जीवन एक संघर्ष है पर प्रेरणादायक हिंदी स्टोरी  life is a struggle motivational story in hindi with moral

संघर्ष ही जीवन है पर कहानी | Struggle IS Life Motivational Hindi Story


  एजाज मियां का निकाह तबस्सुम से हुआ । निकाह के फौरन बाद वह अपनी बेगम को लेकर शहर के बीचों बीच स्थित अपने दो कमरों के छोटे से किराए के मकान पर लौट आए । मकान छोटा ही था मगर तबस्सुम के स्वागत में एजाज मियां ने उसे काफी सजा-धजा रखा था । तबस्सुम को एजाज मियां का उनके प्रति यह प्रेम बहुत पसंद आया । 

  नवदंपत्ति के बीच में वैसे तो काफी प्यार था मगर प्यार के लिए उनके पास समय बहुत कम था क्योंकि एजाज मियां की जिंदगी काफी भागदौड़ भरी थी । वह सुबह 4 बजे उठकर स्टेशन चले जाते । वहां से दैनिक अखबारों की पोटली लेकर घर-घर पेपर बांटा करते  फिर 9 बजते-बजते वो भागे-भागे घर आते फिर हाथ मुँह धूलकर फटाफट दो निवाला मुंह में डालते और दौड़े-दौड़े पास के दवाखाने चले जाते । वहां से तकरीबन 8 बजे उनको फुर्सत मिलती तब जाकर कहीं वह सुकून से घर पर बैठ कर बेगम के साथ गप्पे लड़ाते ।

  वैसे तो तबस्सुम को अपने पति से कोई शिकायत नहीं थी मगर वह उनसे अपने लिए थोड़ा और समय चाहती थी । इसके लिए वह बार-बार उनपर अपनी किसी एक जॉब छोड़ने का दबाव डालती । तब एजाज मियां उसे बताते

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 "बेगम तुम शायद ये नही जानती कि ये शहर कितना महंगा है और यहां सिर्फ पेपर बांटकर या चार हजार की कम्पाउंडरी करके गुजारा नहीं किया जा सकता । तुम जिंदगी को जितना आसान समझ रही हो उतनी है नहीं"
मगर तबस्सुम को एजाज मियां की बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता । वह अपने हठ पर अड़ी रहती । 

  एक दिन अचानक साइकिल फिसलने से एजाज मियां को हाथ में काफी चोट आ गई । हाथ में प्लास्टर लग जाने के कारण अब वह साइकिल चलाकर घर-घर पेपर बांटने में बिल्कुल असमर्थ हो गए । करीब तीन हफ्तो बाद जाकर उनके हाथ का प्लास्टर खुला परंतु प्लास्टर खुलने के बाद भी एजाज मियां जब भी अपनी साइकिल को हाथ लगाते तब उनके हाथ मैं अचानक तेज चुभन जैसा दर्द होता । तब डॉक्टर ने उन्हें और थोड़े दिन हाथ को आराम देने के लिए कहा । 

  हाकर का काम छोड़े अब एजाज मियां को लगभग 3 महीने हो चुके थे जिसका सीधा असर उनकी  आमदनी पर पड़ा घर पैसो का आना पहले से बहुत कम हो गया । कमाई भले ही कम हो जाए मगर खर्चे भला कहां कम होने वाले ऐसे में एजाज मियां के बैंक खाते में जो थोड़े बहुत पैसे जमा थे वे भी धीरे-धीरे खर्च हो गए । अब एजाज मियां के पास खर्चों को कम करने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं था । ऐसे में उन्होंने अपने किराए के दो कमरों में से एक कमरा छोड़ने का फैसला किया ताकि किराया आधा ही देना पड़े । जिससे घर का खर्च कुछ कम हो जाए और गाड़ी दोबारा पटरी पर आ सके ।

  वैसे तो तबस्सुम ने भी उनके फैसले में हां में हां मिलाई थी परंतु थोड़े ही दिनों बाद तबस्सुम को यहां काफी कठिनाइयां महसूस होने लगी । अब एक ही कमरे में वह क्या-क्या करें एक ही कमरे में उठना बैठना, खाना पकाना और कोई आ जाए तो उसे फिर कहां बिठाएं । ऐसी तमाम समस्याओं का सामना करने मे उसे कठिनाई महसूस होने लगी । 

  इन बातों को लेकर तबस्सुम और एजाज मियां के बीच अक्सर गरमा गरम बहस होती रहती । धीरे धीरे उनके रिश्ते के बीच की मिठास धीरे-धीरे खटास में बदल गई । हालांकि  एजाज मियां उसे बार-बार बस थोड़े और दिन सब्र रखने के लिए कहते । 

 रोज-रोज के इन झगड़ो मे तंग आकर एक दिन एजाज मिया बिना कुछ खाए पिए काम पर चले जाते है तबस्सुम को इस बात से जरा भी फर्क नही पड़ता है उसका सब्र अब जबाब दे रहा है। तभी एक दिन तबस्सुम की मां का फोन आता है वह उसे बताती हैं कि 

 "उसके पिता के एक दोस्त अपनी पत्नी का इलाज कराने उसके शहर जा रहे हैं उन्हें जिस अस्पताल में दिखाना है उसका पता तबस्सुम के घर के आस पास का ही है इसीलिए वह उन्हें सीधे तबस्सुम के घर ही भेज रही है । मां आगे, तबस्सुम को अपने साथ उन्हे अस्पताल ले जाकर दिखलाने के लिए कहती है"
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  तबस्सुम भी मां की हां में हां मिलाती है । उनके आने पर वह उन्हें अपने साथ अस्पताल के पते पर लेकर पहुंचती है । वहा पहुंच कर मरीजो से घिरे कम्पाउंडर से वह उनका नंबर लगाने के लिए कहती है कम्पाउंडर जब उससे मरीज का नाम और पता पूछता है तब वह कम्पाउंडर को देखकर चौक जाती है । कंपाउंडर बुर्के में खड़ी तबस्सुम से बार-बार मरीज का नाम और पता पूछता है ।

  तब वह कम्पाउंडर को, मरीज का नाम और पता लिखा हुआ, कागज का एक टुकड़ा पकड़ाती है असल में वह कंपाउंडर कोई और नहीं उसके शौहर एजाज मियां हैं मगर बुर्के में होने के नाते वह तबस्सुम को पहचान नहीं पा रहे हैं । वह उनका नंबर लगाकर उन्हें बैठ जाने को कहते हैं । दवाखाने में काफी भीड़ है ।

  कम्पाउंडर साहब कभी नए मरीजों का नाम नोट करते हैं तो कभी दिखाकर आए मरीजों को दवाइयां दे रहे हैं वहीं बेल बजते ही भागकर डॉक्टर के चेंबर में जाते हैं । इधर भीड़ में हर दूसरा आदमी थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर कंपाउंडर साहब से नंबर आने मे और कितनी  देर है?, के बारे में पूछ रहा है । कंपाउंडर साहब, सबको थोड़ा धैर्य रखने के लिए कह रहे हैं मगर खुद को वीवीआईपी समझने वाले कुछ लोग अपना गुस्सा दिखाकर उन पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं ।

  मानो कंपाउंडर साहब ने उनका कर्जा खाया हो उनका बस चले तो शायद वो कंपाउंडर साहब को धक्का देकर डॉक्टर के चेंबर में घुस जाए । तबस्सुम को यहां अपनी बारी का इंतजार करते करीब दो घंटे बीत चुके हैं पर इन दो घंटों में कम्पाउंडर साहब को काम से एक पल का भी चैन नहीं मिला और रही बात लोगों से तीखी नोकझोंक की तो वो तो बदस्तूर लगातार जारी है ।

  इन सबके बीच तबस्सुम ने एक बात गौर की, कि कंपाउंडर साहब जब भी डाक्टर चैम्बर में जाते हैं तो अचानक शान्त चैम्बर किसी के डाट फटकार भरी आवाजों से गूंज उठता है और वहां से निकलते वक्त एजाज मियां का चेहरा काफी मुरझाया-मुरझाया सा रहता है । 

  इसी बीच तबस्सुम का नंबर आ जाता है वह मरीज को लिए केबिन में दाखिल होती हैं अभी डाक्टर मरीज को देख ही रहा था कि तभी कंपाउंडर साहब अंदर घुसते है उनके हाथ मे किसी का विजिटिंग कार्ड है, असल में बाहर कोई साहब खुद को डॉक्टर का बड़ा खास बता रहे हैं और डॉक्टर से फौरन मिलना चाहते हैं इसलिए उन्होंने अपना कार्ड कंपाउंडर साहब के हाथों अंदर भेजा है । 

  वह कार्ड देखकर डॉक्टर साहब भड़क जाते हैं और उसे जबरदस्त फटकार लगाते हुए काफी उलूल जुलूल बातें सुनाते हैं । वे कहते हैं कि 
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  "तुम एकदम मूर्ख हो तुम्हारे अंदर सेन्स नाम की कोई चीज नहीं है । मैंने कितनी बार तुमसे कहा जिसे दिखाना हो उससे कहो आकर नंबर लगाएं और नंबर आने तक या तो चुपचाप बैठकर इंतजार करें या फिर कहीं और दिखाले मगर तुम्हारे दिमाग में तो कोई बात घुसती ही नहीं । आगए किसी साहब का कार्ड लेकर.. देखो ऐसा है यहां मेरे लिए सभी VIP हैं सब मेरे लिए बराबर हैं"


अपनी बात कहकर डॉक्टर उसे डांट कर बाहर भगा देता है । थोड़ी देर तबस्सुम के साथ आए मरीज को देखने के बाद वह उन्हे बाहर बैठने को कहते हैं । बाहर मरीज के कुछ टेस्ट होते हैं जिसकी रिपोर्ट के लिए उन्हें और थोड़ी देर यहीं इंतजार करना होगा ।

  रिपोर्ट मिलने के बाद तबस्सुम अपने साथ मरीज को लेकर एक बार फिर डॉक्टर के चेंबर मे दाखिल होती है तभी अचानक डॉक्टर का फोन बजता है फोन रिसीव करने के फौरन बाद डॉक्टर बेल बजाकर कंपाउंडर को बुलाता है । कंपाउंडर के अंदर घुसते ही डाक्टर उसे बहुत भद्दी भद्दी गालियां देते हुए कहता है 

"तुम लोगों को पैसा समय से चाहिए, छुट्टी समय से चाहिए मगर जब काम का वक्त आता है तब तुम्हारी अकल घास चरने चली जाती है .. . बाहर वहां न जाने कब से सिन्हा साहब हम से मिलने का वेट कर रहे हैं उन्होंने तुमसे बताया भी होगा कि वह हमारे खास हैं उन्होंने तुम्हें अपना कार्ड भी दिया था तबसे अबतक तुम 50 बार तुम अंदर बाहर हो चुके हो मगर उनके बारे में मुझे एक बार भी बताना जरूरी नहीं समझा" 


काफी देर फटकार लगाने के बाद डॉक्टर ने उसे बाहर जाकर सिन्हा साहब को तुरंत अंदर भेजने के लिए कहता है तबस्सुम समझ जाती है कि डॉक्टर किसी न किसी बहाने सिर्फ अपने नौकरों को जलील करने में लगा रहता है । कभी जिस काम को करने पर वह उन्हें बुरा भला कहता है अगले ही पल उसी काम को न करने पर उन्हें खरी खोटी सुनाता है तबस्सुम दवा खाने से घर चली आई मगर पूरे रास्ते भर वह एजाज मियां और उनकी मुश्किलों भरी जॉब के बारे में ही सोचती रही । 

  उसे समझ आ चुका था कि एक कमरे में एडजस्ट करने में उसे जितनी मुश्किल हो रही है उससे कई गुना ज्यादा परेशानियां झेल कर एजाज मियां दो जून की रोटी का बंदोबस्त करते हैं । इतना सबकुछ सहकर भी वे जिन्दगी के लिए संघर्ष करना नही छोड़े और मैन इतनी जल्दी कठिनाइयों से हार मान लिया । 

वहां से लौटकर वह एजाज मियां के लिए गरमा गरम पराठे बनाती है और उन्हें लेकर दौड़े दवाखाने पहुंच जाती है । संजोग से डॉक्टर का आधे घंटे का रेस्ट टाइम चल रहा है । एजाज मियां, दिखाकर आए मरीजों को दवा देने में लगे हैं तभी  वह उनके सामने मेज पर खाने का टिफिन रखती है । एजाज मियां सर उठा कर उपर देखते हैं तो बुर्के मैं कोई युवती खड़ी है । वह एकबार फिर उसे पहचान नहीं पाते हैं तभी तबस्सुम अपना नकाब हटाते हुए टिफिन खोलती है और उन्हे गरमा-गरम पराठे खाने के लिए कहती है ।

कहानी से शिक्षा | Moral Of This Best Inspirational Story In Hindi 


 इस कहानी से दो शिक्षा मिलती है

मुश्किलो का हल कठिनाइयों से दूर भागने से नहीं बल्कि उनका डटकर सामना करने से निकलता है क्योंकि जीवन एक संघर्ष है !

खुद की तकलीफों को सबसे बड़ा समझने से पहले दूसरों के बारे में भी जान लेना आवश्यक है !


अक्सर हम खुद की परेशानियों को ही सबसे बड़ा मान बैठते हैं मगर जब हकीकत से हमारा सामना होता है तब हमें पता चलता है कि अगले की मुश्किलों के आगे हमारी मुश्किलें तो कुछ भी नहीं है ।



   Writer
  Karan "GirijaNandan"
 With  
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