत बाद ही वे पत्नी के कमरे में आए और इन सब की वजह जाननी चाही ।

  पहले तो बहु रानी ने इधर-उधर की बात करके उन्हें मूल विषय से भटकाने की कोशिश की मगर इंजीनियर साहब के अड़ियल रवैया के आगे बहुरानी को मजबूरन उन्हें सारी बात बतानी पड़ेगी । बहुरानी ने स्कूल के पेरेंट्स मीटिंग में बच्चे की शिकायत का वाक्या इंजीनियर साहब को बताया । बहु रानी ने बताया कि 
"हमारा बच्चा वैसे तो अंग्रेजी मीडियम में पढ़ता है और घर में सभी खड़ी बोली का ही प्रयोग करते हैं । कोई भी यहां ऐसी-वैसी भाषा का प्रयोग नहीं करता है परंतु यह दादा जी के साथ शाम को सैर-सपाटे के लिए अक्सर जाया करता है और वहां पर आसपास के बस्ती के बच्चों के साथ खेलता है । जिनमें से अधिकतर बच्चे या तो स्कूल नहीं जाते या फिर स्कूल भी सिर्फ नाम के लिए जाते हैं । उनकी उचित अनुचित बातों को अंश ग्रहण कर लेता है जो उसके लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है । इसलिए अंश के मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने कूदने एवं उनके साथ दोस्ती करने से मैने साफ पाबंदी लगा दी । अब मै नहीं चाहती कि ऐसे बच्चों से अंश का दूर-दूर तक कोई वास्ता रहे और उनकी बुराइयां अंश पर हावी हो"

इंजीनियर साहब पत्नी की बातों को काफी गौर से सुन रहे थे पत्नी की बातें सुनने के बाद इंजीनियर साहब ने अपने सामने घटित एक वाक्ये को पत्नी को बताया

जब वे बचपन के दिनों में अपने ननिहाल गर्मी की छुट्टियां मनाने गए थे । उसी दौरान एक दिन जब वे अपने दोस्तों के साथ गांव के बगीचे में खेल रहे थे तभी उन्होंने अचानक अपने सामने एक बहुत ही जहरीले  सांप को देखा वे काफी भयभीत हो गए । तभी जाने कहां से दूसरी ओर से सांप के ठीक सामने  नेवला आ धमका दोनों एक दूसरे की राह से हटने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे ।

  
  ऐसे में दोनों के बीच जंग होना लाजमी था । काफी देर तक दोनों के बीच शह और मात के संघर्ष का खेल चलता रहा । इस दौरान सांप ने कई बार नेवले को डसने की कोशिश की । मगर  हर बार नेवला खुद को बचाने में सफल रहा । दोनों ने लगभग सारे पैतरे आजमा डाले परंतु कोई निष्कर्ष नहीं निकला । अंत मे सांप ने अपने मुख से फव्वारे की तरह विष की बहुत बड़ी मात्रा नेवले के ऊपर फेंकी ।

  तब हमें लगा कि अब तो नेवला का अंत निश्चित है परंतु अत्यंत विषैले सांप के इतने ज्यादा जहर का भी असर नेवले पर नहीं हुआ । आगे इंजीनियर साहब ने अपनी पत्नी को बताया कि मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है  कि हम जिस भी परिवेश में रहते हैं वहां हमारे आसपास कई तरह के लोग मौजूद हो सकते हैं कुछ सामाजिक हो सकते हैं तो कुछ असामाजिक भी हो सकते हैं परंतु इन सब का हमारे स्वभाव का पर प्रभाव पड़ेगा या नही यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमें जो संस्कार सिखाए गए हैं वो कैसे और कितने प्रबल हैं ? यदि हमें अच्छे संस्कार सिखाए गए हो होंगे तो बुरे लोगों की संगत भी हमे विचलित नही कर सकेगी उनकी बुराइयों का हम पर ज़रा भी असर नहीं पड़ेगा । वहीं अगर हमें अच्छे संस्कार नहीं दिए गए, हमें अच्छे बुरे की सीख नहीं दी गई । तब शायद ये हो सकता है कि हमारा स्वभाव आसपास के वातावरण के अनुरूप ही ढल जाए ।    
 

  इसीलिए हमें अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा संस्कार देने की कोशिश करनी चाहिए । अगर हमारे बच्चे में अच्छे संस्कार रहेंगे । तो समाज की कोई भी बुराई उनको छू भी नहीं सकेगी । इसके लिए उसे बंद कमरे में रख देने से कोई फायदा नहीं । 


इंजीनियर साहब ने आगे बताया की
"बड़े समाजों में रहने वाले एवं अच्छे विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों में बुराइयों का होना इस बात का प्रतीक है कि उनका स्वभाव किसी परिवेश पर नही बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसका प्राथमिक विद्यालय अर्थात उसके माता-पिता एवं परिवार उसे कैसी शिक्षा और  कैसे संस्कार दे रहे है । यदि संस्कार अच्छे होगें तो निश्चित रुप से समाज में फैली छोटी मोटी बुराइयां तो क्या बड़ी बड़ी असामाजिक चीजें भी उसमें नहीं पनप सकेंगी ।

  बहुरानी को इंजीनियर साहब की बातें समझ में आ गई । अगले दिन शाम को विद्यालय से लौटने के बाद अंश दादा जी के साथ सैर-सपाटे पर जाने के लिए नीचे उनके पास आ गया 


इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है | Moral Of This Inspirational Hindi Story


बच्चों में संस्कारों का निर्माण परिवेश पर नही बल्कि  इस बात पर निर्भर करता है कि हम उन्हे कैसे संस्कार दे रहे हैं !



  अगर सिर्फ अच्छे परिवेश से ही बच्चो के अंदर अच्छे संस्कारों का निर्माण हो सकता तो ऊंचे समाज में रहने वाले एवं उच्च विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले लोगों में बुराइयां कभी नहीं जन्म ही नही ले पाती । हमें समझना होगा कि हमारे बच्चों में अच्छे संस्कारों का निर्माण तभी हो सकता है जब हम खुद उन्हें अच्छे संस्कार दें । ताकि समाज में फैली हुई ढेरों बुराइयां उनको छू भी न सके । जब उनके अंदर अच्छे संस्कार होंगे और उन्हें भले बुरे की सही समझ होगी तब मुझे यकीन है कि उनके अंदर समाज के बुरे लोगों का भी कोई असर नहीं हो सकेगा ।
    

   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
 Team MyNiceLine.com

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